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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Sunday, September 8, 2013

एक दिन की महफिल-हिन्दी दिवस पर हास्य व्यंग्य कविता (ek din ki mahafil-hindi diwas par hasya vyangya kavita




हिन्दी दिवस हर बार
यूं ही मनाया जायेगा,
राष्ट्रभाषा का महत्व
अंग्रेजी में बोलेंगे बड़े लोग
कहीं हिंग्लिश में
नेशनल लैंग्वेज का इर्म्पोटेंस
मुस्कराते समझाया जायेगा।
कहें दीपक बापू
पता ही नहीं लगता कि
लोग तुतला कर बोल रहे हैं
या झुंझला कर भाषा का भाव तोल रहे हैं,
हिन्दी लिखने वालों को
बोलना भी सिखाया जायेगा,
हमें तसल्ली है
अंग्रेजी में रोज सजती है महफिलें
14 सितम्बर को हिन्दी के नाम पर
चाय, नाश्ता और शराब का
दौर भी एक दिन चल जायेगा।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Saturday, August 17, 2013

गोरी मेम का बुजुर्ग सिख को पीटना नस्लवाद के साथ अंग्रेजवाद का प्रमाण-हिन्दी लेख (gori mem ka sikh bujurg ko peetna naslwad se angredwad ka pramaan-hindi lekh)



      घटना इंग्लैंड की है पर संदर्भ भारत से भी जुड़ा है।  व्यस्तम सड़क पर एक अंग्रेज युवा महिला ने एक बुजुर्ग सिख व्यक्ति को बुरी तरह पीटा। वहां आते जाते लोग यह दृश्य देखकर खामोश रहे।  उस अंग्रेज युवती ने सिख बुजुर्ग को क्यों पीटा? उनकी गलती थी या किसी भ्रम में पड़कर उस युवती ने उनका अपमान किया? क्या उसने उनको गैर अंग्रेज होने की वजह से मारा? इन प्रश्नों पर भारतीय प्रचार माध्यमों ने अधिक प्रकाश नहीं डाला बल्कि वहां व्याप्त नस्लवाद का प्रमाण कहकर यहां दर्शकों के हृदय में वेदना पैदा की।  तय बात है कि यह उनका एक व्यवसायिक प्रयास है।  इस पर बहस कहीं नहीं होती दिखी क्योंकि इस घटना से जुड़े अनेक तथ्य अंधेरे में है।  एक बात निश्चित है कि उस युवती के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं था कि वह किसी बुजुर्ग को इतनी बेरहमी से पीटे।  उस अंग्रेजी मेमसाहब में अपने गोरे रंग का अहंकार था या फिर भारतीय कौम से घृणा का भाव यह पता नहीं चल पाया।  हम इस वेदनापूर्ण दृश्य को देखकर भावविह्ल तो हो गये पर चिंत्तन की क्षमता नहीं खोयी।
         संभव है यह नस्लवाद का परिणाम हो पर हम इसे उस अंग्रेजवाद से जोड़कर भी देख रह हैं जो अब हमारे देश में आ गया है।  सड़क पर चलते हुए केवल अपनी जान बचाने की सोचो बाकी जो हो रहा है उससे मुंह फेर लो-यही अंग्रेजवाद है।  जिस तरह वह लड़की बुजुर्ग को पीट रही थी वह बुरा था पर जो लोग देखकर भी खामोश थे वह भी कम बुरे नहीं थे।  संभव है कि वहां अधिकतर नस्लवादी मौजूद हों पर सभी नहंी हो सकते। देखने वालों में कुछ खुश होते होंगे कि एक भारतीय पिट रहा है पर सभी की सोच ऐसी नहंी हो सकती। जिनकी थी उनकी परवाह हम नहंी करते पर जिनको यह अच्छा नहीं लगा होगा उन्होंने क्या किया? उनकी खामोशी में ही छिपा है वह अंग्रेजवाद जिसकी मौजूदगी हम अपने देश में ं भी अनेक अवसरों पर देख चुके हैं।
             हमारे देश के प्रचार माध्यमों में ऐसी अनेक खबरें आयी हैं जिसमें अनेक स्त्री पुरुष सामूहिक हिंसा और अपमान का शिकार भीड़ के बीच होते दिखाये गये। घटना के दौरान   अपराधी कम दर्शक ज्यादा रहे!  सभी अपराधियों के साथ कहीं पर विरोध में कोई प्रयास होता नहीं दिखा।  अकेला निरीह मनुष्य कुछ अपराधियों से सार्वजनिक रूप से मार खा रहा है या अपमान झेल रहा है।  पास में भीड़ खड़ी है एकदम बुत की तरह!  ऐसा लगता है कि पास में मनुष्य नहीं पत्थर खड़े हैं-यह भी कह सकते हैं कि पत्थर की बनी मानवी  मूर्तियां खड़ी हैं।  कहा जाता है कि अंग्रेज लोग मरने से डरते हैं पर अब भारत में भी यही बात दिखने लगी है।
     ऐसा क्यों हुआ? हमें शिक्षा तथा मनोरंजन के साधनों में व्याप्त अंग्रेजी प्रवृत्ति इसके लिये जिम्मेदार दिखती है।  अंग्रेजी शिक्षा पद्धति में अध्ययन करने के बाद आदमी केवल नौकरी या गुलामी लायक ही रह जाता है।  गुलाम या नौकर कभी साहसी नहीं हो सकता।  हमारे यहां सर्वशिक्षा अभियान चल रहा है। इसका मतलब क्या है?  कहा जाता है कि सभी को साक्षर तो होना चाहिये ताकि अपने जीवन के रोजमर्रा का काम आराम से किया जा सके।  हमारा मानना है कि शिक्षित या साक्षर न होना कोई अभिशाप नहीं है।  हमने देखा है कि निरक्षर व्यक्ति भी अपना काम पड़ने पर शिक्षित की शरण लेकर आगे बढ़ जाते हैं।  अनेक निरक्षर लोगों को रुपये का रंग देखकर ही यह पहचान हो जाती है कि उसका मूल्य क्या है?  मुश्किल तब लगती है जब शिक्षित लोग कायरों जैसा व्यवहार करते हैं।  उस समय कायर बनाने वाली  पूरी शिक्षा पद्धति बेकार लगती है।  बची खुशी बहादुरी फिल्मों ने छीन ली।
      बहुत समय हमने एक फिल्म देखी थी।  मुंबई शहर पर आधारित उस कहानी में खलपात्र एक महिला को सरेआम निर्वस्त्र करता है और आम लोग केवल देख रहे हैं।  उस फिल्म को देखकर हमें लगा कि यह केवल बड़े शहर होने के कारण मुंबई में ही संभव है क्योंकि उस नायिक का आवास एक सभांत कालौनी में था।  उस समय छोटे शहरों  में इतने सभ्रांत लोगों की संख्या नहीं दिखती थी जो ऐसे कठोर व्यवहार पर उत्तेजित होने पर भी  खलपात्र पर कार्यवाही नहंी करते।  जैसे जैसे शहरों में सभ्रांत वर्ग बढ़ा वैसे कायरता बढ़ी है।  उस समय कथित असभ्रांत  समाज के सदस्यों से -जिसमें हम उस समय अपने को शामिल पाते थे- उत्तेजना  में आकर अन्याय के विरुद्ध  खलपात्र पर हमले होने की संभावनायें तो रहती थीं पर अब फिल्मों ने वह भी समाप्त कर दिया है।  अधिकतर फिल्मों में खलपात्र से सामना करने वाले नायकों की मां या पिता का कत्ल या बहिन से बलात्कार होने के इतने दृश्य दिखाये जा चुके हैं कि अब सभ्रांत हो या असभ्रांत वर्ग वह डरपोक हो गया है। किन्हीं किन्हीं फिल्मों में सहनायकों को मरते भी दिखाया है। खलपाात्र का नाश अकेला नायक करता है उस समय भीड़ केवल तालियां बजाने या बधाईयां देने के लिये आती है।  हर फिल्म में नायक को ही विजय मिलती है पर यह भी देखा जा रहा है कि यह भूमिकायें अब फिल्मी बच्चों के लिये सुरक्षित हो गयी हैं। ऐसे में आम युवक या युवती यथार्थ में खलपात्रों का सामना करने की कल्पना भी नहीं कर सकता। जहां नायकत्व पाने का सपना नहीं देखा जा सकता वहां खलपात्रों का मार्ग सुगम हो जाता है-अपने समाज में हम इसके प्रभाव देख सकते हैं। भारतीय शिक्षा तथा फिल्मों पर अंग्रेजी प्रभाव है। शिक्षा और फिल्मों का प्रभाव समाज पर पड़ता है और ऐसे में हम नायकत्व पाने का सपना मर जाने के बाद जीवंत अभिनय करने की संभावनाओं का जिंदा नहीं रख सकते। शिक्षा तथा फिल्मों का मूलरूप से आधार अंग्रेजवाद ही है। अंग्रेेंजी जैसी अवैज्ञानिक भाषा का जहां विद्वान लोग केवल इसलिये समर्थन करते हों कि वह विदेश में नौकरी पाने का जरिया है और जहां अग्रेजियत को आधुनिकता और अंग्रेजवाद को सर्वश्रेष्ठ जीवन प्रणाली माना जाता हो वहां वीरों की उपस्थिति  होेने की आशा करना ही व्यर्थ है।
     हम अंग्रेजों से असभ्रांत भारतीय की तरह व्यवहार की अपेक्षा नहीं कर सकते। खासतौर से तब जब वह मानते हैं कि भारत में उनकी भाषा, जीवन शैली तथा विचारधारा का अनुकरण किया जा रहा हो। दूसरी बात यह भी है कि हमें जिन्होंने असभ्रांत से सभ्रांत बनाया उनसे वीरता की आशा कैसी की जा सकती है।  याद रहे भारत में  अंग्र्रेजी अपनी वीरता से नहीं वरन् चालाकी से राज्य करते रहे। फूट डालो राज्य करो वाली नीति उन्होंने यहां अपनायी।  राज्य करने की यह नीति उन्होंने अपने देश में न  बनाये रखें यह संभव नहीं है। एक गौरवर्ण युवती एक भारतीय बुजुर्ग को पीट रही है तो वहां खड़े अंग्रेज दर्शक अपने को प्रथक रखते हैं तो यह उसका प्रमाण है कि वहां समाज भी  बंटा है। ऐसा नहीं है कि इंग्लैंड के उन दर्शकों ने कभी भारतीय  सिख देखा नहीं होगा पर वह उन बुजुर्ग सिख को  पिटते देखकर अपने प्रथम समाज तथा  अपने से अलग अनुभव कर खामोश रहे।  एक गोरी मेम बुजुर्ग सिख को पीट रही है तो यह नस्लवाद का मुद्दा मानकर  हम  सुविधाजनक स्थिति में हो सकते हैं पर अगर विचार करेंगे तो अपनी अपनी स्वयं की नस्ल पर ही शर्म आने लगेगी जो दूसरों का अंधानुकरण करने लगती है।  इस घटना के बाद भी ब्रिटेन और अमेरिका में जाकर अपना जीवन गुजारने का सपना देखने वाले कम नहीं होंगे।  उनके लिये वहां की धरती आज भी  स्वर्ग है।
        सच यह है कि अंग्रेज न सभ्य है न सभ्रांत! उनकी गोरी चमड़ी और चालाकियां उनके व्यक्तित्व को चमकदार बनाती है।  वह अहिंसा की बात करते हैं पर सबसे अधिक एतिहासिक हिंसक घटनायें उनके नाम हैं। भारत के विभाजन के बाद जो हिंसा हुई वह अंग्रेजों के नाम ही है।  इस धरती पर परमाणु बम का उपयोग एक ही बार हुआ है और वह  भी ब्रिटेन के उस समय के सहयोगी राष्ट्र अमेरिका ने ही किया।  कथित मानवाधिकारों की रक्षा  के लिये यही दोनों राष्ट्र प्रतिबद्धता भी खूब दिखाते हैं। दरअसल इन गोरों का एक ही लक्ष्य है अपना मतलब साधना। उनकी संस्कृति, संस्कार और सभ्यता यही है और यही उन्होंने पूरे विश्व को सिखाया है। यह कैसे संभव है कि वह अपनी असलियत भूल जायें। ब्रिटेन के बारे में कहा जाता है कि वहां के लोग अपनी परंपराओं से प्रेम करते हैं,  यही स्वार्थ सिद्धि की परंपरा उनकी वास्तविक स्थिति है। ऐसे में नस्लवाद का आरोप लगाकर इस घटना को हल्का नहीं किया जा सकता क्योंकि यहां पीटने और पिटने से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि सार्वजनिक स्थान पर भीड़ के सामने यह किया गया।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Wednesday, July 31, 2013

चेहरे की असलियत का राज-हिन्दी कविता (chehre ki asliyat ka raj-hindi kavita)



रोज पर्दे पर देखकर उनके चेहरे
मन उकता जाता है,
जब तक दूर थे आंखों से
तब तक उनकी ऊंची अदाओं का दिल में ख्वाब था,
दूर के ढोल की तरह उनका रुआब था,
अब देखकर उनकी बेढंगी चाल,
चरित्र पर काले धब्बे देखकर होता है मलाल,
अपने प्रचार की भूख से बेहाल
लोगों का असली रूप  बाहर आ ही जाता है।
कहें दीपक बापू
बाज़ार के सौदागर
हर जगह बैठा देते हैं अपने बुत
इंसानों की तरह जो चलते नज़र आते हैं,
चौराहों पर हर जगह लगी तस्वीर
सूरज की रौशनी में
रंग फीके हो ही जाते हैं,
मुख से बोलना है उनको रोज बोल,
नहीं कर सकते हर शब्द की तोल,
मालिक के इशारे पर उनको  कदम बढ़ाना है,
कभी झुकना तो कभी इतराना है,
इंसानों की आंखों में रोज चमकने की उनकी चाहत
जगा देती है आम इंसान के दिमाग की रौशनी
कभी कभी कोई हमाम में खड़े
वस्त्रहीन चेहरों पर नज़र डाल ही जाता है,
एक झूठ सौ बार बोलो
संभव है सच लगने लगे
मगर चेहरों की असलियत का राज
यूं ही नहीं छिप पाता है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Saturday, July 13, 2013

कभी कभी दूरदर्शन की भी याद आती है-हिन्दी लेख (kabhi kabhi doosrdarshan kee bhee yaad aati hai-hindi lekh or article ot editorial)



          जब देश के प्रचार माध्यमों पर आकाशवाणी तथा दूरदर्शन का एकमात्र शासन था तब देश के बुद्धिजीवी उसे सरकारीवाणी या कर्कशवाणी कहते हुए थकते नहीं थे। उसकी बदनामी के  चलते देश में निजी क्षेत्र में टीवी के मनोरंजन चैनलों का आगमन हुआ।  प्रारंभ में कुछ चैनलों परं मनोरंजन के साथ ही दूरदर्शन की तरह समाचार भी आते थे।  जब दूरदर्शन ने अपना  प्रथक से समाचार चैनल प्रारंभ किया तो निजी क्षेत्र ने भी उसका अनुसरण किया।  उदारीकरण ने ऐसी स्थिति ला दी कि बाज़ार के स्वामी खेल, प्रचार, कला तथा मनोरंजन में भी अपना वर्चस्प बनाने में सफल रहे। यह सब ठीक माना जाता अगर इन टीवी चैनलों ने दूरदर्शन को अपने प्रसारणों के आधार पर परास्त किया होता। 
       कम से कम एक बात तो है कि दूरदर्शन जब अपने मनोरंजक  कार्यक्रम प्रसारित कर रहा था तब उसमें हास्य, श्रंृगार तथा करुणा रस से भरे कार्यक्रमों का एक स्तर था पर इन निजी चैनलों ने अपनी प्रसारित सामग्री में इस पर कतई ध्यान नहीं दिया।  दूसरी बात तो यह कि हिन्दी समाचार चैनलों ने कभी दूरदर्शन की तरह अपने प्रसारणों में अपनी व्यवसायिक मर्यादा का पालन नहीं किया। दुनियां भर की खबरें दस मिनट में सुनाते हैं पर बाकी समय उनका मनोरंजन चैनलों के कार्यक्रमों के प्रचार पर खर्च होता है। कभी कॉमेडी तो कभी सामाजिक धारावाहिकों के अंश दिखाकर वह अगर उन्हें समाचार का उसे समाचार का भाग जताना चाहते हैं तो यह उनकी व्यवसायिक लापरवाही का ही प्रमाण है। वैसे हम उनको क्या कहें? हमारे देश मेें व्यवसायिक प्रबंध तथा प्रवृत्ति दोनों का अभाव माना जाता है।  जो कमाई कर रहा है उसे बुद्धिमान तथा पेशेवर मान लिया जाता है। हमारे देश के बुद्धिमान लोगों ने हमेशा ही अंग्रेजों की नकल की है पर उन जैसा पेशेवराना अंदाज नहीं अपना सके। यही कारण है कि फिल्म और धारावाहिकों की शैलियां भी उन्हें अमेरिका और ब्रिटेन के मनोरंजक क्षेत्रों से नकल करनी पड़ती है। हिन्दी के खाने वाले हमारे मनोरंजक व्यवसायी कहानियां भी उनसे ही लेते हैं।  देश में हिन्दी लेखकों और पटकथाकारों को आगे लाने में उनकी कोई रुचि नहीं हैं।  यही कारण है कि कॉमेडी के नाम फूहड़पन दिखाते हैं।   पता नहीं लोगों को उनके मनोरंजन में कितनी रुचि है? पर एक बात तय है कि भारतीय जनमानस को ऐसा फूहड़पन भाता नहीं है। जिन सामाजिक धारावाहिकों में वास्तव में कहानी रही उनको भारतीय जनमानस ने हृदय से सराहा है।  हास्य धारावाहिकों में अनेक स्तरीय कार्यक्रम लोकप्रिय रहे हैं। कम से कम एक तो यह है कि भारतीय जनमानस मनोरंजन की दृष्टि से भी स्वाद जानता है।  यही कारण है कि मनोंरजन व्यवसाय भारत में अभी वैसा सम्मानजनक स्थान प्राप्त नहीं कर सका जिसका दावा प्रचार माध्यम करते रहे हैं।  यह अलग बात है कि मलाई की जगह बासी खिचड़ी बेचने वाले इन मनोरंजक व्यवसायियों को कुछ मन के भूखे मिल जाते हैं पर यह संख्या अधिक भी हो सकती है यदि वह भारतीय तरीके से चलें।  मुश्किल यह है कि ऐसी सामग्री की कल्पना करने वाला लेखक चाहिये और वह आसानी से वह नहीं मिलने वाला। जो इन मनोरंजक व्यवसायियों के यहां चक्कर लगाते हैं वह लिपिकनुमा लेखक है। उससे ही यह लोग काम चला रहे हैं और उनकी अधिकतर समाग्रियां घटिया स्तर की बन रही है।
            उससे भी बुरी बात यह है कि यह प्रचार माध्यम  अपने देशी एजेंडे का ध्यान नहीं रखते हुए जाने अनजाने में विदेशी एजेंडे की तरफ बढ़ गये हैं।  फिल्म हो या धारावाहिक इन पर अगर दृष्टिपात करें तो भारत में एक ऐसे समाज निर्माण का प्रयास हो रहा है जो आर्थिक दृष्टि से आधारहीन, वैचारिक दृष्टि से स्तरहीन और आचरण की दृष्टि से मर्यादाहीन हो।  दूसरी बात यह भी है कि प्रचार व्यवसाय का अर्थशास्त्र कहीं न कहीं विदेशी भूमि से जुड़ा है।  पश्चिम तथा मध्यएशिया देशों में भारतीय प्रचार माध्यम अपने लिये प्रायोजन के लिये धन  के साथ  वहां से दर्शक जुटाने का प्रयास भी  करते हैं।  यही कारण है कि धारावाहिकों तथा फिल्मों की कहानियों में कहीं न कहीं ऐसी सामग्री शामिल अवश्य होती है जिससे विदेशों में बेचा जा सके। विदेशी नायके लिये देशी खलनायक चुना जाता है जो अप्रगतिशील आधारों पर चलता हो।  इतना ही नहीं अभिनेता और अभिनेत्रियों के व्यक्तिगत जीवन से जुड़े गॉसिपों में इसका प्रभाव देखा जा सकता है।  जिन लोगों को अपने देश का ज्ञान है और यह मानते हैं कि हमारा समाज प्रगतिशील है उनको इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि हम भले ही विकास की धारा के पोषक हैं पर विश्व समाज में एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल इसका दावा भर करता है और प्रचार माध्यमों में उसकी संकीर्णता को छिपाया जाता है।  विश्व समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन्मादी, शोषक तथा हिंसा न करते दिखता है पर कहीं न कहीं वह उसका पोषक है।  आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक साम्राज्यवाद की ललक भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कई समाजों में है पर वह संगीत, साहित्य और कला की आड़ में उसे छिपाने की करता है।  उसके लिये धर्म एक व्यक्तिगत विषय नहीं राज्य प्राप्त करने का शस्त्र है। हमारे भारतीय समाज में दो व्यक्तियों का धर्म प्रथक हो सकता है पर विश्व समाज के अनेक भागों में यह स्वीकार्य नहीं है। इस सत्य से आंखें फेरते हुए भारतीय मनोरंजक व्यवसायी कथित वैश्विक एकता वाली सामग्री प्रसारित करते हुए यह दिखाते हैं कि उनकी मानसिकता विकसित है।
     इस विषय में हम पाकिस्तान का उदाहरण देंगे।  हम यह तो मानते हैं कि  पाकिस्तान की जनता में सभी भारत विरोधी नहीं है पर इतना तय है कि एक बहुत बड़ा हिस्सा हमारी स्थिति से घृणा करता है। समाजों के आपसी रिश्तों को प्रगाढ़ बनाने के लिये हमारे मनोरंजक व्यवसायी पाकिस्तान से कलाकार लाते हैं।  कई कहानियों में पाकिस्तान का लड़का या लड़की का प्रेम होता दिखाते हैं। विवाह भी दिखाते हैं पर उनको यह पता नहीं कि विवाह का अर्थ संस्कारों का मेल भी होता है।  विवाह पूर्व जब धर्मिक और सामाजिक संस्कारों को निभाने की बात आती है तब लड़की को ससुराल की बात माननी पड़ती है। विवाह एक सामाजिक अनुबंध है और तय बात है कि इसका विरोध किया भी नहीं सकता कि लड़की को लड़के के परिवार के संस्कारों को मानना चाहिये। जिनको सामाजिक संस्कारों से परहेज हो उन्हें विवाह बंधन भी त्याग देना चाहिये क्योंकि यह मानव सभ्यता  को समाज  की देन है पर मनोरंजन व्यवसायियों के लिये यह संभव नहीं है क्योकि उनकी कहानी का आधार ही प्रेम कहानी का विवाह के रूप में परिवर्तित होते दिखाना है।  बहरहाल एक बात तय है कि जब तक पाकिस्तान अस्तित्व में है तब तक भारत से उसकी कभी बननी नहीं है।  वह एक उपनिवेश है जिसका उपयोग भारतीय समाज के दर्शन, साहित्य और कला का प्रतिरोध करने के लिये किया जाता है। उससे भी बड़ी एक अजीब बात यह है कि क्रिकेट में पाकिस्तान से भारत के संबंध नहीं है फिर भी भारत के चैनल उसके कमेंटटरों को बुलाता है तो मैचों के आयोंजक उसके अंपायरों को आमंत्रित करते हैं।  तय बात है कि इसके लिये राजनीतिक दबाव कम विदेशों का आर्थिक दबाव अधिक रहता होगा कि पाकिस्तान को किसी न किसी रूप में भारतीय खेल तथा मनोरंजन व्यवसाय से जोड़कर रखा जाये। इस पर भारतीय मनोरंजक व्यवसायियों के आर्थिक स्तोत्रों की भूमि मध्य एशिया में जो कि पाकिस्तान के सहधर्मी राष्ट्र हैं जिनके लिये कभी कभी वह उपनिवेश का भी काम करता है, उसकी वजह से पाकिस्तान का साथ वह निभाते हैं।  कोई समाचार चैनल कभी इसे स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि कहीं न कहीं वह उन्हीं मनोरंजन व्यवसायियों के स्वामित्व है या फिर वह उनके विज्ञापनदाता हैं।
             बहरहाल अपने आर्थिक गुणा भाग में माहिर इन टीवी चैनलों के प्रबंधक अपने कार्यक्रमों का स्तर बनाये रखने में सफल नहीं रहे बल्कि हम जैसे लोगों को अनेक बार दूरदर्शन की याद दिलाते हैं। यह अलग बात है कि आजकल दूरदर्शन भी इन्हीं व्यवसायिक चैनलों की शैली अपना रहा है हालांकि सरकारी होने की वजह से अपनी मार्यादायें छोड़ना उसके लिये संभव नहीं है। यही कारण है कि वह विदेशी एजेंडे को लागू नहीं करता।  यह एक अच्छी बात है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Monday, June 17, 2013

यह प्रलयकारी मानसून-हिन्दी लेख (yah pralaykari mansoon-hindi article on rain season)



    एक सप्ताह पूर्व तक देश में गर्मी का प्रकोप था।  उस समय वर्षा का इंतजार हो रहा था।  आमतौर से जून के माह में मानसून धीमे धीमे पूरे भारत में छा जाता है।  प्रारंभ में वर्षा अत्यंत सुकून देती है पर बाद में वह तेजी लाते हुए अनेक शहरों में बाढ़ का प्रकोप प्रकट करती है।  इस बार जिस तरह की बरसात आयी है उसका अनुमान मौसम विशेषज्ञों ने पहले नहीं दिया था।  मात्र कुछ पलों के सुकून के बाद अनेक शहरों में बरसात ने कहर बरपा दिया।  यह कहर ऐसा है कि मानसून आने की प्रसन्नता ही काफूर हो गयी।  गंगा यमुना उफनती आ रही हैं।  अनेक मकान और मंदिर ढह गये हैं।
  दरअसल हमारे देश में आबादी तेजी से बढ़ रही है और पर्यावरण के साथ ही प्रकृति से भी भारी छेड़छाड़ की गयी है। हम कहते हैं कि हमारे यहां आबादी ज्यादा है इस कारण लोग नदियों और नालों के किनारों पर कब्जा कर अपने मकान बनाते हैं और जब बाढ़ आ जाती है तब वह ढह जाते हैं। जमीन की कमी है  मगर जनसंख्या की वृद्धि  इकलौता कारण नहीं है जिसे हम इस तरह के प्राकृतिक प्रकोप को जायज ठहराते हैं। दरअसल हमारे देश में कथित विकास ने अनेक ऐसे लोगों को अधिक अमीर बना दिया है जिनके पास दो नंबर की कमाई है।  उनके पास सोने के बाद जमीन दूसरा विनिवेश करने का स्तोत्र है। देश के अनेक भागों में  भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़े गये अनेक लोगों के पास इतने मकान बरामद हुए हैं कि सरकारें उनको जनहित के लिये उपयेाग कर रही हैं।  दूसरी बात यह कि अधिकतर नदियों के किनारे तीर्थ स्थान होते हैं जहां वृद्धावस्था में लोग रहना चाहते हैं।  उनकी संतानें भी यही चाहती हैं कि बुजुर्ग घर से दूर रहें। जिनके पास पैसा है वह मकान लेकर रहते हैं। पूरे देश के साथ ही इन तीर्थस्थानों पर भवन निर्माण कंपनियों की चांदी कट रही है।  कुछ लोगों के पास तो इतना पैसा है कि वह इन तीर्थ स्थानों पर मकान केवल इसलिये लेकर खते हैं कि वहां खास अवसरों पर आकर रहेंगे। दूसरी बात यह कि समाचारों में भी यह बात आती है कि इन भवनों के निर्माण के लिये अधिगृहीत जमीनों पर भी अनेक प्रकार के विवाद होते हैं।  कहीं कहीं तो सरकारी अनुमति के बिना भी मकान बनाने की बात सामने आती हैं तीर्थ स्थानों पर बने अनेक धार्मिक स्थानों को लेकर झगड़े होते हैं।  ऐसे में नदियों के किनारे पर जमीनों पर मकान बनना कितना उचित है या अनुचित, इस विषय पर बहस करना अलग विषय है।  मूल बात यह कि इन किनारों पर इस तरह अतिक्रमण नहीं होना चाहिये। अगर हुए हैं तो नदियां  जब बिना अवरोध के अपना पानी लेकर चलती है तो कौन उनके आगे टिक सकता है।  अनेक बार असम में हाथियों के आतंक की चर्चा आती है तब पशु विज्ञानी कहते हैं कि हाथी मनुष्यों की जमीन पर नहंी आये बल्कि वही उनके इलाके में घुसकर मकान बना रहा है।  हाथी सीधा साधा जानवार है। अधिक प्रतिरोध नहीं कर सकता। इंसान ने हाथियों की जमीन की तरह नदियों के किनारों पर भी कब्जा कर लिया है  मगर नदियां बेबस नहीं होती।  उनमें धर्म और कर्म के नाम पर मनुष्य गंदगी विसर्जित करता रहता है। आठ महीने वह दंसान के अनाचार झेलती हैं पर मानसून में समंदर से भेजे गये बादलों से पानी लेकर वह चार मास तक मनुष्य पर वही गंदगी भेजती हैं जो आठ माह तक बहाता है।  यह अलग बात है कि किसकी गंदगी किसके पास जाती है मगर यह भी सच है कि नदी के निकट पहुंचने वाले लोग उसकी शुद्धता बनाये रखने का विचार नहीं करते।
        धन्य है गंगा मां! धन्य है यमुना मां!  मकान और मंदिरों में कोई भेद नहंी करती।  उनका यही निरपेक्ष भाव उनको माता का दर्जा दिलाता है।  मकान हो या मंदिर बनाये तो इंसान ने ही है।  धरतीपुत्र पहाड़ों की गर्दन उड़ाने के बाद मनुष्य चाहे  जितना धार्मिक होने का दावा करे नदियां उसे स्वीकार नहीं करती और इंसानों के हाथ  से पत्थरों की बनायी गयी  भगवान  मूर्तियों का जलाभिषेक करने के बाद उन्हें अपने जल में बिना प्रयास साथ ले जाती हैं। एक टीवी चैनल कहा रहा था किदेखो, नदी पर स्थित भगवान शिव का मंदिर ढह गया।  यह मंदिर उस मनुष्य जाति का बना था जो दावा तो करती है कि गंगा और शिव को मानने का पर अपने ही धन और बाहुबल से उनको चुनौती भे देती हैं।  भगवान के नाम पर आडंबर कर अनेक मनुष्य स्वयं को देवता की तरह दिखाने का प्रयास करते हैं।  किसी ने जोगिया तो किसी ने सफेद वस्त्र पहन लिये हैं।
  अभी हाल ही में इलाहाबाद में महाकुंभ संपन्न हुआ था तब अनेक धार्मिक प्रवृत्ति के जागरुक लोगों ने गंगा के प्रदूषित जल पर निराशा जताई थी।  उस  समय विशेषज्ञों ने साफ कहा था कि गंगा के जल में नहाना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक भी हो सकता है। तब टीवी चैनलों में पवित्र नदियों के जल की दर्दनाक स्थिति का बयान देखने को मिला।  सभी कहते हैं कि नदियों का जल शुद्ध रखने का प्रयास हो, पर करे कौन? न भी करें तो इतना तो तय किया जा सकता है कि हम अब नंदियों में कचड़ा प्रवाहित न करें।  यह भी नहीं करना चाहते।  ऐसे में नदियों के हृदय में कभी कभी तो आता ही होगा कि वह कुछ समय तक अपने जल  से गंदगी बाहर करें।  जैसा कि हम नदियों को माता मानते हैं तो यह भी मानना चाहिये कि उनका भी हृदय तो होता ही होगा।  यह भी मानना चाहिये कि इन नदियों मे में इतनी शक्ति है खास अवसरों पर इनमें  नहाने से पुण्य मिलता है तो यह भी मानना चाहिये कि वह मनुष्य जाति के पापों को बाहर आकर उसी के पास सौंपना भी जानती हैं।
    बहरहाल इस बार के मानसून ने ज्यादा समय तक प्रसन्न रहने का अवसर नहीं दिया।  हालांकि अभी बरसात प्रारंभ हुई है और संभावना इसी बात की है कि आगे बरसात नियमित रूप से होती रहेगी। तब शायद यह प्रकोप इतना न हो जितना अब दिख रहा हैं।
   

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Monday, May 20, 2013

विशेष रविवारीय लेख-क्रिकेट मैचों पर सट्टा लगाने वाले लोग मासूम नहीं special sandey article-cricket matchon par satta lagane wale log masoom nahin



         कभी भारतीय जनमानस के नायक रहे श्रीसंत ने अपने आचरण ने स्वयं को खलनायक के पद पर प्रतिष्ठत कर लिया है।  लोगों की याद्दाश्त कमजोर होती है पर लेखकों को अपने दिमाग में अनेक यादें संजोकर  रखनी पड़ती हैं ताकि कभी उनका उपयोग किया जा सके।  2009 में बीसीसीआई की क्रिकेट टीम ने इंग्लैंड में बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता जीती थी। फाइनल में श्रीसंत ने पाकिस्तान के आखिरी खिलाड़ी मिसबा उल हक की चार रन के लिये उड़ती जा रही गेंद लपककर मैच जितवा दिया था। गेंद अगर बाहर जाती तो पाकिस्तान जीत जाता।  उस समय तक क्रिकेट मैचों का बीस ओवरीय प्रारूप भारत में लोकप्रिय नहीं था। इतना ही नहीं भारत में क्रिकेट खेल की प्रतिष्ठा भी कम होती जा रही थी।  उस कैच ने न केवल बीस ओवरीय प्रारूप को भारत में लोकप्रिय बनाया वरन् क्रिकेट खेल की प्रतिष्ठा भी वापस दिलवाई।  हमारे यहंा लोकप्रियता का पैमाना लोगों की आंखों में सम्मान से कम उनके खर्च करने वाले पैसों के आधार पर तय की जाती है।  फिल्म का नायक ज्यादा पैसा लेता तो वह नंबर वन होता है।  खिलाड़ी की  लोकप्रियता इस आधार पर तय होती है कि उसे प्रदर्शन पर  पैसा कितना मिलता है?  खेल की लोकप्रियता इस आधार पर तय होती है कि उस दाव कितना लोग लगाते हैं!
        बहरहाल श्रीसंत चेहरे से जहां सुंदर थे वहीं उनकी गेंदबाजी भी गजब की थी।  पता नहीं लोकप्रियता का मतलब उनकी नज़र मे क्या था?  उन्हें पता ही नहंी भारतीय जनमानस में उनकी प्रतिष्ठा कितनी थी?  अगर इसका विचार होता तो वह कभी उन आरोपों के शिकार नहीं होते जो उन पर लगे हैं।  श्रीसंत का खेल निरंतर गिरता जा रहा था।  फिर वह अनेक बार जब बीसीसीआई की टीम में नहीं दिखते तो हैरानी होती थी। कहा जाता था कि उनको चोटें परेशान कर रही हैं!  उनके प्रशंसकों  को लगता था कि उनके साथ अन्याय हो रहा है।  यह अब पता चला है कि वह अपनी प्रतिष्ठा का नकदीकरण करने लग गये थे। क्रिकेट में पाने के लिये अब उनके पास कुछ नहीं था!  विश्व कप जीतने वाले खिलाड़ी के लिये बाकी सारे मैच छोटे हो जाते हैं।  श्रीसंत निरंतर अच्छा खेलते तो उनके लिये कोई उपलब्धि विश्व कप से बड़ी नहीं होती।  शायद यही कारण है कि उनके लिये अब धन अधिक महत्वपूर्ण हो गया होगा।   पार्टियों में सुंदरियों के साथ नाचते हुए उनके फोटो इस बात का प्रमाण है कि उनका लक्ष्य केवल अपनी  विश्व कप विजेता की छवि भुनाना भर था।  सच बात तो यह है कि एक खिलाड़ी के रूप में अब उनके सामने अपने अस्तित्व का संकट है पर उनके प्रशंसकों के लिये तो दिल टूटने वाली स्थिति है। बीस ओवरीय प्रतियोगिता के फायनल में मिसबा उल हक का कैच लेकर उन्होंने जो प्रतिष्ठा कमाई थी वह इस तरह मिट्टी में मिल जायेगी यह कल्पना कौन कर सकता था?
           क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिताओं में फिक्सिंग होती है यह चर्चा आम रही है।  लोग कह रहे हैं कि श्रीसंत की वजह से क्रिकेट कलंकित हुई है तो थोड़ा आश्चर्यजनक भी लगता है।  जो लोग इस पर सट्टा लगाकर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करते हैं उनके बारे में भी तो कुछ कहना ही चाहिये।  ऐसा दिखाया जा रहा है कि सट्टा लगाने वाले आम लोग कोई मासूम हों! हैरानी होती है यह सब सुनकर! एक नहीं दस बार यही प्रचार माध्यम कह चुके हैं कि वहां फिक्सिंग वगैरह होती है।  इसके बावजूद क्या लोगों की अक्ल मारी गयी है? कहा जाता है कि भारत में क्रिकेट एक धर्म की तरह है! यह केवल कोरी बकवास है। हमने बरसों से क्रिकेट देखी है। बीसीसीआई को टीम से कभी बहुत लगाव रहा पर अब पता लगा कि वह तो एक निजी संस्था है।  फिर भी अनेक बार समय मिलने पर क्रिकेट मैच देखते हैं। किसी खिलाड़ी के प्रति लगाव होता है तो उसकी सफलता पर खुश होते हैं।  किसी खिलाड़ी से लगाव नहीं है तो फिल्म की तरह देखते हैं।  सट्टा लगाकर स्वयं खिलाड़ी बनेंगे तो फिर खेल का मजा क्या खाक लेंगे? सीधी बात कहें तो सट्टा लगाने वाले अपने लिये खेलते हैं।  वह दर्शक नहीं खिलाड़ी होते हैं। एक खिलाड़ी जब स्वयं खेलता है तो वह दूसरे का खेल नहीं देख पाता। खेल देखने के लिये दर्शक बनकर बैठना जरूरी है।  शायद क्रिकेट में बढ़ता सट्टा ही उसे धर्म के नाम से पुकारने के लिये प्रचार माध्यमों को मजबूर कर रहा है।  जैसे हर धर्म में कर्मकांड होता है वैसे ही क्रिकेट धर्म का कर्मकांड शायद मैच फिक्सिंग है।  क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में छक्के चौके पर नर्तकिंया नृत्य करती हैं। नर्तकियों के भी दो झुंड होते हैं जो अपनी अपनी टीम की सफलता पर त्वरित नृत्य करती हैं।  हमने क्लब सुने हैं, बार सुने हैं जहां नर्तकिंया नृत्य कर आगंतुकों का मन बहलाती हैं पर उनकी स्थापना के लिये सरकारी लायसेंस जरूरी माना गया है।  क्लब स्तरीय प्रतियोगिताओं के नृत्य के लिये लायसेंस अनिवार्य नहीं है यह देखकर हैरानी होती है।
    अभी तो जांच एजेंसियों  ने मैच फिक्सिंग को लेकर कार्यवाही की है। कल को वह इस नृत्य कार्यक्रम के लिये लायसेंस न होने की बात कहकर भी कार्यवाही कर सकती है।  मगर ऐसा होगा नहीं क्योंकि क्रिकेट एक धर्म बनाकर प्रचारित किया जा रहा है। अगर उसमें नृत्य पर पुलिस कार्यवाही करती है तो कहा जायेगा कि सर्वशक्तिमान के अनेक रूप  के दरबार में भी तो नृत्य होते हैं तब वहां कार्यवाही क्यों नहीं करते? तय बात है कि धर्मनिरपेक्षता की दुहाई दी जायेगी।  देश का चालीस से पचास हजार करोड़ रुपये इस सट्टे की भेंट चढ़ता है।  ऐसे में मन में एक प्रश्न होता है कि क्या क्या गायों, भैंसों या बकरियों के पास पैसा है जो यह धन लगाती हैं। तय बात है कि मनुष्य ही सट्टा लगाते हैं।  जब क्रिकेट को धर्म बताने वाले प्रचार माध्यम ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में सट्टा और मैच फिक्सिंग की बात कहते रहे हैं तो क्या हमारे देश के मनुष्य जातीय समाज को यह बात समझ में नहीं आ रही।
संत कबीर दास जी कह गये है कि
सांई इतना दीजिये, जा में कुटुंब समाय
आप भी भूखा न रहूं, अतिथि भी भूखा न जाये।
       शायद उन्होंने यह याचना इसलिये की थी कि अधिक धन आने पर मति मारी जाती है।  जिनकी मति मारी जाती है वह मनुष्य पशु समान होता है।  तब क्रिकेट मैचों पर सट्टा लगाकर बरबाद होने वाले मनुष्य के हमदर्दी समाप्त हो जाती है।  बहरहाल हम क्रिकेट मैचों के साथ ही उन पर बाहर हो रही चर्चा देखकर यह सोचते हैं कि हम किसमें दिलचस्पी दिखायें। मैचों पर या बहस में!  इधर मैच चल रहा है तो उधर बहस चल रही है।  बार बार टीवी का चैनल बदलते हैं।  न इधर के रहते हैं न उधर के!  तब हमें एक ही मार्ग बेहतर लगता है कि स्वयं ही कुछ लिख डालेें। यह लेख उसी विचार का परिणाम है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Saturday, May 4, 2013

भारतीय योग संस्थान के शिविर में जाने पर कुछ सीखने को मिलता ही है-विशिष्ट रविवारीय हिन्दी लेख (bhartiya yoga sansthan ke shivir mein jane par kucch seekhne ko milta hee hai-special sanday hindi article,visheh ravivariya hindi lekh)



    
भारतीय योग संस्थान के विशेष शिविर का दृश्य
जब कभी भारतीय योग संस्थान के विशेष शिविरों में जाने का अवसर मिलता है तब हमें यह देखकर प्रसन्नता होती है कि वहां विद्वानों के विचार सुनकर कुछ न कुछ नया विचार मिलता है। दरअसल अगर यह कहें कि कोई नया विचार मिलता है तो स्वयं को अजीब लगता है क्योंकि उनके विचार हमारे दिमाग मेंकहीं न कहीं  हमेशा रहते हैं।  बस
, उनको सार्वजनिक रूप से कहने का अवसर नहीं मिलता या हम उनहें  ढूंढते नहीं है।  अपने ब्लॉग पर अक्सर हमने भारतीय योग विद्या के बारे में लिखा है।  उसके लाभों की चर्चा करते हुए हमने अनेक पाठ लिखे हैं।  इन शिविरों में जाने पर हर विचार हमें नया लगता ही है चाहे भले ही वह कभी हमारे अंतर्मन में स्थित होकर विचरता रहा हो।  एक तरह से कहें तो मस्तिष्क में चल रहा विचार जब पुष्ट होता है तो वह नवीन हो जाता है। दूसरी बात यह भी है कि  शब्दों तथा उनको व्यक्त करने की शैली भी उसे नया बना देती है।
          आज हमें अपने ही ग्वालियर शहर के भारतीय योग संस्थान के  दो दिवसीय शिविर में जाने का अवसर मिला।  हम उसमें नियमित रूप से तो शामिल होने में असमर्थ थे पर अपने शिविर के बाहरी साधकों से मिलकर उनको जानने की जिज्ञासा हमें कुछ देर के लिये वहां ले ही गयी।  ऐसे अवसरों पर स्वयं मौन रहकर बहुत सीखा जा सकता है।  सबसे पहले तो उन निष्काम प्रवृत्ति के विद्वानों की सराहना करने का मन करता है जो अपने अनुभव तथा विचार वहां व्यक्त कर रहे थे।  उनके विचार सुनने के साथ ही हम उनके हाव भाव के साथ ही शब्दों पर भी अपना ध्यान रखे हुए थे। 
         आमतौर से पेशेवर धार्मिक तथा योग शिक्षक कामना भाव के कारण पारंगत होकर श्रोताओं को प्रभावित करते हैं पर निष्काम भाव से भी लोगों को प्रभावित किया जा सकता है, यह बात भारतीय योग संस्थान को देखकर सीखी जा सकती है।  भारतीय योग विज्ञान का प्रचार करने की शपथ लेने वाले इन विद्वानों के चेहरे पर तेज टपकता है तो वाणी से निकले शब्द योगरस में नहाये लगते हैं।  वहां मौजूद योग साधकों पर भी दृष्टिपात किया।  भारतीय योग संस्थान में निष्कामी विद्वानों और हमारे बीच तब थोड़ा मार्ग अलग हो जाता है जब हम अपनी गीता ज्ञान की दृष्टि जमाकर विचार करते हैं।  हमारे हिसाब से योगी भी भक्त है जिनके भक्तों की तरह चार प्रकार  होते हैं-ज्ञानी, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा आर्ती।  भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि हजारों में कोई एक मुझे भजेगा और उन हजारों में भी कोई मुझे एक पायेगा। फिर वह कहते हैं कि ज्ञानी मेरा ही रूप है और वही मुझे पाता है।  वहां एक विद्वान ने यह भी माना कि हमारा काम है लोगों को बताना। सभी अमल नहीं करेंगे पर कुछ तो उसका असर होगा। 
       वहां लोगों को दो घंटे का मौन रखकर तप करने के लिये कहा गया पर किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। हम तो देरी से पहुंचे थे। वहां लोगों से बात की पर उनके मौन तप के भंग में हमारा कोई योगदान नहीं है क्योंकि वह सभी तो पहले से वार्तालाप में लगे हुए थे। संभव है कुछ लोगों को वह शिविर बोर करने वाला लगे पर इतना तय है कि जिनके मन में योग को लेकर जिज्ञासायें वहां उनके निराकरण के पूरे अवसर हैं।
   अगर योग साधक की अपनी श्रेणी की बात करें तो हम अभी तक स्वयं को अर्थाथी श्रेणी का मानते हैं।  जहां तक प्रचारक के रूप में माने तो वह भी इसी श्रेणी में आता है। इस पर लिखने से हमारे मन की भूख शंात होती है।  यह हम अपने बारे में स्वयं मानते हैं इसका श्रेय श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन को जाता है जिसके प्रति हमारा निष्काम भाव है।  इन शिविरों में जिज्ञासु बनकर जाते हैं। योग साधना की शरण हमने आर्त भाव से ली थी।  जहां तक ज्ञानी का प्रश्न है उसका निर्णय तो हमारे जीवनकाल में तो होना ही नहीं है इसलिये चिंता छोड़ दी है।
         एक महत्वपूर्ण बात यह देखने को मिलती है कि हम जिन विद्वानों को सुनते हैं ऐसा लगता है कि वह हमारे मन की बात कह रहे हैं।  अच्छा लगता इसलिये क्योंकि वह वही बात कह रहे हैं जो हम सुनना चाहते है।  ऐसे में वक्ता और श्रोता का अंतर हमारे अंदर नहीं रहता।  ऐसा लगता है कि हम अपने से ही बात कर रहे हैं। दूसरी बात यह भी लगती है कि निरंतर योग साधना करने वाले अगर किसी दूसरे की बात न भी सुने तो भी उनके अंदर वैसे ही विचार योग साधना करते हुए स्वतः  एक जैस  हो जायेंगे जो अन्य विद्वानों के हैं।  कोई भी  व्यक्ति नियमित योगाभ्यास से क्षेत्रज्ञ बन जाता है।  वह न केवल अपनी देह बल्कि प्रकृति और अंतरिक्ष की संरचना को भी समझ सकता है।  इसलिये नियमित योग साधकों और शिक्षकों के विचार एक ही मार्ग पर आ जाते हैं। 
      हमने अनेक बार लिखा है कि योग तो हर मनुष्य करता है।  अंतर इतना है कि आम मनुष्य चंचल मन, मुख और मस्तिष्क को इंद्रियों के वश में रखकर असहज योग के मार्ग पर चलता है जबकि योग साधक सहज योग की तरफ जाते हैं।  असहज योग के अनेक मार्ग है पर सहज योग का मार्ग एक ही है। कोई आगे चलते हुए किसी पड़ाव पर आया और उसने उस उस स्थान ं का ज्ञान प्राप्त किया। दूसरा पीछे है और जब वह उसी पड़ाव पर आयेगा तो वह भी वैसा ही ज्ञान प्राप्त करता है।  एक ही मार्ग होने के कारण  सहज योगियों के विचारों में साम्यता होती है जबकि असहज योगी अनेक मार्गों के कारण हमेशा ही संशय में पड़े होते हैं।  असहज योगी को पता ही नहीं कि उसकी देह के विकारों का जनक कौन है? इसके लिये वह अनेक तरह के परीक्षण करता फिरता है।  असहज योगियों के बीच बीमारियों की दवाओं और चिकित्सकों के ही चर्चे होते हैं। जबकि सहज योग प्रवृत्ति और निवृत्ति का मार्ग जानते हैं इसलिये पहले तो विकार पैदा होने ही नहीं देते और हो भी जायें तो उनको निकालना भी जानते हैं।
        आखिर में हमें  यह कहना है कि  कि एक विद्वान ने कहा कि हमें योग संस्थान के प्रचार करना चाहिये। भारतीय योग संस्थान की प्रशिक्षण शैली ऐसी है कि किसी साधक को योग साधन करते  देखकर ही पता चल जाता है कि उसने वहीं से सब सीखा है।  सभी को यह बताना चाहिये कि भारतीय योग संस्थान ही इस विषय में सबसे श्रेष्ठ संगठन है।  हमें यह सुनकर हैरानी हुई क्योंकि यह बात तो हमने अनेक पाठों में पहले ही लिखी है।  यही इस बात का प्रमाण है कि सहज योगियों के आपस में बिना मिले भी एक जैसे विचार हो जाते हैं।     

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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