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Wednesday, December 10, 2008

हर जगह गरीब मजदूर पर ही होता निशाना-व्यंग्य कविता

अपने लिए नहीं मांगते सिंहासन
दो पल की रोटी की खातिर
मजदूर इधर से उधर जाते
अपने पसीने की धारा में
अपना पूरा जीवन गुजारते
नहीं किसी का खून चूसने जाते
नहीं करते चोरी
न करते लूट
इसलिए रोज चैन की नींद सो जाते

जिनका जीवन बीतता है रोज
छल कपट के साथ
दौड़ते जाते माया के पीछे
फिर भी नहीं आती वह हाथ
दिन में चैन नहीं है
रात को नींद नही
वह गरीब मजदूर को नहीं सह पाते

ऊंचे महलों में भी जिनको सुख नसीब नही
थाली में सजे पकवान
पर पेट में जाने का उनकों रास्ता नहीं
मजदूर के तिनकों के घरोंदों को
भी देखते तिरछी नजर से
उसकी रोटी के सूखे टुकड़े को
देख कर उनके पेट जलते
क्योंकि सुख का मतलब वह नहीं समझ पाते

शायद इसलिए जब भी
होता है कहीं हंगामा
मजदूर बनता है निशाना
दुनिया के लोग भले ही अमीरों के
स्वांग पर करते हैं नजर
पर मजदूर के सच की अग्नि की
आंच भी नहीं झेल पाते
कोई नहीं होता हमदर्द पर फिर भी
मजदूर जिए जाते
यह जिन्दगी सर्वशक्तिमान की देन है
यही सन्देश फैलाते जाते
अमीरों के चौखट पर
हाजिर करने वाले बहुत होते पर
पर मजदूरों के पसीने के बिना
कभी किसी के महल नहीं बन पाते

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Monday, December 8, 2008

अपना अपना दाव-हास्य कविता

पोता घर में घुसा
तो दादा ने पूछा
'क्या देखकर आया
रिजल्ट आ गया न'
पोता बोला
''हाँ गया
पर अभी पूरी तरह नहीं मालुम
किसको कितनी सीटें मिलीं हैं'

दादा बोले
''तुम सुबह कहकर निकले थे
मैं रिजल्ट देखने जा रहा हूँ
अगर चुनाव का रिजल्ट देखना था
तो घर पर ही देख लेते
कुछ हम से भी राजनीति सीख लेते
हम ही बता देते
किसकी सूरत हुई फक और किसकी खिली है''

पोता बोला
''दादाजी आपकी पीढी
मुफ्त में मजे लेने की आदी है
हमारे लिए तो समय की बर्बादी है
फिल्म, क्रिकेट और चुनाव है
आपके लिए मनोरंजन और खेल
पर हम खर्च करने के आदी हैं
दूसरे की हार जीत पर
हंसना-रोना समय की बर्बादी है
हम तो खेलते हैं अपना दाव
जीत हमारी हो
इसलिये देखते भाव
दाव जीते तो होती है पार्टी
हारें तो निकल जाता तेल
फिल्म में आप देखते अभिनेता की सूरत
चुनाव में देखते प्रत्याशी की सीरत
हमें इससे मतलब नहीं
हमें तो अपने दाव जीतने से वास्ता
फ़िदा उसी पर होते हैं
दिखाता है जो दाव जीतने का रास्ता
हम तो अपना खेल भी
साथ-साथ खेलते है
यही शिक्षा नई पीढ़ी को मिली'

पोता चला गया तो दादा ने
अपने बेटे से कहा
''कुछ गलती हमसे ही हुई है
हमने तो ऐसी शिक्षा नही दी
फिर इसे कहाँ मिली
मुझसे तो दूर बचपन गुजारा था इसने
पर तुम्हारे तो पास रहा
फिर बनी संस्कारों से परे रहा
जिसे खेल और मनोरंजन
करना नहीं आता
अपना धन और मन तबाह करना आता है
ऐसी नयी पीढी मिली

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Friday, September 12, 2008

नये और पुराने का चक्कर- हास्य व्यंग्य और कविता

एक नया कवि मंच पर कविता सुनाने के लिये बुलाया गया तो उसने आते ही कहा‘,आज मैं अपनी एक कविता सुनाने जा रहा हूं। यह जोरदार कविता है। सुनिये-
अरे, पुराने घाघ कवियों
रोज रोज मंचों पर क्यों चले आते हो
अपनी पुरानी रचनायें सुनाते हो
सब हो गये बोर तुमसे
अब यहां से रिटायर हो जाओ
ताकि नये लोग आ सकें
पुराने और कबाड़ के माल जैसे लगते हो
तुम यहां से रुखसत हो जाओ’’


लोगों ने बहुत जोर से तालियां बजाईं। वाह वाह की आवाज से पूरा मैदान गूंज उठा। मंच पर बाकी कवि सन्नाटे में बैठे रहे। वह कवि भी माइक से हट गया तो दर्शक चिल्लाये-‘अरे, भई अपनी कविता तो सुनाओ। तब तो इन पुराने कवियों को रुखसत करें।’

नये कवि ने कहा-‘यह कविता नहीं तो और क्या थी? कितनी देर तक तो वाह वाह करते रहे।
एक दर्शक चिल्लाया-‘वाह वाह तो सभी के लिये करते हैं पर तुम्हारे लिये इसलिये की कि तुम अधिक देर तक नयी कवितायें सुनाओगे। यह तो चुटकी बजाकर चले गये। इससे तो यह पुराने भले थे।

नये कवि ने कहा-‘पहले यह सब हट जायें तभी तो सुनाऊंगा। वैसे अभी मैं यह एक ही कविता लिखी है जो सुना दी। फिर आगे लिखकर सुनाऊंगा।’

दर्शकों ने हाय हाय शुरू की दी। कुछ तो उसे मंच पर ही लड़ने दौड़े वह वहां से भाग निकला। तक हालत को संभालने के लिये एक पुराने कवि ने अपनी नयी रचनायें सुनाना शुरू कर दी।

‘नया नया कर सब चले आते
पुराने पर सभी मूंह फेर जाते
जब नया हो जाता फ्लाप
पुराने का ही होता है जाप
पुराने चावल और शराब का
मजा खाने और पीने में कुुछ और न होता
तो शायद हर जगह पुराना
शायर पिट रहा होता
नया चार लाईनों के हिट लूट रहा होता
अपने नयेपन इतराते हैं बहुत लोग
नहीं जानते क्या है मजा और क्या है रोग
अहसास ही है बस नये और पुराने का
नाम ही खाली जमाने का
शोर मचाकर कविता लिखी जा सकती
तो यहां हर कोई कवि होता
दर्द सभी को है पर
हर कोई शब्दों में उसे नहीं पिरोता
आधुनिक जमाने में तीस पर ही
कई बुढ़ापे के रोगों का होते शिकार
जवान दिखते हैं वह जो हैं साठ के पार
नये और पुराने आदमी में भेद करना
अब कठिन हो गया है
पुरानी गाड़ी खरीदते हैं कबाड़ में
और छह महीने चल चुकी कार को
कहते हैं सैकेंड हैंड
बजाते हैं खुशी का बैंड
आदमी के चक्षुओं के सामने ही
हो जाता है अंधेरे का व्यापार


उसकी कविता सुनकर नये कवि के पीछ भागने वाले श्रोता और दर्शक रुक गये और पूरा मैदान वाह वाह से गूंज उठा।
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Saturday, August 9, 2008

अपने हाथ से पिए जहर की शिकायत नजर नहीं आती है-हिन्दी शायरी

सांप काटे से आदमी के मरने की
खबर ज़माने भर में
सनसनी फैला जाती है
उसके जहर को शौहरत दिला जाती है
पर पेट्रोल और गैस से निकला जहर
शराब और अफीम के नशे का कहर
पूरे समाज को डस रहा है धीरे धीरे
इसे लोगों की भीड़ जानते हुए भी
अपने से छिपा जाती है
दूसरों के मरने का दर्द होता है कम
पर शोक जताकर जमाने को बताया जाता है
संवेदनाएं का अहसास दिलाया जाता है
जहर है उसी का नाम जो पिए आदमी खुद
अपने हाथों से
पर जाहिर न करे बातों से
मर जाता है अपने ही

हाथ से फैलाए जहर से आदमी
पर उसके शिकायत कहीं नजर नहीं आती है
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Wednesday, July 30, 2008

दानव का अवतार अब नहीं होता-हिंदी शायरी

बम के धमाके से कांप गये शहर
इमारते कांपने लगी
वाहन उड़ गये हवा में
बिछ गयी लाशें सड़कों पर
पसर गया चारों और खून
दानव अट्टहास करते हुए बोला
‘’अब देवता धरती पर नहीं आते
मेरे अवतार होने के भय से वह भी घबड़ाते
पर मुझे भी वहां जाने की क्या जरूरत
इंसानों ने ही धर लिया है मेरा भेष
मुझसे काम अधिक तो वही कर आते
मैं तो देवताओं के चाहने वालों पर ही
करता था हमला
वह तो चाहे जिसे मारकर चले जाते
आम इंसानों के दिल में
बहुत समय तक दहशत फैलाकर
मेरे को ठंडक पहुंचाते
इंसान के मरने से अधिक
उसके तड़पने के अंदाज मुझे भाते
दानव का अब अवतार नहीं होता
धरती पर कुछ इंसान मेरे भेष में भी हैं
यह बात सब नहीं जान पाते’’
......................................


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Saturday, July 26, 2008

हमदर्दी बेचना अपना व्यापार मानते-हिंदी शायरी

जख्म जिनको होता है
दर्द ही होता है उनका अपना
हमदर्दी बस होती है दिखावा
बेघर होने का अहसास
जिनके घर उजड़ जाते वही जानते
बरसी है दौलत जिनके घर में
वह भला उजड़ने का दर्द क्या जानते
हमदर्दी में चंद शब्द कहने से
किसी का पेट नहीं भर जाता
उजड़ा घर बस नहीं जाता
जिन्होंने खोये हैं अपने हादसों में
दहशत के सौदागरों के हाथ
दिखाने के लिये कई लोग आगे बढ़ाते हाथ
जो हमदर्दी बेचना अपना व्यापार मानते
...............................................
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जब तक बाजार में बिकेगी सनसनी-हिंदी शायरी

Friday, July 25, 2008

एक मंडी दहशत के नाम हो गयी-हिंदी शायरी

दहशत की भी सब जगह
चलती फिरती दुकान हो गयी
विज्ञापन का कोई झंझट नहीं
उनकी करतूतों की खबर सरेआम हो गयी

कहीं विचारधारा का बोर्ड लगा है
कहीं भाषा का नाम टंगा है
कहीं धर्म के नाम से रंगा है
जज्बातों का तो बस नाम है
सारी दुनियां मशहूरी उनके नाम हो गयी

बिना पैसे खिलौना नहीं आता
उनके हाथ में बम कैसे चला आता
फुलझड़ी में हाथ कांपता है गरीब बच्चे का
उनके हाथ बंदूक कैसे आती
गोलियां क्या सड़क पड़ उग आती
सवाल कोई नहीं पूछता
चर्चाएं सब जगह हो जाती
गंवाता है आम इंसान अपनी जान
कमाता कौन है, आता नहीं उसका नाम
दहशत कोई चीज नहीं जो बिके
पर फिर भी खरीदने वाले बहुत हैं
सपने भी भला जमीन पर होते कहां
पर वह भी तो हमेशा खूब बिके
हाथ में किसी के नहीं खरीददार उनके भी बहुत हैं
शायद मुश्किल हो गया है
सपनों में अब लोगों को बहलाना
इसलिये दहशत से चाहते हैं दहलाना
आदमी के दिल और दिमाग से खेलने के लिये
सौदागरों को कोई तो चाहिए बेचने के लिये खिलौना
इसलिये एक मंडी दहशत के नाम हो गयी
..........................................
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Sunday, July 20, 2008

हकीकत वैसी नहीं होती अमूनन-हिंदी शायरी

सपने सजाता है
उनको बिखरता देख
टूट जाता है मन
कहीं लगाने के लिये ढूंढो जगह
वहीं शोर बच जाता है
जैसे जल रहा हो चमन

भला आस्तीन में सांप कहां पलते हैं
इंसानों करते हैं धोखा
नाम लेकर का खुद ही जलते हैं
क्या दोष दें आग को
जब अपने चिराग से घर जलते हैं
वही सिर पर चढ़ आता है
जिसे करो पहले नमन
जब बोलने को मचलती है जुबान
अंदाज हालातों का नहीं करती
चंद प्यार भरे अल्फाज भी
नहीं दिला पाते वह कामयाबी
जो खामोशी दिला देती है
सपनों में जीना अच्छा लगता है
पर हकीकत वैसी नहीं होती अमूनन
.........................................
दीपक भारतदीप


.......................................

Wednesday, July 16, 2008

घड़ी की सुई जब तक तय न करे-हिंदी शायरी

जो दिल में बसते हैं
ऐसे लोगों की याद अकेले में
बहुत तरसाती है
उनसे मिलन की चाह सताती है
पर भला किसका बस चला है
इस समय पर
जो आदमी की जरूरतों को पास लाकर
अपनो से दूर कर देता है
जिंदगी भर के सपने गुजारने के सपने
एक पल में चूर कर देता है
इसलिये वादों पर क्या भरोसा करें
जो समय के पाबंद होते हैं
आदमी अपनी जुबाने से
चाहे कितने भी बात कर ले
घड़ी की सुई जब तक तय न करे
कोई ख्वाहिश पूरी नहीं हो पाती है
.........................................
दीपक भारतदीप

Sunday, July 6, 2008

रह जाते बस जख्मों के निशान-हिन्दी शायरी


मोहब्बत में साथ चलते हुए
सफर हो जाते आसान
नहीं होता पांव में पड़े
छालों के दर्द का भान
पर समय भी होता है बलवान
दिल के मचे तूफानों का
कौन पता लगा सकता है
जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी
उड़ा ले जाते हैं
खाली पड़ी जगह पर जवाब नहीं होते
जो सवालों को दिये जायें
वहां रह जाते हैं बस जख्मों के निशान
.................................
जब तक प्यार नहीं था
उनसे हम अनजान थे
जो किया तो जाना
वह कई दर्द साथ लेकर आये
जो अब हमारी बने पहचान थे
................................
दीपक भारतदीप

Friday, July 4, 2008

हादसे और जिंदगी-हिंदी शायरी

हादसों से बनती है जिंदगी भी
सोचा न था कभी
जब होते हैं तो डर जाता हूं
हारने का अहसास दिल में
तब होने लगता है
फिर अचानक रास्ता आगे
जाता नजर आता है
खड़ा हो जाता हूं तभी
......................
दीपक भारतदीप

Monday, June 30, 2008

तंग दायरों में मुरझा जाती काया-हिंदी शायरी

तिनका तिनका कर बनाया घर
पर वह भी कभी दिल में न बस सका
ख्वाहिशें लिये भटकता शहर-दर-शहर
दोपहर की जलती धूप हो शाम की छाया

कभी चैन नसीब न हो सका
चाहत है पाना कागज के टुकड़ों की माया
देखना है सोने से बनी काया
एक लोहे और लकड़ी की चीज आती
तो दूसरे के लिये मन ललचाया
कहीं देखकर आंखें ललचाती सुंदर कामिनी की काया
तन्हाई में जब होता है मन
तब भी ढूंढता है कुछ नया
जिसका ख्वाब भी नहीं आया
खुले आकाश में कोई देखे
रात के झिलमिलाते सितारे
चंद्रमा की चमक देखे
जो होती सूरज के सहारे
आंखों से ओझल होते हुए भी
कर जाता हमारी रौशनी का इंतजाम
नहीं मांगने आता है नाम
सदियों से वह यही करता आया
इसलिये देखकर हमेशा मुस्कराया

अनंत है कुछ पाने का मोह
जो अंधा बनाकर दौड़ाये जा रहा है
कहीं अंत नहीं आता इंसान की ख्वाहिशों का
जब तक है उसके पास काया
डूबते हुए भी नहीं छोड़ता माया
अपनों के इर्दगिर्द बनाये घेरे को दुनिया कहता
अस्ताचल में जाते हुए भी
जमाने से हमदर्दी नहीं होती
जब चमक रहा होता है तब भी
तंग दायरों मे रहते हुए मुरझा जाती उसकी काया
.......................................
दीपक भारतदीप

Sunday, June 29, 2008

प्यार है वह अहसास जो बस किया जाता है-हिंदी शायरी

यूं तुम अपने लिये
कुछ भी मांग लिया करो
सिवाय प्यार के
क्योंकि यह मांगने की नहीं
अहसास कराने की शय है
अगर होती किसी के लिये दिल में जगह कही
आंखों से जाहिर हो जाता है


जिनके दर्द से आंखों में आंसू आयें नहीं
जिनकी खुशी पर होंठ मुस्कराये नहीं
लफ्जों में चाहे कितनी भी जतायें

झूठी हमदर्दी का बयां जगजाहिर हो जाता है
किसी के दिल में लिखा कौन पढ़ पाया
लफ्जों के मतलब गहरे हैं या उथले
सुरों की धारा से पता चल जाता
चाहे जितनी भी कोशिश कर लो
जब तक दिल में है
प्यार को सलामत समझ लो
जो जुबां से निकला तो कभी कभी
वहां से भी बाहर हो जाता है
फिर लौटकर नहीं आता
अहसास भी बदन से निकल कर
बाहर बदहाल हो जाता है
प्यार है वह अहसास जो बस किया जाता है
........................................
दीपक भारतदीप

Saturday, June 28, 2008

अकेले में भी यादें खत्म कर देतीं एकांत-हिन्दी शायरी


जब याद आती है अकेले में किसी की
खत्म हो जाता है एकांत
जिन्हें भूलने की कोशिश करो
उतना ही मन होता क्लांत
धीमे-धीमे चलती शीतल पवन
लहराते हुए पेड़ के पतों से खिलता चमन
पर अकेलेपन की चाहत में
बैठे होते उसका आनंद जब
किसी का चेहरा मन में घुमड़ता
हो जाता अशांत

अकेले में मौसम का मजा लेने के लिये
मन ही मन किलकारियां भरने के लिये
आंखे बंद कर लेता हूं
बहुत कोशिश करता हूं
मन की आंखें बंद करने की
पर खुली रहतीं हैं वह हमेशा
कोई साथ होता तो अकेले होने की चाहत
अकेले में भी यादें खत्म कर देतीं एकांत
.................................
दीपक भारतदीप

Friday, June 27, 2008

इसलिए दुनिया रंगरंगीली कहलाती हैं-हिंदी शायरी



मेरी नाव डुबोने वाले बहुत हैं
पर उनकी याद कभी नहीं आती
मझधार में भंवर के बीच आकर जो
किनारे तक पहुंचा जाते
फिर नजर नहीं आते
ऐसे मित्रों की याद मुझे सताती

घाव करने के लिए इस जहां में बहुत हैं
जो बदन से रिसता लहू देखकर
जोर से मुस्कराते हैं
जिन्होंने घावों को सहलाया
जब तक दूर नहीं हुआ दर्द
अपना साथ निभाया
फिर ऐसे गायब हुए कि दिखाई न दिए
आँखें उनको देखने को तरस जाती हैं

इस जिन्दगी के खेल बहुत हैं
नाखुश लोगों से दूर नहीं जाने देती
जो तसल्ली देते हैं
उनको आँखों से दूर ले जाती है
शायद इसलिए दुनिया रंगरंगीली कहलाती हैं
-------------------------------
दीपक भारतदीप

Thursday, June 26, 2008

समय रहते होश में आओ-हिंदी शायरी

जिंदगी भर ख्वाहिशों की फसल बोते रहे
कुछ पर फल लगे, बाकी पर उम्मीद ढोते रहे
प्यार के लिये की खाली पलों की तलाश
पर हिसाब किताब में जिंदगी खोते रहे
खुशियां किसी पेड़ पर नहीं उगा सके
जिस दिल में रहती हैं उसे जगा नहीं सके
जुबान जो बात कह सकती हैं लफ्जों में
उसको समझाने के लिये दौलत के
आंकड़ों का बनाया जाल
जिसमें फंसकर बस रोते रहे
कहें महाकवि दीपक बापू
बरसता है पानी तभी होती है फसल
लहलहाते खेत जब मेहनत होती असल
नीयत बूरी हो तो खेल बिगड़ जाते
मतलब अपने हमेशा नहीं निकल पाते
प्यार पाने से पहले करना जरूरी है
समय रहते होश में आ जाओ
नहीं तो फिर आयेगा एक दिन वह जब
कहोगे हम अपनी जिंदगी बिना चैन के ढोते रहे
.................................

दीपक भारतदीप

Sunday, June 22, 2008

खामोशी तब दर्द का इलाज हो जाती है-हिन्दी शायरी

जुबान कभी नहीं बोलती
तब खामोशी बहुत कुछ कह जाती है
शब्दों का दिल से बाहर आना
बेकार लगता है
तब आखें दर्द दिखा जातीं है
जब लोग भीड़ में चिल्ला रहे हों
अकेले में भी अपनी जुबान से इठला रहे हों
तब खामोशी से दोस्ती कर लो
वही दर्द का इलाज हो जाती है
................................
दीपक भारतदीप

Saturday, June 21, 2008

एक बेसिर पैर की हास्य कविता

अंतर्जाल पर लिखने वाले
चिट्ठाकार अपनी तुलना करने लगते श्वान से
बिल्ली से करते क्यों शरमाते
प्रतिदिन नजरें गढ़ाये रहते हैं
ब्लागवाणी पर हिट पाने के लिये
और कभी भद्र तो कभी अभद्र
नारे लिख आते
भला इसमें कहां श्वान के लक्षण नजर आते हैं
लिखने को भी भौंकना कैसे कह पाते
पता नहीं कौन शिक्षक और कौन शिष्य
सभी वाद पर वाद लाये जाते

कहैं महाकवि दीपक बापू
‘जब सभी अपने पर ही
लगा रहे उपाधियां
तो क्यों हम भी पीछे रह जायें
आज से हम भी अब स्वयं ही महाकवि हो जायें
यह चिट्ठाकार भी किस दुकान का
चिट्ठा लिख कर आते
दस पंक्ति लिख कर ही
जोरदार हिट पा जाते
उनक्र चिट्ठे और हमारी पत्रिकाओं के
चेहरे एक जैसे लगते
पर अंदर कविता हो या दुकान का हिसाब
रजिस्टर सभी एक जैसे फबते
हम लेखक और संपादक ठहरे
चिट्ठाकारों से बहुत डरते
लिखेंगे चंद शब्द और छा जायेंगे
हम कितना भी लिखें फ्लाप ही रह जायेंगे
हम तो समझाते क्यों कोसते हो अपने आपको
ढूंढ लो अपने अंदर भी प्रतिभा
तो हमारी तरह महाकवि बन जाओगे
ब्लागवाणी पर कम हिट होंगे
अपने ब्लाग का नाम भी अखबार में नहीं
देख पाओगे
पर हमारी तरह आम पाठकों में
हिट होते जाओगे
चिट्ठाकार से अंतर्जाल के प्रसिद्ध लेखक
बनते नजर आओगे
वाद और नारों पर देश चलता रहा है
इसलिये आज भी वहीं खड़ा है
गहन चिंतन नहीं करेंगे
हर विद्वान इसी पर अड़ा है
हम तो देते हैं मुफ्त में सलाह
शायद कभी हमें ब्लागवाणी पर जोरदार हिट मिल जायें
एक दिन तो हिट पायें
और फिर मित्रों में अपना रुतवा दिखायें
यहां तो फ्लाप होकर ही काम चलाते
अपने ऊपर ही कस कर फब्तियां
वाह-वाह की लगी तख्तियां
कितनी देर देंगी शक्तियां
पर चिट्ठाकारों की इस महफिल में
हम साहित्यकार कहां टिक पाते
फिर भी मित्र हैं हमारे
उनकी कुंठाओं पर हास्य कविता लिखकर उनको हंसाते
...................................
नोट-यह एक काल्पनिक हास्य कविता है जो इस फ्लाप पत्रिका को हिट बनाने के लिये विशेष रूप से लिखी गयी है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई लेना देना नहीं है अगर किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।

Thursday, June 19, 2008

पीकर जो कविता लिख जाते वह होते भाग्यशाली-हिन्दी शायरी


यूं तो शराब के कई जाम हमने पिये
दर्द कम था पर लेते थे हाथ में ग्लास
उसका ही नाम लिये
कभी इसका हिसाब नहीं रखा कि
दर्द कितना था और कितने जाम पिये

कई बार खुश होकर भी हमने
पी थी शराब
शाम होते ही सिर पर
चढ़ आती
हमारी अक्ल साथ ले जाती
पीने के लिये तो चाहिए बहाना
आदमी हो या नवाब
जब हो जाती है आदत पीने की
आदमी हो जाता है बेलगाम घोड़ा
झगड़े से बचती घरवाली खामोश हो जाती
सहमी लड़की दूर हो जाती
कौन मांगता जवाब
आदमी धीरे धीरे शैतान हो जाता
बोतल अपने हाथ में लिये

शराब की धारा में बह दर्द बह जाता है
लिख जाते है जो शराब पीकर कविता
हमारी नजर में भाग्यशाली समझे जाते हैं
हम तो कभी नहीं पीकर लिख पाते हैं
जब पीते थे तो कई बार ख्याल आता लिखने का
मगर शब्द साथ छोड़ जाते थे
कभी लिखने का करते थे जबरन प्रयास
तो हाथ कांप जाते थे
जाम पर जाम पीते रहे
दर्द को दर्द से सिलते रहे
इतने बेदर्द हो गये थे
कि अपने मन और तन पर ढेर सारे घाव ओढ़ लिये

जो ध्यान लगाना शूरू किया
छोड़ चली शराब साथ हमारा
दर्द को भी साथ रहना नहीं रहा गवारा
पल पल हंसता हूं
हास्य रस के जाम लेता हूं
घाव मन पर जितना गहरा होता है
फिर भी नहीं होता असल दिल पर
क्योंकि हास्य रस का पहरा होता है
दर्द पर लिखकर क्यों बढ़ाते किसी का दर्द
कौन पौंछता है किसके आंसू
दर्द का इलाज हंसी है सब जानते हैं
फिर भी नहीं मानते हैं
दिल खोलकर हंसो
मत ढूंढो बहाने जीने के लिये
...........................
दीपक भारतदीप

Monday, June 2, 2008

जब उतर जाता है शराब का नशा-व्यंग्य कविता

शराब के नशे में वादे
कर वह सुबह भूल जाते हैं
पूरे करने की बात कहो तो
याद करने के लिए बोतल
मांगने लग जाते हैं
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आदमी पीता है शराब
या आदमी को शराब
यह एक यक्ष प्रश्न है
जिसका नहीं ढूंढ पाया
कोई भी जवाब
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सिर पर चढ़ती शराब
आदमी को शेर बना देती है
दौड़ता है इधर उधर बेलगाम
काबू में नहीं रहती जुबान
उतरती चूहा बना देती है
घबडा जाता है आदमी
ढूंढता है छिपने की जगह
अपने ही हाथ में नहीं रहती
अपने दिमाग की कमान
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शराब में डूबकर अगर जिन्दगी के
सफर में पार हो जाते
तो फिर फिर झूठी क़समें और
वादों को इस दुनिया में कहाँ देख पाते

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