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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Sunday, July 20, 2008

हकीकत वैसी नहीं होती अमूनन-हिंदी शायरी

सपने सजाता है
उनको बिखरता देख
टूट जाता है मन
कहीं लगाने के लिये ढूंढो जगह
वहीं शोर बच जाता है
जैसे जल रहा हो चमन

भला आस्तीन में सांप कहां पलते हैं
इंसानों करते हैं धोखा
नाम लेकर का खुद ही जलते हैं
क्या दोष दें आग को
जब अपने चिराग से घर जलते हैं
वही सिर पर चढ़ आता है
जिसे करो पहले नमन
जब बोलने को मचलती है जुबान
अंदाज हालातों का नहीं करती
चंद प्यार भरे अल्फाज भी
नहीं दिला पाते वह कामयाबी
जो खामोशी दिला देती है
सपनों में जीना अच्छा लगता है
पर हकीकत वैसी नहीं होती अमूनन
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दीपक भारतदीप


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Friday, July 4, 2008

हादसे और जिंदगी-हिंदी शायरी

हादसों से बनती है जिंदगी भी
सोचा न था कभी
जब होते हैं तो डर जाता हूं
हारने का अहसास दिल में
तब होने लगता है
फिर अचानक रास्ता आगे
जाता नजर आता है
खड़ा हो जाता हूं तभी
......................
दीपक भारतदीप

Wednesday, May 7, 2008

एक पोस्ट साथियों के नाम

ब्लागस्पाट पर मेरे सात ब्लाग ऐसे हैं जो हिंदी फोरमों पर पंजीकृत है और इन पर तीन बार ऐसा अवसर आया है जब एक दिन में 99 तक व्यूज पहूंचे हैं आज यह ब्लाग है जो 100 की संख्या पार कर गया। पंजीकृत ब्लागों से आशय मेरा यह है कि जिनको मैंने स्वयं इन फोरमों पर ईमेल भेजकर कराये हैं। वैसे मेरे दो ब्लाग नारद और चिट्ठाजगत ने मुझसे पूछे बगैर पंजीकृत कर लिये बिना यह जाने कि मैंने उनको प्रयोग के लिये शुरू किया था और उनमें एक ब्लाग ने एक दिन में 183 व्यूज लेकर मुझे हिला दिया जबकि उसकी पोस्टें नगण्य हैं। मैने उसका जिक्र इसलिये नहीं किया क्योंकि मुझे लगा कि मेरे प्रयोग पर भी कोई प्रयोग कर रहा है-और मैं भी अभी प्रयोग जारी रखूंगा। आजकल हिंदी के एग्रीगेटरों के कर्णधार अधिक सक्रिय हो गये है, और किसी भी ब्लाग को खुला नहीं छोड़ते अपने यहां खींच ले जाते हैं। बहरहाल यह कोई शिकायतनामा नहीं लिख रहा।

आज ही मेरे वर्डप्रेस के एक ब्लाग ने बीस हजार की संख्या पार की और उस पर पोस्ट लिखी और स्टेट काउंटर खोलकर जब अपने इस ब्लाग की संख्या देखी तो सोच में पड़ गया। कल लिखी गयी पोस्ट ने अपेक्षा से अधिक पोस्ट जुटाये। यह पोस्ट मैंने आधी अपने विंडो पर और आधी ब्लागस्पाट पर लिखी। वही हुआ जिसकी संभावना थी। कुछ हिस्से मैने कुछ लिखे लोगों ने कुछ और समझे। मैंने देर गये रात यह पोस्ट डाली और मुझे लग रहा था कि अब भला कौन पढ़ेगा? मगर ऐसा लगता है कि कई ब्लाग लेखक तो ताक में बैठे रहते हैं कि कोई अच्छा या अलग हटकर विषय आये तो पढ़ें। सहमति या असहमति एक अलग विषय है पर एक बात तो सिद्ध होती है कि ब्लाग और ब्लाग लेखकों से अलग हटकर लिखे विषय भी यहां हिट पा सकते हैं। कुछ लोग केवल ब्लाग लेखकों से हिट लेने के लिये उनसे संबंधित विषय ही उठाते हैं और हिट लेने में सफल होते हैं और जो ब्लागर अन्य विषय लिखते हैं उनको वैसे हिट नहीं मिलते पर उसके लिये किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।

कल की पोस्ट यौन शिक्षा और ब्रह्मचर्य पर थी, जिसमें कुछ हास्य तो कुछ चिंतन था. वैसे यौन शिक्षा और ब्रह्मचर्य जैसे विषयों पर मैंने अधिक अध्ययन किया नहीं किया है और यह जरूरी नहीं है कि मैं किताबों में लिखी हर बात को वैसे ही मान लूं। अपने चिंतन और मनन से मैं कोई नई परिभाषा या अर्थ भी वर्तमान संदर्भों में गढ़ भी सकता हूं। सरस्वती माता की कृपा और अपने प्राचीनतम ग्रंथों के अध्ययन और गुरूजनों की शिक्षा के साथ कुछ नवीनतम विचार और रचना के सृजन करने की प्रेरणा ने मुझे इतना सक्षम बनाया है कि अपने मौलिक विचार व्यक्त कर सकता हूं। मेरे निजी मित्र और साथी कभी मेरे विचारों से सहमत होते हैं और नहीं भी, पर एक बात सभी कहते हैं कि तुम्हारी बात में दम तो है। आशा है कि अपने ब्लाग लेखक साथियों की प्रेरणा से ऐसे ही मेरे ब्लाग बढ़ते रहेंगे।
दीपक भारतदीप

Sunday, April 6, 2008

साहब होने के सपने देखते और गुलाम बन जाते-हिन्दी क्षणिकाएँ

साहब जैसी जिंदगी जीने का
सपना लिये निकलते हैं सब
किताबें-दर-किताबें पढ़ते जाते
अपना पसीना बहाते हुए
कागजों के ढेर के ढेर रंगते जाते
फिर नौकरी पाने की कतार में
बड़ी उम्मीद के साथ खडे हो जाते
पता ही नहीं चलता गुलाम बन जाते कब
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साहब क्या जाने गुलाम का दर्द
उनको मालुम रहते अपने हक
याद नहीं रहते फर्ज
उनका किया सब जायज
क्योंकि एक ढूंढो हजार लोग
गुलामी के लिये मिल जातें
साहब बनने की दौड़ में
भला कितने दौड़ पाते
साहब तो टपकते हैं आकाश से
क्या जानेंगे धरती के गुलामों का दर्द
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Thursday, January 10, 2008

रहीम के दोहे:ओछा व्यक्ति बड़ा पद पाकर इतराता है

जो बड़ेन को लघु कहैं नहिं रहीम घटि जाहिं
गिरधर मुरलीधर कहै, कछु दुख मानत नाहिं


कविवर रहीम कहते हैं कि जो बडे लोगों को तुच्छ कहते हैं वह कथन मात्र से छोटे हो जाते। गोवर्धन पर्वत धारी श्री कृष्ण को मुरली पकड़ने वाला कहने से कुछ दुख नहीं होता।
भावार्थ- यदि किसी में कोई योग्यता और शक्ति है तो उसको समाज में बहुत सम्मान मिलता है पर अगर कुछ निम्न कोटि के लोग उसकी आलोचना करते हैं तो उसको कोई नहीं सुनता क्योंकि जिसमें शक्ति है उसकी सभी पूजा करते हैं और वह इन बातों की परवाह नहीं करते कि कोई उनके बारे में क्या कह रहा है।

जो रहीम ओछो बढे तौ अति ही इतराय
प्यादे सौं फर्जी भयो, टेढो टेढो जाय


कविवर रहीम कहते हैं कि छोटे व्यक्ति बड़ा पद पाने के बाद अहंकारी हो जाते हैं-जैसे शतरंज के खेल में पैदल चलाने वाला यदि वजीर बन जाये तो वक्र गति से चलने लगते हैं।

भावार्थ-कुछ बहुत ओछी मनोवृति के लोग होते हैं जिनको थोडी योग्यता, संपति या सम्मान मिलता है वह फूल जाते हैं और अपने मुहँ से अपनी बधाई करते हैं और ऐसे दिखावा करते हैं जैसे कि बहुत बडे व्यक्ति हो गए हैं। ऐसे लोगों कि परवाह नहीं करना चाहिऐ.

जो रहीम ओछो बढे तौ अति ही इतराय
प्यादे सौं फर्जी भयो, टेढो टेढो जाय

कविवर रहीम कहते हैं कि छोटे व्यक्ति बड़ा पद पाने के बाद अहंकारी हो जाते हैं-जैसे शतरंज के खेल में पैदल चलाने वाला यदि वजीर बन जाये तो वक्र गति से चलने लगते हैं।

भावार्थ-कुछ बहुत ओछी मनोवृति के लोग होते हैं जिनको थोडी योग्यता, संपति या सम्मान मिलता है वह फूल जाते हैं और अपने मुहँ से अपनी बधाई करते हैं और ऐसे दिखावा करते हैं जैसे कि बहुत बडे व्यक्ति हो गए हैं। ऐसे लोगों कि परवाह नहीं करना चाहिऐ

Thursday, December 13, 2007

कंप्यूटर पर काम करने के साथ योग साधना करने से लाभ

अक्सर मैं सोचता हूँ कि लोग कंप्यूटर से इतना चिपके कैसे रहते हैं। अगर देखा जाये तो मैं भी कंप्यूटर पर दिन में दो से तीन घंटे काम करता हूँ पर उसके तरफ निगाह तभी जाती है जब उस पर कुछ पढ़ना हो या कोई फोटो देखना हो नहीं तो मैं अपने लिखने में मस्त हो जाता हूँ और कभी कभार त्रुटि देखने के लिए नजर फेर कर देखता हूँ। मैं कंप्यूटर पर टाईप में बिलकुल नहीं थकता। हाँ, पर अगर इस पर पढ़ना देखना मुझे बहुत थका देता है। जब थक जाता हूँ तो अपनी कुर्सी पर भी बैठ कर अपनी आँखे बंद कर शरीर को ढीला छोड़ते हुए ध्यान कर लेता हूँ। जब लगता है कि आराम है तब फिर पढता हूँ। पर यह आलेख कोई आत्मप्रन्चना के लिए नहीं लिख रहा।

चिट्ठाकार की चर्चा में मैं जब कल एक सक्रिय और आज उसके साथ दूसरे ब्लोगर के चौपाल पर न दिखने की चर्चा पढी तो मुझे याद आया कि ऐसे एक नहीं तीन चार ब्लोगर हैं और एक तो हर जगह कमेन्ट लगाते थे पर अब इतने सक्रिय नहीं हैं । एक महाशय कनाडा से अपने देश आये तो फिर उनके मुझे दर्शन ही नहीं हुए। यह सब ब्लोगर मुझे इस क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित करने वाले मेरे मित्र है और मुझे लग रहा था कि कहीं थकावट की वजह से आराम तो नहीं कर रहे। इसमें कोई सन्देश नहीं है कि कंप्यूटर पर काम करते थकावट बहुत होती है और उसका विकल्प यही है कि हम योग साधना कर उसका मुकाबला कर सकते हैं।
इसी बात पर विचार करते सोच रहा था। कंप्यूटर पर निरंतर काम करने से बहुत सारी व्याधियां पैदा होतीं हैं और कई ब्लोग लेखक अपने को थका हुआ अनुभव करते होंगे। कंप्यूटर पर काम करने के जो दुष्परिणाम होते हैं मैं उनको पहले ही भुगत चुका हूँ और आज से पांच वर्ष पूर्व जब योग साधना शुरू नहीं की होती हो वह सब नहीं लिख सकता था। कंप्यूटर पर काम करते हुए उच्च रक्तचाप की वजह से अपने स्वास्थ्य की लगभग हारी हुई लड़ाई जीतकर खडा हुआ। मैंने कई ब्लोग देखे हैं और उनमें लोगों की उदास रचनाएं मुझे बहुत कुछ कह जातीं हैं। मैं तो उन लोगों की तारीफ करूंगा को जो योग साधना नहीं करते और ब्लोग लिख रहे हैं या वह लोग मनोरंजन के लिए अंतर्जाल पर चिपके रहते हैं जैसे कभी देखा ही नहीं हों क्योंकि मैं ऐसा बिना योगसाधना के नहीं कर सकता।

सुबह योग साधना, प्राणायाम, ध्यान, और प्रार्थना करने के बाद मैं ब्लोग पर आता हूँ, और उस समय कल की लिखी गयी पोस्ट मुझे याद नहीं रहती। दिमाग में केवल यही रहता है कि आज कुछ नया लिखूंगा। जब आप कंप्यूटर पर आते हैं और आपको कल के कुछ पल याद आते हैं या आपको लग रहा है कि कल मैंने यह किया था तो आप समझ लीजिये कि वह विकार है। योग साधना जीवन जीने की कला है और नहीं करते तो उसे ढोना कहते हैं। हम मीठा खाएं या कड़वा, पका खाएं या कच्चा वह गंदगी में बदल जाता है वैसे ही आँखों से देखे गए अच्छे-बुरे दृश्य, कानों से सुने गए अच्छे-बुरे स्वर और देह को स्पर्श करने वाले अच्छी और बुरी हवाएं भी वैसे ही विकार पैदा करतीं हैं। खाने से उत्पन्न विकार हमें लगता है कि सुबह शरीर से एकदम निकला गए हैं तो गलत हैं। कुछ लोग सुबह घूमने जाते हैं और सोचते हैं कि सब ठीकठाक हो गया। नहीं ऐसा नहीं है। शरीर के विकार सुबह सैर करने से कुछ हद तक निकल सकते हैं पर मन और विचार के विकारों का क्या? जो आँखों, कानों और देह से उत्पन्न होते हैं। फिलहाल तो इतना ही कहूंगा कि कंप्यूटर पर सतत काम करना है तो योग साधना करें इसके बिना अगर काम चला रहे तो मैं कहूंगा कि बहुत बहादुर हो।
योगासन से शरीर, प्राणायाम से मन और ध्यान से विचारों के विकार निकलते हैं।अगर आप सुबह उठते हैं और सुबह सैर करते हैं तो आकर थोडा प्राणायाम करें, और कुछ नहीं तो अनुलोम--विलोम प्राणायाम करें और नहाधोकर ध्यान लगाएं। पहले ओम का जाप करें और फिर उसे मन में कुछ देर दोहराने के बाद अपना ध्यान नासिका के बीच केन्द्रित करें-भृकुटी पर रखें। आरंभ में आपके अन्दर विचार अधिक आयेंगे और उन्हें आने दें और आखें बंद कर बैठे रहें। जो विचार आपके आ रहे होंगे वह वास्तव में मन के विकार हैं जो भस्म हो रहे होते हैं। कुछ दिनों के बाद आब देखने कि आप शून्य में जायेंगे जब आप अपने ध्यान को भृकुटी पर अधिक समय तक केन्द्रित कर सकेंगे। दूकान, आफिस, यात्रा और घर में जहाँ भी अवसर मिले शरीर को ढीला छोड़ते हुए आँखें बंद कर भृकुटी पर ध्यान लगाएं। साथ में महसूस भी करें कि आपके मानसिक विकार भस्म हो रहे हैं।

कुछ समय के बाद आपको लगने लगेगा कि आपको शरीर और मन में अत्यधिक सहजता का अनुभव हो रही है और आप तब जान पायेंगे कि तनाव किस तरह का होता है-अभी तो आपको जब लग रहा है कि कोई तनाव नहीं है तब भी है,पर इसका अनुभव जब आप योग साधना करेंगे तब आपको नई-नई अनुभूतियाँ होंगीं। मैं अपने ब्लोगों पर अपना ज्ञान बघारने के लिए यह सब नहीं लिखता बल्कि अपने विचारों से अपने साथियों को इससे अवगत कराते रहना है।
नोट-भारतीय योग संस्थान द्वारा प्रकाशित 'योग-मंजरी'के नवीनतम अंक में 'दीपक राज' के नाम से मेरा लेख प्रकाशित हुआ जिन सज्जन के पास हो उसे पढें।

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