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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Friday, August 11, 2017

फरिश्ते कभी अपनी तस्वीर नहीं लगाते-दीपकबापूवाणी (fFarishtey Kabhi Tasweer nahin lagate-DeepakBapuwani)

अमन में रहते लोभी जंग नहीं करते, मुफ्तखोर कायर कभी तंग नहीं भरते।
‘दीपकबापू’ अस्त्र शस्त्र का बोझ उठाते, मौके पर वीरता का रंग नहीं भरते।।
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पटकथा से पर्दे पर चल रहे लोग, सुबह सिखाये त्याग शाम विज्ञापन से भोग।
‘दीपकबापू’ योग के नारे लगा रहे जोर से, पर्चे से याद करा रहे ढेर सारे रोग।।
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रौशनी में नहाते वह अंधेरा न जाने, लूट के हकदार कभी रक्षा का घेरा न जाने।
‘दीपकबापू’ त्रासदी के खेल का मजा लेते, बदन से बहे धारा पर खून तेरा न माने ।।
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फरिश्ते कभी अपनी तस्वीर नहीं लगाते, पुजवाने वाले कभी तकदीर नहीं जगाते।
‘दीपकबापू’ ईमान की छाप लगाने वाले, दुआओं का सौदा कर पीड़ा नहीं भगाते।।
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राजा कहे बंजारा सुखी बंजारा कहे राजा सुखी, अपने अपने हाल हैं पर सब दुःखी।
चाहत की चिंगारी से जलाते चिंता की आग, ‘दीपकबापू’ अपने ही ताप होते दुःखी।।
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अपनी आंखे स्वयं की आदतों से फेरी है, परायी कमियों ने उनकी रौशनी घेरी है।
‘दीपकबापू’ जंग कराकर निकलते अमन के लिये, नाकामी छिपायें कामयाबी कहें मेरी है।।
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कुदरती दुनियां में तरह तरह के रंग हैं, पसंद नापसंद में जूझती इंसानी नज़रें तंग है।
‘दीपकबापू’ अपनी सोच से आगे बढ़ते नहीं, अक्लमंद कहलाये जो उधार की राय के संग हैं।।
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भीड़ लगाकर इंसान ढूंढता अपनी पहचान, दूसरे को गिराकर बनाता अपनी शान।
‘दीपकबापू’ वैभव पास लाये स्वयं से हुए दूर,अनमने घूमते अंदर है कि बाहर जान।।
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दौलतमंदों के खड़े किये गये जिंदा प्यादे हैं, जिनके गरीबी दूर करने के वादे हैं।
‘दीपकबापू’ जगह जगह करते आदर्श की बात, दिल में संपदा लूटने के इरादे हैं।।
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प्रेम शब्द सब जपें पर रस जाने नहीं, मतलब निकले तब संबंध कभी माने नहीं।
‘दीपकबापू’ धनिकों की चाकरी पर तत्पर, मजबूरी से लड़ने की कोई ठाने नहीं।।
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Thursday, July 6, 2017

बंद दिल पर मुंह सभी के खुले हैं-दीपकबापूवाणी (Band dil uh munh sabhi ki khule hain-DeepakbapuWani

अपनों से धोखा कर आगे बढ़ जाते, मित्रों कंधे तोड़ तख्त पर चढ़ जाते।
‘दीपकबापू’ पर्दे पर छाते नायक बनकर, जब गिरते जमीन में गढ़ जाते।।
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बातों के वीर कभी लात नहीं चलाते, बुझाये चिराग कहते रात नहीं जलाते।
‘दीपकबापू’ पुरानी विरासत पर डाका डाल, स्वर्ण पट्टिका पर नाम ढलाते।।
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लोहे का ढांचा रंग से सजा दिया, मौज में बदहवास सवार ने मजा लिया।
‘दीपकबापू’ तीव्र ध्वनि से कान खो बैठे, एक करे बंद दूसरे ने बजा दिया।।
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देशभक्ति का जोर से नारा लगाते, थकेमांदे इंसान में जोश की धारा जगाते।
‘दीपकबापू‘ जज़्बात के सौदे में खाते मलाई, चौराहे पर भलाई का चारा लगाते।।
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बंद दिल पर मुंह सभी के खुले हैं, नीयत मैली पर चेहरे पूरी तरह धुले हैं।
‘दीपकबापू’ आदर्श की बात बोलते रोज, चरित्र सब के सस्ते में ही तुले हैं।।
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जिसका जितना बड़ा पद उतनी कमाई, कप में दूध नीचे ऊपर जमती मलाई।
‘दीपकबापू’ जब भी लिया पीने का मजा, कलम ने र्डंडे की तरह अपनी चलाई।।
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कोई अच्छी बात भी बुरी तरह कहें, किसी की अच्छी बात भी बुरी तरह सहें।
‘दीपकबापू’ बात की बात में खेल बिगाड़े, बड़बोलों की संगत से बचकर रहें।।
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स्वतंत्र मुख से बह रही अभद्र नालियां, बहती शब्द धारा में सजी ढेर गालियां।
‘दीपकबापू’ मूर्खों में बाट रहे स्वर्णिम उपाधि, आंख कान बंदकर भीड़ बजाये तालियां।।
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याचना करने पर भीख मिल जाती हैं, संकल्प हो तो कर्मठता की सीख मिल पाती है।
‘दीपकबापू’ चीजों के नीचे दबाई जिंदगी, इंसान के दिल में ही चीख हिल पाती है।।
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Thursday, May 25, 2017

वादों के सौदागरों का याद से नाता नहीं-दीपकबापूवाणी (vadon ke saudagar ko yaad se nata nahin-DeepakBapuWani)

घासफूस के घर में भी इंसान रहते हैं, देह के पसीने में उनके बयान बहते हैं।
‘दीपकबापू’ शिकायतें अब नहीं करते, माननीयों की हर ठगी खुलेआम सहते हैं।।
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वादे निभाने के लिये नहीं होते, करने वाले कभी शब्दों का बोझ नहीं ढोते।
‘दीपकबापू’ चतुराई से बेच रहे सपने, जागने वाले उनके ग्राहक नहीं होते।।
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जीवन के सफर में मार्ग भी बदल जाते हैं, कहीं हम कहीं साथी बदल जाते हैं।
‘दीपकबापू’ किसका इंतजार करें किसे करायें,  अपने इरादे भी बदल जाते हैं।।
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सबसे ज्यादा झूठे अपने सिर पर ताज पहने, सज्जन लगे बदनीयती का राज सहने।
‘दीपकबापू’ लाचार से ज्यादा हुए आलसी, मक्कार शान से विजयमाला आज पहने।।
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बेकार की बातों का जारी  है सिलसिला, तारीफ के विचार पर है भारी गिला।
‘दीपकबापू’ ढूंढते जहान में मीठे बोल, हर शब्द अर्थ मिठास से खाली मिला।।
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खरीदने से न मिले खुशी सभी जाने, बांटने से बढ़ती जाती सभी माने।
‘दीपकबापू’ सोचते कोई खुश न दिखे, चिंता में सभी खड़े मुक्का ताने।।
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अपने सपने सभी ने सजा लिये, जीते है सभी पराये दर्द का मजा लिये।
‘दीपकबापू’ मृत संवेदना के साथी, कौन सुने दर्द सभी ने मुंह बजा लिये।
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वादों के सौदागरों का याद से नाता नहीं, भूलने से कुछ उनका जाता नहीं।
‘दीपकबापू’ बातों से पकाते लोगों का दिमाग, भरती जेब मगर कुछ जाता नहीं।।
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भूख जिसे लगी उसने रोटी पाई, हर गुंजरते पहर खाली पेट लेता अंगड़ाई।
‘दीपकबापू’ सब पाया दिल का चैन छोड़, हर ऊंचे पर्वत से लगी मिली खाई।।
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Wednesday, May 3, 2017

सौदे की वफा एक साल-हिन्दी व्यंग्य कविता (Saude ki Vafa ek saal-Hindisatire poem)

सौदे की वफा एक साल-हिन्दी व्यंग्य कविता
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सामानों से शहर सजे हैं
खरीदो तो दिल भी
मिल जायेगा।

इंसान की नीयत भी
अब महंगी नहीं है
पैसा वफा कमायेगा।

कहें दीपकबापू बाज़ार में
घर के भी सपने मिल जाते
ग्राहक बनकर निकलो
हर जगह खड़ा सौदागर
हर सौदे की वफा
एक साल जरूर बतायेगा।
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सिंहासन का नशा-हिन्दी व्यंग्य कविता
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आकाश में उड़ने वाले पक्षी
कभी इश्क में
तारे तोड़कर लाने का
वादा नहीं करते हैं।

जाम पीने वाले
कतरा कतरा भरते ग्लास में
ज्यादा नहीं भरते हैं।

कहें दीपकबापू सिंहासन पर
बैठने का नशा ही अलग
जिन्हें मिल जाता 
फिर कभी उतरने का 
इरादा नहीं करते हैं।
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नीयत के सियार
दिखने मे गधे हैं।
‘दीपकबापू’ न पालें भ्रम
स्वार्थ से सभी सधे हैं।
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Wednesday, November 2, 2016

लोकतंत्र में सेवक स्वामी-हिन्दी व्यंग्य कविता (Loktantra mein Sewas Swami-Hindi Satire Poem)

लोकतंत्र के पर्दे पर कलाकार
कभी नायक 
कभी खलनायक की
भूमिका निभाते हैं।

कभी परस्पर मित्र
कभी शत्रुता निभाते हैं।

कहें दीपकबापू यह खेल है
पैसा फैंकने वाले
बन जाते निदेशक
लेने वाले इशारा मिलते ही
कभी सेवक 
कभी स्वामी की भूमिका निभाते हैं।
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-दीपक ‘भारतदीप’-

Sunday, September 25, 2016

चेहरों की चमक कृत्रिम लेप से बढ़ी-दीपकबापूवाणी (Chehron ki Chamak kritri lep se badhi-DeepakBapuWani)

बाज़ार से सामान खरीदते रहे घर सजाने के लिये।
फिर भी मन नहीं भरा चल पड़े कबाड़ जलाने के लिये।
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कत्ल तलवार से ही नहीं जुबान से भी किये जाते हैं।
सिर का जख्म तो दिखे पर दिल के दर्द तो पिये जाते हैं।
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चलित दूरभाष हाथ में सभी पकड़े, दिल दिमाग खाली हवा में जकड़े।
 ‘दीपकबापू’ बुद्धि भ्रम में फंसे, संकरे मार्ग चौराहे पर होते बेबात लफड़े।।
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हथियारों के भंडार जमा कर लिये, पसीना लूटा अभाव कमा कर दिये।
‘दीपकबापू’ शांति का नारा लगाते, बेकारों को झंडे डंडे थमा कर दिये।।
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सुबह दरबार मेे जाकर सिर झुकाते, शाम मदिरालय में गर्दन झुलाते।
‘दीपकबापू’ मर्जी के मालिक नहीं, लोग उधार नशे से नींद को सुलाते।।
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चेहरों की चमक कृत्रिम लेप से बढ़ी, नकली सुंदरता की कीमत चढ़ी।
‘दीपकबापू’ आंखों पर चढ़ाया चश्मा, चक्षुओं पर उधार की दृष्टि गढ़ी।।
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दौलतमंदों के घर ज़माने का दर्द मन बहलाने के लिये बिकता है।
सुविधाओं के महल में बैठे हैं, आंसू केवल पर्दे पर दिखता है। 
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सौदागरों के जो जीवित बुत बन जाते, मरकर भी पत्थर की तरह तन जाते।
‘दीपकबापू’ जिंदगी को व्यापार बनाया, गुलाम बिके खरीददार अमीर बन जाते।।
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प्रकृति के नियमों से मुंह मोड़ा, कृत्रिम विचार से जीवन जोड़ा।
‘दीपकबापू’ भंवर में फंसे हैं, नया किनारा बना नहीं पुराना तोड़ा।
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वह काला चेहरा धवल कर आये पर नीयत तो काली थी।
दुश्मनों ने पोल खोली, जिस पर सफेद चादी डाली थी।।
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नासमझों से बहस करते थक गये, मूर्खों को समझाते पक गये।
‘दीपकबापू’ शब्द बेकार में खर्च किये, लोग बिना सोचे बक गये।।
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क्षणिका
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पंचतारा चिकित्सालय
बीमारों की बढ़ती भीड़
अमीर होने की निशानी है।

गरीबों की बात 
कभी नहीं करना
पिछड़ापन हो या विकास
उसे बदहाली पानी है।
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Saturday, September 10, 2016

दिल से खेलने वाले-हिन्दी कविता (Dil Se Khelne Wale-HindiKavita)


अपने गिरेबां में
कौन झांकता हैं।

भलाई कभी किसी की
करता नहीं
वही आदमी घर के बाहर
सेवक की तख्ती टांकता है।


कहें दीपकबापू दिल से
खेलने वाले सौदागरों की
पसंद बन गया
वही नायक की तरह तन गया
रुपहले पर्दे पर
अपना ज्ञान फांकता है।
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Thursday, August 11, 2016

हमारा कारवां-हिन्दी कविता (Hamara Karvan-HindiPoem)

एक तो रास्ता
ऊबड़खाबड़ था
फिर हमराही भी सुस्त थे
वरना हम भी मंजिल तक
पहुंच गये होते।

कहें दीपकबापू हमारा कारवां
बहुत बड़ा था
मजबूरियों के साथ
कमजोरी से खड़ा था
ताकतवारों की नीयत साफ होती
हम भी थकते नहीं
शिखर पर पहुंच गये होते।
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Friday, July 22, 2016

स्वाद में फंसे-हिन्दी शायरी (Swad mein Fanse-HindiShayari)


पर्दे पर तस्वीर
देखकर बहक जाते हैं।

शोरगुल के स्वर सुनकर
कान चहक जाते हैं।

कहें दीपकबापू स्वाद में
फंसे ज़माने के लोग
व्याधि के भोजन से
पेट में कांटे महक जाते हैं।
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Thursday, July 14, 2016

विश्वास का रिश्ता-हिन्दी कविता (Vishvas ka rishta-HindiKavita)


दिल का फासला
जब ज्यादा हो
घर दूर नज़र आता है।

प्रेम का मोल न हो
विश्वास का रिश्ता भी
बहुत दूर नज़र आता है।

कहें दीपकबापू अपनों में
मनोबाल बढाना आता नहीं
टकटकी लगाये बैठे
भरोसा निभाने की
जबकि विश्वास का धरा पर
उतरना दूर नज़र आता है।
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Sunday, June 26, 2016

स्वार्थ की दीवार-हिन्दी व्यंग्य कविता(Swarth ki Deewar-Hindi Satire Poem)


भावनाओं के समंदर में
ख्यालों की लहर
उठती गिरती हैं।

जश्न की साथी भीड़
मुश्किलों में दौर में
वादे से फिरती है।

कहें दीपकबापू दिल में
अपने अपने टापू
बना लिये ज़माने में
जिसकी हर दीवार
स्वार्थ से घिरती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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9.हिन्दी सरिता पत्रिका

Sunday, May 1, 2016

सार्वभौमिक सत्य-हिन्दी कविता (Uniqe True-HindiPoem On May Day or Mazdoor Diwas)

शरीर से पसीना
निकलने के भय से
कुछ लोग घबड़ाते हैं।

पंचसितारा अस्पतालों के
चिकित्सक उनके लिये
महंगे बिस्तर सजाते हैं।

कहें दीपकबापू श्रमवीरों से
सजता संसार
यह सार्वभौमिक सत्य
मजदूर दिवस पर ही
नारे की तरह बजाते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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