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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Monday, March 10, 2008

संत कबीर वाणी-मीठी वाणी से सब प्रसन्न होते हैं

कागा काको धन हरै कोयल काको देत
मीठा शब्द सुनाय के, जग अपनी करि लेत

              संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि कौवा किसका धन चोरी करता है और कोयल किसको क्या देती है, जबकि वह अपनी मीठी वाणी से सभी लोगों का मन हर लेती है।
            आज के सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या- इस संसार में कई लोग ऐसे हैं जो हमेशा कलुषित वाणी बोलते हैं और लोग उनसे बहुत नाराज रहते हैं जबकि कुछ लोग अत्यंत मधुर वाणी बोलते हैं जिससे सभी पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। भगवान् ने सबको वाणी दी है पर उसका इस्तेमाल हर कोई अपने ज्ञान और विवेक के अनुसार करता है। कौवा जब आवाज करता है तो कई लोग विचलित होते है और उनके मन में गुस्सा भर जाता है जबकि वह किसी से कुछ माँगता नहीं है और कोयल भी किसी को कुछ देती नहीं पर उसकी मधुर और कर्ण प्रिय वाणी मन मोह लेती है। इसलिए जितना हो सके मधुर बोलना चाहिए। इसके लिए थोडा ध्यान देने की जरूरत है और एक बार अभ्यास हो जाये तो फिर स्वत: मधुर बोल फ़ुट पड़ते हैं।
          किसी भी वाक्य को रूखे और कटु स्वर में बोलना सहज लगता है पर उसीको मीठा बोलने के लिए थोडा विचार करना पड़ता है इसलिए आलस्य वश उससे बचना चाहते हैं और इससे उनकी वाणी कटु हो जाती है। जैसे हमें अपने किसी मित्र से पेन मांगनी है और हम उसे सीधे कहें-''तुम्हारे पास पेन होगा, ज़रा देना तो।''
        इसी वाक्य को हम थोडा प्रेम से कहें -''यार, तुम्हारे पास एक पेन हो तो मुझे देना।''
आप देखें इसका प्रभाव क्या होता है। पहले वाक्य में मित्र पेन तो देगा पर उसके दिमाग में गुस्सा होगा या वह बहुत निकटस्थ हुआ तो उसके ह्रदय में कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी । अगर आप दूसरा वाक्य बोलेंगे तो उसके मन में खुशी का भाव उत्पन्न होगा-भले वह आपसे कभी कहे नहीं। इसलिए सामान्य व्यव्हार में आप दूसरों को प्रसन्न कर सकते हैं।

Sunday, March 9, 2008

मनुस्मृति:अपने नौकर से वफादारी निभाएं

आर्तस्तु कुर्यात्स्वस्थ: सन्यथाभाषितमादित:।
स: दीर्घस्यापि कालस्य तल्लभेतैव वेतनम।।


मनु स्मृति के इस श्लोक के अनुसार जो नौकर स्वस्थ अवस्था में ईमानदारी व निष्ठा से स्वामी के आदेश का पालन करता है वह रोगादि के कारण यदि लंबे समय तक अनुपस्थित रहे तो भी उसे वेतन प्रदान करना चाहिए।

आज के संदर्भ में व्याख्या- आज हम अक्सर ऐसी घटनाएँ देखते हैं जिसमें नौकर द्वारा मालिक के प्रति तमाम तरह के अपराध किये जाते हैं। दरअसल आज के भौतिक युग में सब जगह अविश्वास का माहौल है और ऐसे में किसी का विश्वास जीतना है तो उसकी सहायता कर ही यह संभव है। जो लोग धनी हैं उन्हें अपने नौकरों को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि विपति में वह उसकी सहायता करेंगे। कोई भी मालिक जब अपने नौकर को कोई काम कहता है तो वह उसे ईमानदारी से करता है तो उसकी प्रशंसा करना चाहिए। जब कई लोग बेईमानी से काम करते हैं उनको भी वेतन मिलता है तो और ईमानदार को भी वही तो न्याय कहाँ रह जाता है।

जो धनिक लोग चाहते हैं कि उनके नौकर ईमानदार रहें उन्हें उनके लिए नियत वेतन के साथ उसकी ईमानदारी के लिए एक राशि अपने मन में रख लेना चाहिए जो उसे बीमार पड़ने, बच्चों की शिक्षा और बेटी के विवाह आदि के समय उपहार के रूप में देनी चाहिए। अगर वह कभी स्वयं बीमार पड़ जाता है तो उसका वेतन तो देना चाहिए बल्कि उसका इलाज भी कराना चाहिए। उसे विश्वास दिलाना चाहिऐ कि वह अगर नौकर के रूप में वफादारी निभाएगा तो हम मालिक की तरह भी निभाएंगे। याद रखना श्रम खरीदा जा सकता है पर ईमानदारी नहीं।

Thursday, March 6, 2008

विदुर नीति: संयम के अलावा शांति का कोई रास्ता नहीं

  1. विद्या, तप, इन्द्रियों पर संयम और लोभ के त्याग के अलावा मनुष्य के पास शांति का कोई मार्ग नहीं है ।
  2. बुद्धि से मनुष्य अपने भय को दूर करता है, तपस्या से श्रेष्ठता और उच्च स्थान प्राप्त करता है। गुरु की ह्रदय से सेवा और नित्य योग साधना करते हुए तन और मन में शांति पाता है।
  3. जिसे मोक्ष की इच्छा होती है वह मनुष्य पुण्य का भी आश्रय भीं नहीं लेते। वह वेद पढ़कर भी उसके पुण्य का आश्रय नहीं लेते और निष्काम और निर्लिप्त भाव से इस लोक में विचरण करते हुए सारे काम कर आनंद लेते हुए मोक्ष प्राप्त करते हैं ।
  4. जो परस्पर भेदभाव करते हैं वे कभी धर्म का आचरण नहीं करते। सुख भी नहीं पाते। उन्हें कभी इस संसार में गौरव प्राप्त नहीं होता और कभी शांत नहीं रह पाते।
  5. जैसे गाय में दूध, विद्वान में तप और युवा स्त्रियं में चंचलता का भाव होना स्वाभाविक है , वैसे ही अपनी जाति के लोगों से भय होना स्वाभाविक है।

Tuesday, February 26, 2008

संत कबीर वाणी: गले में माला डालने से हरि नहीं मिलते

मैं-मैं बड़ी बलाइहै सकै तो निकसौ भाजि

कब लग राखु हे सखी, रुई लपेटी आगि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह मैं-मैं बहुत बड़ी बला है। इससे निकलकर भाग सको तो भाग जाओ, अरी सखी रुई में आग को लपेटकर तू कब तक रख सकेगी।

'कबीर'माला मन की, और संसार भेष

वाला पहरयां हरि मिलै तो अरहट कई गलि देखि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सच्छी माला ही अचंचल मन की है बाकी तो संसारी भेष है। मालाधारियों का यदि माला पहनने से हरि मिलना होता तो रहटको देखो हरि से क्या उसकी भेंट हो गई। उसने तो इतने बड़ी माला गले में डाली।

Monday, February 25, 2008

संत कबीर वाणी:गुरु करें जानकर, पानी पिएँ छानकर

गुरु कीजैं जानि के, पानी पीजैं छानि
बिना विचारै गुरु करे, परे चौरासी खानि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की पानी को सदैव छान कर पीना चाहिऐ तथा गुरू को अच्छी तरह जान कर ही अपना गुरु बनाना चाहिऐ . छान कर पानी पीने से शरीर को व्याधियां नहीं होती और गुरु से सदगति प्राप्त होती है. अगर किसी अयोग्य को गुरु बना लिया तो फिर चौरासी के चक्कर में पड़ना पडेगा।
गुरु गुरु में भेद है, गुरु गुरु में भाव
सोईं गुरु नित वंदिए, शब्द बतावे दाव


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु शब्द एक ही पर फिर भी गुरु कहलाने वाले लोगो के कर्मों के आधार पर उनमें अंतर होता है. ऐसे व्यक्ति को बुरु बनाना चाहिऐ जो शब्द के दाव बताने की अलावा उसके गूढ़ और भावनात्मक अर्थ बताता है।

Sunday, February 24, 2008

संत कबीर वाणी- हरि रस जैसा कोई रसायन नहीं

सबैं रसाइण मैं क्रिया, हरि सा और न कोई
तिल इक घटमैं संचरे, तौ सब तन कंचन होई
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी रसायनों का सेवन कर लिया मैंने मगर हरि-रस जैसी कोई और रसायन नहीं पाई। एक तिल भी घट में शरीर में यह पहुंच जाए तो वह सारा ही कंचन में बदल जाता है।

'कबीर' भाठी कलाल की, बहुतक बैठे आई
सिर सौंपे सोई पिये, नहीं तौ पीया न जाई

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कलाल की भट्ठी पर बहुत सारे आकर बैठ गए हैं, पर इस मदिरा को कोई एक ही पी सकेगा, जो अपना सिर कलाल को प्रसन्नता के साथ सौंप देगा।

Saturday, February 23, 2008

संत कबीर वाणी:सोने का मदिरा से भरा पात्र भी निंदनीय

ऊंचे कुल की जनमिया करनी ऊँच न होय

कनक कलश मद सों, भरा साधू निंदा सोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि केवल ऊंचे कुल में जन्म लेने से किसी के आचरण ऊंचे नहीं हो जाते। सोने का घडा यदि मदिरा से भरा है तो साधू पुरुषों द्वारा उसकी निंदा की जाती है।

कोयला भी हो ऊजला जरि बरि ह्नै जो सेव

कनक कलश मन सों, भरा साधू निंदा होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं भली भांति आग में जलाकर कोयला भी सफ़ेद हो जाता है पर निबुद्धि मनुष्य कभी नहीं सुधर सकता जैसे ऊसर के खेत में बीज नहीं होते।

Thursday, February 21, 2008

मनुस्मृति: आसक्ति रहित लोग ही हो सकते हैं धर्मोपदेशक

१.धर्मोपदेश देने का विधान उन्हीं लोगों के लिए है जो अर्थ और काम में आसक्त नहीं है। जो व्यक्ति विषयों में आसक्ति रखता उसकी धर्म में रूचि हो ही नहीं सकती और होगी तो दिखावे की। धर्म तत्व को जानने के इच्छुक लोगों के लिए धर्म ग्रंथों का ज्ञान ही सर्वोच्च प्रमाण है।
२.वेदों में जहाँ दो कथनों में विरोध हो वहाँ विद्वान लोगों को बराबर महत्व देते हुए उचित निर्णय लेना चाहिए।
३.धर्म के चार लक्षण हैं-१.वेदों द्वारा प्रतिपादित २. स्मृतियों द्वारा अनुमोदित ३. महर्षियों द्वारा आचरित 4. जहाँ किसी विषय में एक से अधिक मत हों वहाँ उस धर्म को अपनाने वाले व्यक्ति की आत्मा को प्रिय। इन कसौटियों पर सिद्ध होने वाला ही प्रामाणिक धर्म है।

Wednesday, February 20, 2008

संत कबीर वाणी:हरि हैं हीरा और भक्त है जौहरी

हरि हीरा, जन जौहरी, ले ले मौड़ी हाटि
जबर मिलेगा पारिषी तब हरि हीरा की साटि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि हरि ही हीरा है और जौहरी है हरि का भक्त। हीरे को हाट-बाजार में बेच देने के लिए उसने दूकान लगा रखी है। वहीं और तभी उसे कोई उसे खरीद सकेगा।

पदारथ पेलि करि, कंकर लिया हाथि
जोड़ी बिछ्टी हंस की, पडया बगां के साथि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अनमोल पदार्थ जो मिल गया उसे तो छोड़ दिया और कंकड़ हाथ में ले लिया। हंसों के साथ से बिछुड़ गया और बगुलों के साथ हो लिया।

Saturday, February 16, 2008

चाणक्य नीति:बदहजमी में अच्छा भोजन भी विष होता है

१.स्वादिष्ट से स्वादिष्ट भोजन जिस प्रकार बदहजमी के अवस्था में लाभ के स्थान पर हानि पहुंचाता है और विष का काम करता है। इस अवस्था में किया गया सुस्वादु भोजन व्यक्ति के लिए प्राणलेवा भी हो सकता है।

२.निरंतर अभ्यास न होने से शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान भी मनुष्य के लिए घातक हो सकता है। वैसे तो वह विद्वान होता पर अभ्यास के अभाव में अपने ज्ञान का विश्लेषण नहीं करता इसलिए वह भ्रमित होता है और अवसर आने पर सही ढंग से काम न करने पर उसे उपहास का सामना करना पड़ता है और सम्मानित ज्ञानीव्यक्ति के लिए अपमान मृत्यु के समान होता है।

३.वृद्ध व्यक्ति यदि किसी युवा कन्या से विवाह कर लेता है तो उसका जीवन मरण के समान हो जाता है। कहा जाता है कि पुरुषों के अपेक्षा स्त्रियों में काम की शक्ति आठ गुना अधिक होती है। हब वृद्ध पति से पत्नी को संतुष्टि नहीं होती वह गुप्त रूप से कहीं और मन लगाने की सोचती है। इसलिए वृद्ध पुरुष को किसी तरुणी से विवाह कर अपना जीवन नरकमय नहीं बनाना चाहिऐ।

४.प्रत्येक अच्छी बुरी वस्तु के लिए सीमा होती है और और उसका अतिक्रमण उसे दुर्गति का शिकार बना देता है.

Thursday, January 10, 2008

रहीम के दोहे:ओछा व्यक्ति बड़ा पद पाकर इतराता है

जो बड़ेन को लघु कहैं नहिं रहीम घटि जाहिं
गिरधर मुरलीधर कहै, कछु दुख मानत नाहिं


कविवर रहीम कहते हैं कि जो बडे लोगों को तुच्छ कहते हैं वह कथन मात्र से छोटे हो जाते। गोवर्धन पर्वत धारी श्री कृष्ण को मुरली पकड़ने वाला कहने से कुछ दुख नहीं होता।
भावार्थ- यदि किसी में कोई योग्यता और शक्ति है तो उसको समाज में बहुत सम्मान मिलता है पर अगर कुछ निम्न कोटि के लोग उसकी आलोचना करते हैं तो उसको कोई नहीं सुनता क्योंकि जिसमें शक्ति है उसकी सभी पूजा करते हैं और वह इन बातों की परवाह नहीं करते कि कोई उनके बारे में क्या कह रहा है।

जो रहीम ओछो बढे तौ अति ही इतराय
प्यादे सौं फर्जी भयो, टेढो टेढो जाय


कविवर रहीम कहते हैं कि छोटे व्यक्ति बड़ा पद पाने के बाद अहंकारी हो जाते हैं-जैसे शतरंज के खेल में पैदल चलाने वाला यदि वजीर बन जाये तो वक्र गति से चलने लगते हैं।

भावार्थ-कुछ बहुत ओछी मनोवृति के लोग होते हैं जिनको थोडी योग्यता, संपति या सम्मान मिलता है वह फूल जाते हैं और अपने मुहँ से अपनी बधाई करते हैं और ऐसे दिखावा करते हैं जैसे कि बहुत बडे व्यक्ति हो गए हैं। ऐसे लोगों कि परवाह नहीं करना चाहिऐ.

जो रहीम ओछो बढे तौ अति ही इतराय
प्यादे सौं फर्जी भयो, टेढो टेढो जाय

कविवर रहीम कहते हैं कि छोटे व्यक्ति बड़ा पद पाने के बाद अहंकारी हो जाते हैं-जैसे शतरंज के खेल में पैदल चलाने वाला यदि वजीर बन जाये तो वक्र गति से चलने लगते हैं।

भावार्थ-कुछ बहुत ओछी मनोवृति के लोग होते हैं जिनको थोडी योग्यता, संपति या सम्मान मिलता है वह फूल जाते हैं और अपने मुहँ से अपनी बधाई करते हैं और ऐसे दिखावा करते हैं जैसे कि बहुत बडे व्यक्ति हो गए हैं। ऐसे लोगों कि परवाह नहीं करना चाहिऐ

Wednesday, January 9, 2008

विदुर नीति:वही पंडित कहलाता है.........

  • अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान , उद्योग, दु:ख सहने की शक्ति और धर्म में स्थिरता- ये गुण जिस मनुष्य को पुरुषार्थ से च्युत नहीं करते वही पंडित कहलाता है।
  • जो अच्छे कर्मों का सावन करता और बुरे कर्मों से दूर रहता है साथ ही जो आस्तिक और श्रद्धालु है, उसके ये सद्गुण पंडित होने के लक्षण है।
  • क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्दंडता तथा अपनी पूज्य होने की अनुभूति ये भाव जिसको पुरुषार्थ से भ्रष्ट नहीं करते, वही पंडित कहलाता है।
  • दूसरे जिसके कर्तव्य, सलाह और पहले से किये हुए विचार को नहीं जानते, बल्कि काम पूरा होने पर ही जानते हैं वही पंडित कहलाता है।
  • सर्दी-गर्मी, भय-अनुराग, संपति अथवा दरिद्रता ये जिसके कार्य में विघ्न नहीं डालते वही पंडित कहलाता है।
  • जिसकी लौकिक बुद्धि धर्म और अर्थ का अनुसरण करती है और जो भोग को छोड़कर पुरुषार्थ का ही वरण करता है वही पंडित कहलाता है।

Tuesday, January 8, 2008

रहीम के दोहे:राजा के सामीप्य से मान में कमी

आदर घटे नरेस ढिंग, बसे रहे कछु नाहिं
जो रहीम कोटिन मिले, धिग जीवन जग माहिं


कविवर रहीम कहते हैं कि राजा के समीप सदा निवास करने से सम्मान में कमी आती है और कुछ भी प्राप्त नहीएँ होता। यदि व्यक्ति भीड़ में शामिल हो जाता है तो उसकी अपनी कोई पहचान नहीं रहती। ऐसे जीवन को धिक्कार है।


आप न काहूँ काम कि, डार पात फल फूल
औरन को रोकत फिरै, रहिमन पेड़ बबूल


कविवर रहीम कहते हैं कि जैसे बबूल के पेड़ की शाखा, पत्ते पेड़, फल और फूल किसी काम के नहीं होते और अन्य पेड़ों के विकास को भी रोक लेते हैं, उसी प्रकार अनेक व्यक्ति व्यर्थ जन्म लेकर दुसरे व्यक्तियों के जीवन में भी बाधक बन जाते हैं।

Monday, January 7, 2008

संत कबीर वाणी:डींग तो कायर हांका करते हैं

कायर तबही परषिये लड़े घणी के हेत
पुरिजा-पुरिजा ह्नै पडै, तऊ न छाँडै खेत


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बड़ी डींगें कायर ही हांका करते हैं, शूरवीर कभी बहकते नहीं। यह तो समय पर संकट आने पर ही जाना जा सकता है कि शूरवीर अपने आपको कौन प्रकट होता है।

मांगन मरण समान है, तोहि दई मैं सीख
कहैं कबीर समझे के मति कोई मांगे भीख


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि किसी से मांगना मरने के समान है, संत कबीर समझाते हुए कहते हैं कि मैं तुम्हें शिक्षा देता हूँ कि कभी किसी से भिक्षा मत मांगो।

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