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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Sunday, April 9, 2017

ढोल की तरह दूर का चेहरा भी हर बार नया लगे-हिन्दी क्षणिकायें (Dhol ki taraha door ka chehara bhi naya lag-Hindi Short Poem)

रोज नये नायक
बदलाव की बात कह जाते हैं।
फिर मजबूरी जताकर
चलती धारा में बह जाते हैं।
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दिल पर नाम लिख्स
फिर मिटा देते हैं।
आज के आशिक
मासूम दिल
कितनी बार पिटा लेते हैं।
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इश्क आशिक की इबादत है
भक्ति प्रेमी की आदत है।
हर भाषा का भाव अलग
यही अदावत है।
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दिल का क्या कसूर
मौसम बदल जाते हैं।
बेवफाई पर सवाल क्यों
हालात से मतलब के
दौर बदल जाते हैं।
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सब पी रहे दर्द
एक बूंद खुशी की आस है।
फिर भी डालते हाथ वहां
जहां लालची का वास है।
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जिंदा इंसान की
परवाह नहीं
मरे हुए भूत से डरते हैं।
मिट्टी के बुत में सौंदर्य
कपास के सूत से भरते हैं।
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वही कत्लखानों में फरिश्ता
अपना देखते हैं।
जो लाश खाकर
सेहत बनाने का
सपना देखते हैं।
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पहचान से सभी
अपने नही हो जाते।
कटु सत्य के साथी
कभी सपने नहीं हो पाते।
......
ढोल की तरह
दूर का चेहरा भी
हर बार नया लगे।
जिसके पास है
उसे गुजरा गया लगे।
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मदारी भी बंदर के
सहारे भीड़ लगा लेते हैं।
तारीफ है उनकी 
जो मौन से ज़माने में
चेतना जगा देते हैं।
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डूबने का खतरा
उनके लिये 
जो भीड़ में  नाव पर चढ़े हैं।
डरे हैं वह
जो औकात से ज्यादा
बड़े तख्त पर चढ़े हैं।
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ऊचे ओहदे पर
कोई मद से नहीं बच पाता।
खाना पचाने के ढेर मंत्र
पर खजाना कभी नहीं पच पाता।

Monday, March 27, 2017

हमने तो चंद शब्दों में अपनी बात कही-छोटीकविताये एवं क्षणिकायें (Hamane to chand shabdon mein apni bat kahi Thi-HindiShortPoem)

चाहें तो स्वयं पर भी
हंस सकते हैं।
मगर बेबस
दूसरे पर मजाक बकते हैं।
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हमने तो चंद शब्दों में
अपनी बात कही।
उनकी अक्ल का
दरवाजा बंद था
इसलिये बाहर ही रही।
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पेड़ के पत्तों पर भी
जीवन संदेश अंकित है
कोई पढ़ तो पाये,

खुशी होती है
जब किसी को 
चहकता देखते हैं।
इसी बहाने
अपना मन भी
महकता देखते है।
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जिस्म के घाव सभी देखें
दिल के कोई नहीं पढ़ पाता।
झेलते सभी
हर कोई शेर नहीं गढ़ पाता।
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हर बार तुम्हारी 
पसंद की बात नहीं कहेंगे।
एक रस में डूबकर
हम अपनी पसंद नहीं रहेंगे।
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अब चित्रों से दिल
नहीं बहलता
कुछ शब्द भी लिखा करो।
स्थिर आंखें मौन हैं
मन की बात करते दिखा करो।
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Wednesday, March 8, 2017

लगे करचोरी में सीना फुलाते हैं-दीपकबापूवाणी (Strong Body Languase Of TexThief-DeepakBapuWani)

मुफ्त में तोहफे सभी आशिक चाहें, अक्ल के अंधे इश्क में ढूंढें रौशन राहें।
‘दीपकबापू’ जज़्बात के बाज़ार में खड़े, सौदागरों के दाम सुन भरते आहें।।
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बंद कर दिये भक्ति के अपने दरवाजे, आसक्ति के घर बजा रहे बाजे।
‘दीपकबापू’ अमृत से किया मन खाली, विष में ढूंढते आनंद फल ताजे।।
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बाहर वजूद ढूंढते रहे अंदर झांका नहीं, चीजों का मोल किया अपना आंका नहीं।
‘दीपकबापू‘ देखते रहे सब का वेश, कभी अपने फटे वस्त्र पर लगाया टांका नहीं।।
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जिंदगी की राहें कहीं भी मुड़तीं हैं, हृदय की भावनाऐं कहीं भी जुड़ती हैं।
‘दीपकबापू’ फिर भी बेचैनी बांधे चलते साथ, सोच चिंता में उड़ती है।।
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अनोखे दिखने में सब आम लगे हैं, जरूरतों के गुलाम खुद को ठगे हैं।
‘दीपकबापू’ न जागते न नींद आती, लालच से पैदा संकट में सब जगे हैं।।
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भीड़ में मिलने वाले होते तो अकेले में खड़े तुम्हें क्यों बुलाते।
जज्बात मरे होते तो तुम्हारी याद के सहारे उनको कैसे सुलाते।।
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अपनी नीयत पर बस नहीं चलता, गैर के हर कदम पर शक पलता।
‘दीपकबापू’ छिछोरे से बने सुल्तान, बात से बतंगड़ में पूरा दिन ढलता।।
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नशे में गुम तो पूरा जमाना है, किसी को पीना किसी को कमाना है।
‘दीपकबापू’ कहीं हिसाब नहीं लिखा, बुरी आदतें भूलने का बहाना है।।
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लोहे की सलाखें हों तो यूं ही फाड़ें, मन का पिंजर भाव से कैसे झाड़ें।
‘दीपकबापू’ चाहतों की बनायी बड़ी सूची, बाकी दुनियां का दर्द कैसे ताड़ें।।
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जिंदगी जीन के भी कई ढंग हैं, मस्ती के रास्ते भी बहुत तंग हैं।
‘दीपकबापू’ नजरिये का खेल देखें,  स्याल धवल आंखों में भरे रंग हैं।।
ज्ञानी कहां मिले सब माया को रोय, गुरु ढूंढे सभी धन से पस्त होय।
‘दीपकबापू’ भृकृटि पर गढ़ाये दृष्टि, ज्ञान की तेज धारा में मस्त होय।।
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बंद कर लेते अपने दिल के दरवाजे, मुख से प्रेम शब्द के बजाते बाजे।
‘दीपकबापू’ सोच से किया किनारा, कंधे पर ढो रहे चिंताओं के जनाजे।।
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लगे करचोरी में सीना फुलाते हैं, अनजान लोग साहुकार नाम बुलाते हैं।
‘दीपकबापू’ अपना महिमामंडन करते, दान के पाखंड रचकर पाप भुलाते हैं।।
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शब्द में बोले पर दिल से प्रेम कभी किया नहीं,
सम्मान के नारे लगाये पर किसी को दिया नहीं।
सभी एक दूजे पर घाव करने के लिये हैं आमादा,
‘दीपकबापू’ किसी ने मरहम लगाने को लिया नहीं।।
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Tuesday, January 3, 2017

नोटबंदी के बाद सामान्य स्थिति की कामना यानि कालेधन की पुर्नस्थापना का सपना-हिन्दी चिंत्तन लेख (After DeMonetisation thinking of Normalisation means Dream for Balck Money-Hindi Thought artciel)

                            नोटबंदी के बाद ग्वालियर से बाहर हमारी पहली यात्रा वृंदावन की हुई। रेल से लेकर घर ता आने के बीच कहीं लगा नहीं कि देश में मुद्रा की कमी चल रही है।  सात दिन तक भीड़ के बीच नोटबंदी की चर्चा तो सुनी पर किसी ने परेशानी बयान नहीं की।  वापसी में ऑटो वाला तो प्रधानमंत्री मोदी का ऐसा गुणगान कर रहा था जैसे मानो उसे पंख लग गये हों।  सबसे बड़ी बात जो हमें लगी कि अमीरों ने अपने प्रदर्शन से जो कुंठा सामान्यजनों में पैदा की वह अब समाप्त हो गयी है-हम देश को मनोवैज्ञानिक लाभ होने की बात पहले भी लिख चुके हैं। सामान्यजनों की रुचि इस बात में नहीं है कि बैंकों में कितना कालाधन आया बल्कि वह तो धनिक वर्ग के वैभव का मूल्य पतन देखकर खुश हो रहा है।
                      नोटबंदी ने प्रधानमंत्री मोदी को एक तरह से जननायक बना दिया है। अनेक बड़े अर्थशास्त्री भले आंकड़ों के खेल दिखाकर आलोचना में कुछ भी कहें पर हम जैसे जमीन के अर्थशास्त्री सामान्यजनों के मन के भाव पर दृष्टिपात करते हैं।  अभी सरकार कह रही है कि फरवरी के अंत तक स्थिति सामान्य होगी।  हम जैसे लोग चाहते हैं कि यह स्थिति यानि नकदी मुद्रा की सीमा अगले वर्ष तक बनी रहे तो मजा आ जाये।  बताया जाता है कि इस समय साढ़े आठ लाख करोड़ रुपये की मुद्रा प्रचलन में है और हमारे अनुसार यह पर्याप्त है।  अब नये नोट छापने की बजाय बैंकों से वर्तमान उपलब्ध मुद्रा को ही घुमाने फिराने को निर्देश दिया जाये तो देश के आर्थिक, सामाजिक और मानसिक स्थिति के लिये सबसे बेहतर रहेगा।
            बैंक तथा एटीएम से भीड़ नदारद है।  बड़े भुगतान एटीएम से खातों में किये जा सकते हैं।  ऐसे में वह कौन लोग हैं जो यह चाहते हैं कि पूरी तरह मुद्रा बाज़ार में आये और नकद भुगतान की सीमा समाप्त हो? उत्तर हमने खोज निकाला।  अनेक लेनदेन दो नंबर मेें किये जाते हैं ताकि राजस्व भुगतान से बचा जा सके।  खासतौर से भवन निर्माण व्यवसाय तो करचोरी का महाकुंुभ बन गया है।  इसका पता हमें तब चला जब हमारे एक परिचित ने एक निर्मित भवन खरीदने की इच्छा जताई।
               नाम तो पता नहीं पर वह किसी मध्यस्थ के पास हमें ले गये।  हमारे परिचित का पूरा धन एक नंबर का है।  दलाल से उन्होंने बात की तो उसने साफ कहा कि इस समय तो भवनों की कीमत गिरी हुई है पर बेचने वाले भी तैयार नहीं है। हमारे मित्र ने अपनी त्वरित इच्छा जताई तो उन्होंने एक 26 लाख की कीमत वाले भवन की कीमत 23 लाख बताई।  जब उनसे रजिस्ट्री का मूल्य पूछा गया तो वह बोले इसका आधा या कम ही समझ लो। हमारे मित्र ने बताया कि वह तो पूरा पैसा चैक से करेंगे।  तब उसने साफ मना कर दिया हमारे साथी  ने केवल चैक के भुगतान की बात दोहराई।  हमारे मित्र ने बताया कि वह अन्य मध्यस्थों से भी ऐसी ही बात कर चुके हैं।
             हमारा माथा ठनका। भवन की जो कीमत सरकारें रजिस्ट्री के लिये तय करती हैं उससे अधिक निर्माता वसूल करता है। रजिस्ट्री की कीमत वह चैक से ले सकता है पर उससे आगे वह खुलकर कालाधन मांग रहा है। यहां से हमारा चिंत्तन भी प्रारंभ हुआ।  आठ नवंबर से पूर्व देश में कुल 17 लाख करोड़ रुपये की मुद्रा प्रचलन में थी पर यह एक माध्यम थी।  अगर देश में समस्त नागरिकों के खातों में जमा रकम का अनुमान करें तो वह करोड़ करोड़ गुना भी हो सकती है पर सभी एक दिन ही एक समय में पूरी रकम नहीं निकालने जाते।  कोई जमा करता तो कोई दूसरा  निकालता है। इस तरक मुद्रा चक्र घूमता है तो पता नहीं चलता।  आठ नवंबर से नकदी निकालने की सीमा ने सारा गणित बिगाड़ दिया।  अनेक लोगों ने भूमि, भवन, सोना तथा शेयर में अपना पैसा लगा रखा है और आठ नवंबर से पूर्व वह उनके मूल्य पर इतराते थे।  विमुद्रीकरण ने उनकी हवा निकाल दी है। पहले जो पांच या दस करोड़ की संपत्ति इतराता था वह अब उसका वर्तमान मूल्य बतलाते हुए हकलाता है।  बताये तो तब जब बाज़ार में कोई खरीदने की चाहत वाला इंसान मिल जाये।
                    उस दिन एक टीवी  चैनल पर  भवन निर्माता मोदी जी के भाषण पर चर्चा करते हुए कह रहा था कि उन्होंने सब बताया पर यह नहीं स्पष्ट किया कि नकदी निकालने की सीमा कब खत्म होगी?  हमने मजदूर निकाल दिये क्योंकि उनको देने के लिये पैसा नहीं मिल पा रहा। फिर हमारा उद्धार तब होगा जब नये प्रोजेक्ट मिलेंगें।
                 वह सरासर झूठ बोल रहा था। भवन निर्माता इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि नयी मुद्रा कब कालेधन का रूप ले ताकि उन्हें सरकारी कीमत से ज्यादा मूल्य मिले।  भवन निर्माण व्यवसायी तथा मध्यस्थ छह महीने तक सामान्य स्थिति अर्थात नयी मुद्रा के कालेधन में परिवर्तित होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।  मजदूरों का नाम तो वह ऐसे ही ले रहे हैं जैसे समाज सेवक उनका मत पाने के लिये करते हैं। 
             हमारे अनुसार प्रधानमंत्री श्रीमोदी को नोटबंदी के बाद की प्रक्रियाओं पर भी सतत नज़र रखना चाहिये ताकि कहीं अधिकारीगण इन कालेधनिकों के दबाव में उतनी मुद्रा न जारी कर दें जितनी पहले थी।  बाज़ार में दिख रही  छटपटाहट उन कालेधन वालों की है जो कि राजस्व चोरी कर अपनी वैभव खड़ा करते हैं। हम जैसे जमीनी अर्थशास्त्री तो अब यह अनुभव करने लगे हैं कि देश ने 70 सालों में कथित विकास कालेधन का ही था।  सरकार के राजस्व में भारी बढ़ोतरी उस अनुपात में नहीं देखी गयी जितना आर्थिक विकास होने का दावा किया जाता है।


Wednesday, December 21, 2016

ईमानदारी नहीं बनती आदत-हिन्दी व्यंग्य कविता (Imandari Nahin Banti Adat-HindiSatirePoem)


सौदागर बेचते
मासूमों के बाजार में
ज़माने की भलाई।

सौदे में चीज
कभी देनी नहीं
मुंह में मिलती मलाई।

कहें दीपकबापू मधु का मेह
इतना हो गया है
फिर भी स्वाद
उनका मिटता नहीं
बेईमानों के लिये
ईमानदारी की आदत
कभी नहीं बनती दवाई।
---

Wednesday, November 2, 2016

लोकतंत्र में सेवक स्वामी-हिन्दी व्यंग्य कविता (Loktantra mein Sewas Swami-Hindi Satire Poem)

लोकतंत्र के पर्दे पर कलाकार
कभी नायक 
कभी खलनायक की
भूमिका निभाते हैं।

कभी परस्पर मित्र
कभी शत्रुता निभाते हैं।

कहें दीपकबापू यह खेल है
पैसा फैंकने वाले
बन जाते निदेशक
लेने वाले इशारा मिलते ही
कभी सेवक 
कभी स्वामी की भूमिका निभाते हैं।
---
-दीपक ‘भारतदीप’-

Thursday, October 13, 2016

अमेरिका व रूस के तेवर से विश्वयुद्ध के आसार-हिन्दी लेख (America And Russia Preparing Third Worldwar-Hindi Article)

       
                                            यह खबर भारतीय प्रचार माध्यमों से लापता है कि सऊदी अरब ने मुहर्रम के अवसर पर यमन की एक मस्जिद बमबारी की जिसमें करीब 200 नमाज मार गये तथा 500 से अधिक घायल हुए। फेसबुक पर ही यह खबर देखने को मिली।  वैसे भी शियाओं को अपना दुश्मन मानने वाला सऊदी अरब इस समय ईरान को भी ललकार रहा हैं।  उधर रूस व अमेरिका भी तीसरे विश्व युद्ध का भय पैदा करते हुए नज़र आ रहे हैं।  इस समय भारत और पाकिस्तान के बीच तो द्वंद्व पहले से था अब दोनों के अंदर भी वाक्युद्ध तेजी से चल रहा है।  सच बात तो यह है कि अगर दोनों जगह कोई ज्वलंत विषय नहीं भी होता तो तीसरी दुनियां के द्वंद्व में उनको फंसना ही था। समस्या यह है कि पाकिस्तान अपने जिन सहधर्मी राष्ट्रों की धोंस दिखाता है सभी भारी संकट में फंसे हैं।  इतना ही नहीं भारत में भी कुछ ऐसी ताकते हैं जो पश्चिमी प्रभाव में यहां अपना रुतवा दिखाती हैं।  इस समय पूरा पश्चिम डांवाडोल हैं। अमेरिका लगातार पाकिस्तान को डांट लगा रहा है पर इससे भारत के लिये कोई लाभ नहीं होने वाला है। ऐसे में भारतीय रणनीतिकार अगर अपनी शक्ति और सामर्थ्य का आंकलन पाकिस्तान से अधिक अनुभव करें तो सीधे एक के एक सर्जीकल स्ट्राइक कर डालेें।  इससे अच्छा अवसर आने वाला नहीं है।  चीन डरपोक और चतुर है। अमेरिका से लड़ाई में वह रूस का समर्थन कर सकता है पर साथ नहीं देगा। कमोबेश पाकिस्तान के साथ भी वही व्यवहार करेगा।  अगर विश्व में बड़े पैमाने पर युद्ध होता है तो चीन खामोश रहेगा क्योंकि युद्ध के बाद सभी देश कुछ समय के लिये कमजोर हो जायेंगे और वह महाशक्ति बन जायेगा।
                   इस समय बलोचिस्तान का मामला यूरोपीय संघ के देशों के समर्थन के कारण गरमाया हुआ है अतः भारत अगर चाहे तो सीधे ही इस विषय में पाकिस्तान से यह कहते हुए पंगा ले कि यह प्रांत भारत का हिस्सा था। पहले आजाद हुआ जिस पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया है। अमेरिका इसका समर्थन नहीं करेगा पर अगर भारत ने कुछ सफलता पायी तो वह 1971 में बांग्लादेश की तरह सबसे पहले वहां की सरकार को मान्यता देगा।  अगर रूस व अमेरिका सीधे आपस में भिड़ते हैं तो भारत के लिये सुनहरा अवसर होगा कि वह पाकिस्तान को समाप्त कर डाले। अगर ऐसा नहीं किया तो पाकिस्तान भारत के लिये भारी संकट बन जायेगा।
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