अक्सर मैं सोचता हूँ कि लोग कंप्यूटर से इतना चिपके कैसे रहते हैं। अगर देखा जाये तो मैं भी कंप्यूटर पर दिन में दो से तीन घंटे काम करता हूँ पर उसके तरफ निगाह तभी जाती है जब उस पर कुछ पढ़ना हो या कोई फोटो देखना हो नहीं तो मैं अपने लिखने में मस्त हो जाता हूँ और कभी कभार त्रुटि देखने के लिए नजर फेर कर देखता हूँ। मैं कंप्यूटर पर टाईप में बिलकुल नहीं थकता। हाँ, पर अगर इस पर पढ़ना देखना मुझे बहुत थका देता है। जब थक जाता हूँ तो अपनी कुर्सी पर भी बैठ कर अपनी आँखे बंद कर शरीर को ढीला छोड़ते हुए ध्यान कर लेता हूँ। जब लगता है कि आराम है तब फिर पढता हूँ। पर यह आलेख कोई आत्मप्रन्चना के लिए नहीं लिख रहा।
चिट्ठाकार की चर्चा में मैं जब कल एक सक्रिय और आज उसके साथ दूसरे ब्लोगर के चौपाल पर न दिखने की चर्चा पढी तो मुझे याद आया कि ऐसे एक नहीं तीन चार ब्लोगर हैं और एक तो हर जगह कमेन्ट लगाते थे पर अब इतने सक्रिय नहीं हैं । एक महाशय कनाडा से अपने देश आये तो फिर उनके मुझे दर्शन ही नहीं हुए। यह सब ब्लोगर मुझे इस क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित करने वाले मेरे मित्र है और मुझे लग रहा था कि कहीं थकावट की वजह से आराम तो नहीं कर रहे। इसमें कोई सन्देश नहीं है कि कंप्यूटर पर काम करते थकावट बहुत होती है और उसका विकल्प यही है कि हम योग साधना कर उसका मुकाबला कर सकते हैं।
इसी बात पर विचार करते सोच रहा था। कंप्यूटर पर निरंतर काम करने से बहुत सारी व्याधियां पैदा होतीं हैं और कई ब्लोग लेखक अपने को थका हुआ अनुभव करते होंगे। कंप्यूटर पर काम करने के जो दुष्परिणाम होते हैं मैं उनको पहले ही भुगत चुका हूँ और आज से पांच वर्ष पूर्व जब योग साधना शुरू नहीं की होती हो वह सब नहीं लिख सकता था। कंप्यूटर पर काम करते हुए उच्च रक्तचाप की वजह से अपने स्वास्थ्य की लगभग हारी हुई लड़ाई जीतकर खडा हुआ। मैंने कई ब्लोग देखे हैं और उनमें लोगों की उदास रचनाएं मुझे बहुत कुछ कह जातीं हैं। मैं तो उन लोगों की तारीफ करूंगा को जो योग साधना नहीं करते और ब्लोग लिख रहे हैं या वह लोग मनोरंजन के लिए अंतर्जाल पर चिपके रहते हैं जैसे कभी देखा ही नहीं हों क्योंकि मैं ऐसा बिना योगसाधना के नहीं कर सकता।
सुबह योग साधना, प्राणायाम, ध्यान, और प्रार्थना करने के बाद मैं ब्लोग पर आता हूँ, और उस समय कल की लिखी गयी पोस्ट मुझे याद नहीं रहती। दिमाग में केवल यही रहता है कि आज कुछ नया लिखूंगा। जब आप कंप्यूटर पर आते हैं और आपको कल के कुछ पल याद आते हैं या आपको लग रहा है कि कल मैंने यह किया था तो आप समझ लीजिये कि वह विकार है। योग साधना जीवन जीने की कला है और नहीं करते तो उसे ढोना कहते हैं। हम मीठा खाएं या कड़वा, पका खाएं या कच्चा वह गंदगी में बदल जाता है वैसे ही आँखों से देखे गए अच्छे-बुरे दृश्य, कानों से सुने गए अच्छे-बुरे स्वर और देह को स्पर्श करने वाले अच्छी और बुरी हवाएं भी वैसे ही विकार पैदा करतीं हैं। खाने से उत्पन्न विकार हमें लगता है कि सुबह शरीर से एकदम निकला गए हैं तो गलत हैं। कुछ लोग सुबह घूमने जाते हैं और सोचते हैं कि सब ठीकठाक हो गया। नहीं ऐसा नहीं है। शरीर के विकार सुबह सैर करने से कुछ हद तक निकल सकते हैं पर मन और विचार के विकारों का क्या? जो आँखों, कानों और देह से उत्पन्न होते हैं। फिलहाल तो इतना ही कहूंगा कि कंप्यूटर पर सतत काम करना है तो योग साधना करें इसके बिना अगर काम चला रहे तो मैं कहूंगा कि बहुत बहादुर हो।
योगासन से शरीर, प्राणायाम से मन और ध्यान से विचारों के विकार निकलते हैं।अगर आप सुबह उठते हैं और सुबह सैर करते हैं तो आकर थोडा प्राणायाम करें, और कुछ नहीं तो अनुलोम--विलोम प्राणायाम करें और नहाधोकर ध्यान लगाएं। पहले ओम का जाप करें और फिर उसे मन में कुछ देर दोहराने के बाद अपना ध्यान नासिका के बीच केन्द्रित करें-भृकुटी पर रखें। आरंभ में आपके अन्दर विचार अधिक आयेंगे और उन्हें आने दें और आखें बंद कर बैठे रहें। जो विचार आपके आ रहे होंगे वह वास्तव में मन के विकार हैं जो भस्म हो रहे होते हैं। कुछ दिनों के बाद आब देखने कि आप शून्य में जायेंगे जब आप अपने ध्यान को भृकुटी पर अधिक समय तक केन्द्रित कर सकेंगे। दूकान, आफिस, यात्रा और घर में जहाँ भी अवसर मिले शरीर को ढीला छोड़ते हुए आँखें बंद कर भृकुटी पर ध्यान लगाएं। साथ में महसूस भी करें कि आपके मानसिक विकार भस्म हो रहे हैं।
कुछ समय के बाद आपको लगने लगेगा कि आपको शरीर और मन में अत्यधिक सहजता का अनुभव हो रही है और आप तब जान पायेंगे कि तनाव किस तरह का होता है-अभी तो आपको जब लग रहा है कि कोई तनाव नहीं है तब भी है,पर इसका अनुभव जब आप योग साधना करेंगे तब आपको नई-नई अनुभूतियाँ होंगीं। मैं अपने ब्लोगों पर अपना ज्ञान बघारने के लिए यह सब नहीं लिखता बल्कि अपने विचारों से अपने साथियों को इससे अवगत कराते रहना है।
नोट-भारतीय योग संस्थान द्वारा प्रकाशित 'योग-मंजरी'के नवीनतम अंक में 'दीपक राज' के नाम से मेरा लेख प्रकाशित हुआ जिन सज्जन के पास हो उसे पढें।