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Wednesday, June 22, 2011

रिश्ते बन गये कर्ज जैसे-हिन्दी शायरी (ban gaye karz jaise-hindi shayari)

उधार की रौशनी में
जिंदगी गुजारने के आदी लोग
अंधेरों से डरने लगे हैं,
जरूरतों पूरी करने के लिये
इधर से उधर भगे हैं,
रिश्त बन गये हैं कर्ज जैसे
कहने को भले ही कई सगे हैं।
--------------
आसमान से रिश्ते
तय होकर आते हैं,
हम तो यूं ही अपने और पराये बनाते हैं।
मजबूरी में गैरों को अपना कहा
अपनों का भी जुर्म सहा,
कोई पक्का साथ नहीं
हम तो बस यूं ही निभाये जाते हैं।
--------------
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com
                  यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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Monday, May 24, 2010

ज़िंदगी का सबसे बड़ा अर्थ-हिन्दी शायरी (zindagi ka arth-hindi shayari)

जो चले हैं स्वयं कालिख की राह,
उनसे स्वच्छ चरित्र के लिये
प्रमाण पाने की चाह,
एकदम व्यर्थ है,
काला अक्षर भैंस बराबर मानते जो लोग
उनके लिये गाय के गुण में भी अनर्थ है।

हर इंसान ढूंढता है
अपने ही जैसे साथी
अच्छा यह बुरा होना नहीं कोई शर्त है।

दागदार है जिनके चरित्र
रंगीन कहलाते हैं खुद को
साफ चेहरे उनको कबाड़ नज़र आते हैं,
रंगे हैं हाथ जिनके खून से
आत्मीय उनके बन जाते हैं,
बदनाम न हो इसलिये
लगाते हैं पैबंद इनामों का,
मुश्किल हो जाये तो उनके लिये
झूंड चल पड़ता लड़ने बेईमानों का
उनसे दरियादिली की आशा करना बेकार है
अपना साम्राज्य हर कीमत पर बचाने में ही
उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा अर्थ है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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Saturday, July 5, 2008

कुछ गूगल के हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद टूल से भी पूछ लो-व्यंग्य

जो कोई नहीं कर सका वह गूगल का हिंदी अंग्रेजी टूल करा लेगा। वह काम हैं हिंदी के लेखकों से शुद्ध हिंंदी लिखवाने का। दरअसल आजकल मैं अपने वर्डप्रेस के शीर्षक हिंदी में कराने के लिये उसके पास जाता हूं। कई बार अनेक कवितायें भी ले जाता हूं। उसकी वजह यह है कि हिंदी में तो लगातार फ्लाप रहने के बाद सोचता हूं कि शायद मेरे पाठ अंग्रेजों को पसंद आयें। इसके लिये यह जरूरी है कि उनका अंग्रेजी अनुवाद साफ सुथरा होना चाहिये। अब हिट होने के लिये कुछ तो करना ही है। अब देश के अखबार नोटिस नहीं ले रहे तो हो सकता है कि विदेशी अखबारों में चर्चा हो जाये तो फिर यहां हिट होने से कौन रोक सकता है? फिर तो अपने आप लोग आयेंगे। तमाम तरह के साक्षात्कार के लिये प्रयास करेंगे।

इसलिये उस टूल से अनुवाद के बाद उनको मैं पढ़ता हूं पर वह अनेक ऐसे शब्दों को नकार देता है जो दूसरी भाषाओं से लिये गये होते हैं या जबरन दो हिंदी शब्द मिलाकर एक कर लिखे जाते हैं। इसका अनुवाद सही नहीं है पर जितना है वह अंग्रेजी में पढ़ने योग्य हो ही जाता है। उसकी सबसे मांग शुद्ध हिंदी है। उस दिन चिट्ठा चर्चा में एक शब्द आया था जालोपलब्ध। मैंने इसका विरोध करते हुए सुझा दिया जाललब्ध। इस टूल पर प्रमाणीकरण के लिये गया पर उसने दोनों शब्दों को उठाकर फैंक दिया और मैं मासूमों की तरह उनको टूटे कांच की तरह देखता रहा। तब मैंने जाल पर उपलब्ध शब्द प्रयोग किया तब उसने सही शब्द दिया-जैसे शाबाशी दे रहा हो। मतलब वह इसके लिये तैयार नहीं है कि तीन शब्दों को मिलाकर उसक पास अनुवाद के लिये लाया जाये।

इधर बहुत सारे विवाद चल रहे हैं। कोई कहता है कि हिंदी में सरल शब्द ढूंढो और कोई कहता है कि हिंदी में उर्दू शब्दों का प्रयोग बेहिचक हो। कोई कहता हैं कि उर्दू शब्दों में नुक्ता हो। कोई कहता है कि जरूरत नहीं। इन बहसों में हमारे अंतर्जाल लेखक-जिनमें मैं स्वयं भी शामिल हूं-इस बात पर विचार नहीं करते कि कुछ गूगल के हिंदी अग्रेजी टूल से भी तो पूछें कि उसे यह सब स्वीकार है कि नहीं।
आप कहेंगे कि इससे हमें क्या लेना देना? भई, हिंदी में भी अंतर्जाल पर लिखकर हिट होने की बात तो अब भूल जाओ। भाई लोग, अब बाहर के लेखकों के लिये क्लर्क का काम भी करने लगे हैं। उनकी रचनायें यहां लिख कर ला रहे हैं और बताते हैं कि उन जैसा लिखो। अब इनमें कई लेखक ऐसे हैं जिनका नाम कोई नहीं जानता पर उनको ऐसे चेले चपाटे मिल गये हैं जो उनकी रचनाओें को अपने मौलिक लेखन क्षमता के अभाव में अपना नाम चलाने के लिये इस अंतर्जाल पर ला रहे हैं। सो ऐसे में एक ही चारा बचता है कि अंतर्जाल पर अंग्रेजी वाले भी हिंदी वालों को पढ़ने लगें और अगर वह प्रसिद्धि मिल जाये तो ही संभव है कि यहां भी हिट मिलने लगें।

मैं यह मजाक में नहीं कह रहा हूं। यह सच है कि भाषा की दीवारें ढह रहीं हैं और ऐसे में अपने लिखे के दम पर ही आगे जाने का मार्ग यही है कि हम इस तरह लिखें कि उसका अनुवाद बहुत अच्छी तरह हो सके। हालांकि मैंने प्रारंभ में कुछ पाठ वहां जाकर देखे पर फिर छोड़ दिया क्योंकि उस समय कुछ अधिक हिट आने लगे थे। अब फिर वेैसी कि वैसी ही हालत हो गयी है और अब सोच रहा हूं कि पुनः गूगल के हिंदी अंग्रजी टूल पर ही जाकर अपने पाठ देखेंे जायें वरना यहां तो पहले से ही अनजान लेखकों को यहां पढ़कर अपना माथा पीटना पड़ेगा। अखबार फिर उन लेखकों और उनको लिखने वाले ब्लाग लेखकों के नाम छापेंगे। अगर अपना नाम कहीं विदेश में चमक जायेगा तो यहां अपने आप हिट मिल जायेंगे। वैसे भी यहां हिंदी वाले अंग्रेजी की वेबसाईटें देखना चाहते है और उनके लिये हिंदी में पढ़ना एक तरह से समय खराब करना है ऐसे में हो सकता है कि जब यहां प्रचार हो जाये कि अंग्रेजी वाले भी हिंदी में लिखे पाठों को पढ़ रहे है तब हो सकता है कि उनमें रुचि जागे। यहां के लोग विदेशियों की प्रेरणा पर चलते हैं स्वयं का विवेक तो बहुत बाद में उपयोग करते हैं।

Saturday, June 28, 2008

अकेले में भी यादें खत्म कर देतीं एकांत-हिन्दी शायरी


जब याद आती है अकेले में किसी की
खत्म हो जाता है एकांत
जिन्हें भूलने की कोशिश करो
उतना ही मन होता क्लांत
धीमे-धीमे चलती शीतल पवन
लहराते हुए पेड़ के पतों से खिलता चमन
पर अकेलेपन की चाहत में
बैठे होते उसका आनंद जब
किसी का चेहरा मन में घुमड़ता
हो जाता अशांत

अकेले में मौसम का मजा लेने के लिये
मन ही मन किलकारियां भरने के लिये
आंखे बंद कर लेता हूं
बहुत कोशिश करता हूं
मन की आंखें बंद करने की
पर खुली रहतीं हैं वह हमेशा
कोई साथ होता तो अकेले होने की चाहत
अकेले में भी यादें खत्म कर देतीं एकांत
.................................
दीपक भारतदीप

Friday, June 27, 2008

इसलिए दुनिया रंगरंगीली कहलाती हैं-हिंदी शायरी



मेरी नाव डुबोने वाले बहुत हैं
पर उनकी याद कभी नहीं आती
मझधार में भंवर के बीच आकर जो
किनारे तक पहुंचा जाते
फिर नजर नहीं आते
ऐसे मित्रों की याद मुझे सताती

घाव करने के लिए इस जहां में बहुत हैं
जो बदन से रिसता लहू देखकर
जोर से मुस्कराते हैं
जिन्होंने घावों को सहलाया
जब तक दूर नहीं हुआ दर्द
अपना साथ निभाया
फिर ऐसे गायब हुए कि दिखाई न दिए
आँखें उनको देखने को तरस जाती हैं

इस जिन्दगी के खेल बहुत हैं
नाखुश लोगों से दूर नहीं जाने देती
जो तसल्ली देते हैं
उनको आँखों से दूर ले जाती है
शायद इसलिए दुनिया रंगरंगीली कहलाती हैं
-------------------------------
दीपक भारतदीप

Sunday, June 22, 2008

खामोशी तब दर्द का इलाज हो जाती है-हिन्दी शायरी

जुबान कभी नहीं बोलती
तब खामोशी बहुत कुछ कह जाती है
शब्दों का दिल से बाहर आना
बेकार लगता है
तब आखें दर्द दिखा जातीं है
जब लोग भीड़ में चिल्ला रहे हों
अकेले में भी अपनी जुबान से इठला रहे हों
तब खामोशी से दोस्ती कर लो
वही दर्द का इलाज हो जाती है
................................
दीपक भारतदीप

Saturday, June 21, 2008

एक बेसिर पैर की हास्य कविता

अंतर्जाल पर लिखने वाले
चिट्ठाकार अपनी तुलना करने लगते श्वान से
बिल्ली से करते क्यों शरमाते
प्रतिदिन नजरें गढ़ाये रहते हैं
ब्लागवाणी पर हिट पाने के लिये
और कभी भद्र तो कभी अभद्र
नारे लिख आते
भला इसमें कहां श्वान के लक्षण नजर आते हैं
लिखने को भी भौंकना कैसे कह पाते
पता नहीं कौन शिक्षक और कौन शिष्य
सभी वाद पर वाद लाये जाते

कहैं महाकवि दीपक बापू
‘जब सभी अपने पर ही
लगा रहे उपाधियां
तो क्यों हम भी पीछे रह जायें
आज से हम भी अब स्वयं ही महाकवि हो जायें
यह चिट्ठाकार भी किस दुकान का
चिट्ठा लिख कर आते
दस पंक्ति लिख कर ही
जोरदार हिट पा जाते
उनक्र चिट्ठे और हमारी पत्रिकाओं के
चेहरे एक जैसे लगते
पर अंदर कविता हो या दुकान का हिसाब
रजिस्टर सभी एक जैसे फबते
हम लेखक और संपादक ठहरे
चिट्ठाकारों से बहुत डरते
लिखेंगे चंद शब्द और छा जायेंगे
हम कितना भी लिखें फ्लाप ही रह जायेंगे
हम तो समझाते क्यों कोसते हो अपने आपको
ढूंढ लो अपने अंदर भी प्रतिभा
तो हमारी तरह महाकवि बन जाओगे
ब्लागवाणी पर कम हिट होंगे
अपने ब्लाग का नाम भी अखबार में नहीं
देख पाओगे
पर हमारी तरह आम पाठकों में
हिट होते जाओगे
चिट्ठाकार से अंतर्जाल के प्रसिद्ध लेखक
बनते नजर आओगे
वाद और नारों पर देश चलता रहा है
इसलिये आज भी वहीं खड़ा है
गहन चिंतन नहीं करेंगे
हर विद्वान इसी पर अड़ा है
हम तो देते हैं मुफ्त में सलाह
शायद कभी हमें ब्लागवाणी पर जोरदार हिट मिल जायें
एक दिन तो हिट पायें
और फिर मित्रों में अपना रुतवा दिखायें
यहां तो फ्लाप होकर ही काम चलाते
अपने ऊपर ही कस कर फब्तियां
वाह-वाह की लगी तख्तियां
कितनी देर देंगी शक्तियां
पर चिट्ठाकारों की इस महफिल में
हम साहित्यकार कहां टिक पाते
फिर भी मित्र हैं हमारे
उनकी कुंठाओं पर हास्य कविता लिखकर उनको हंसाते
...................................
नोट-यह एक काल्पनिक हास्य कविता है जो इस फ्लाप पत्रिका को हिट बनाने के लिये विशेष रूप से लिखी गयी है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई लेना देना नहीं है अगर किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।

Monday, June 2, 2008

जब उतर जाता है शराब का नशा-व्यंग्य कविता

शराब के नशे में वादे
कर वह सुबह भूल जाते हैं
पूरे करने की बात कहो तो
याद करने के लिए बोतल
मांगने लग जाते हैं
---------------------
आदमी पीता है शराब
या आदमी को शराब
यह एक यक्ष प्रश्न है
जिसका नहीं ढूंढ पाया
कोई भी जवाब
----------------
सिर पर चढ़ती शराब
आदमी को शेर बना देती है
दौड़ता है इधर उधर बेलगाम
काबू में नहीं रहती जुबान
उतरती चूहा बना देती है
घबडा जाता है आदमी
ढूंढता है छिपने की जगह
अपने ही हाथ में नहीं रहती
अपने दिमाग की कमान
----------------------------------

शराब में डूबकर अगर जिन्दगी के
सफर में पार हो जाते
तो फिर फिर झूठी क़समें और
वादों को इस दुनिया में कहाँ देख पाते

भ्रम का सिंहासन दिखाते हैं-व्यंग्य कविता





एक सपना लेकर
सभी लोग आते हैं सामने
दूर कहीं दिखाते हैं सोने-चांदी से बना सिंहासन

कहते हैं
‘तुम उस पर बैठ सकते हो
और कर सकते हो दुनियां पर शासन

उठाकर देखता हूं दृष्टि
दिखती है सुनसार सारी सृष्टि
न कहीं सिंहासन दिखता है
न शासन होने के आसार
कहने वाले का कहना ही है व्यापार
वह दिखाते हैं एक सपना
‘तुम हमारी बात मान लो
हमार उद्देश्य पूरा करने का ठान लो
देखो वह जगह जहां हम तुम्हें बिठायेंगे
वह बना है सोने चांदी का सिंहासन’

उनको देता हूं अपने पसीने का दान
उनके दिखाये भ्रमों का नहीं
रहने देता अपने मन में निशान
मतलब निकल जाने के बाद
वह मुझसे नजरें फेरें
मैं पहले ही पीठ दिखा देता हूं
मुझे पता है
अब नहीं दिखाई देगा भ्रम का सिंहासन
जिस पर बैठा हूं वही रहेगा मेरा आसन

Sunday, May 25, 2008

बेआबरू होने का लेकर लौटे गम-हिन्दी शायरी

अपनों में गैर
और गैरों में अजनबी हो जाना
कितना सताता है
जब आदमी अपने को अकेला पाता है

भरी दोपहर में
शरीर से बहता पसीना
चलते जा रहे पांव
चंद पलों के मन के सुख की खातिर
जिस घर के अंदर झांका
वहीं जंग का मैदान पाता है

मांगने पर थोड़ा प्यार
इतराने लगते हैं लोग
देते हैं नसीहतें तमाम
पर चंद प्यार के लफ्ज बोलकर
हमदर्दी जताने का ख्याल
किसी को नहीं आता है

ऊपर से बरसाता आग सूरज
नीचे जलती धरती
नंगे पांव चलता आदमी
ढूंढता है सभी जगह मन की शीतलता
पर भी नजर डाले
लोगों का मन छल से भरा
स्वयं को ही धोखा देता नजर आता है

कुछ पल प्यार की चाह
जलते पांव के लिये शीतलता की राह
मांग कर अपने आपको
शर्मिंदा करने से तो
जलती आग मे चलते रहना ही भाता है
भला आदमी भी कभी आदमी को
सुख के पल दे पाता है
..................................
उस महफिल में चंद पल सुकून से
बिताने की खातिर रखा था कदम
हमें मालुम नहीं था दिलजलों ने
अपने लिये उसे सजाया हैं
उनके मसले देखकर ख्याल आया कि
इससे तो घर ही अच्छे थे हम
पहले भी कम नहीं थे साथ हमारे
वहां से बेआबरू होने का लेकर लौटे गम
......................................

Wednesday, May 7, 2008

एक पोस्ट साथियों के नाम

ब्लागस्पाट पर मेरे सात ब्लाग ऐसे हैं जो हिंदी फोरमों पर पंजीकृत है और इन पर तीन बार ऐसा अवसर आया है जब एक दिन में 99 तक व्यूज पहूंचे हैं आज यह ब्लाग है जो 100 की संख्या पार कर गया। पंजीकृत ब्लागों से आशय मेरा यह है कि जिनको मैंने स्वयं इन फोरमों पर ईमेल भेजकर कराये हैं। वैसे मेरे दो ब्लाग नारद और चिट्ठाजगत ने मुझसे पूछे बगैर पंजीकृत कर लिये बिना यह जाने कि मैंने उनको प्रयोग के लिये शुरू किया था और उनमें एक ब्लाग ने एक दिन में 183 व्यूज लेकर मुझे हिला दिया जबकि उसकी पोस्टें नगण्य हैं। मैने उसका जिक्र इसलिये नहीं किया क्योंकि मुझे लगा कि मेरे प्रयोग पर भी कोई प्रयोग कर रहा है-और मैं भी अभी प्रयोग जारी रखूंगा। आजकल हिंदी के एग्रीगेटरों के कर्णधार अधिक सक्रिय हो गये है, और किसी भी ब्लाग को खुला नहीं छोड़ते अपने यहां खींच ले जाते हैं। बहरहाल यह कोई शिकायतनामा नहीं लिख रहा।

आज ही मेरे वर्डप्रेस के एक ब्लाग ने बीस हजार की संख्या पार की और उस पर पोस्ट लिखी और स्टेट काउंटर खोलकर जब अपने इस ब्लाग की संख्या देखी तो सोच में पड़ गया। कल लिखी गयी पोस्ट ने अपेक्षा से अधिक पोस्ट जुटाये। यह पोस्ट मैंने आधी अपने विंडो पर और आधी ब्लागस्पाट पर लिखी। वही हुआ जिसकी संभावना थी। कुछ हिस्से मैने कुछ लिखे लोगों ने कुछ और समझे। मैंने देर गये रात यह पोस्ट डाली और मुझे लग रहा था कि अब भला कौन पढ़ेगा? मगर ऐसा लगता है कि कई ब्लाग लेखक तो ताक में बैठे रहते हैं कि कोई अच्छा या अलग हटकर विषय आये तो पढ़ें। सहमति या असहमति एक अलग विषय है पर एक बात तो सिद्ध होती है कि ब्लाग और ब्लाग लेखकों से अलग हटकर लिखे विषय भी यहां हिट पा सकते हैं। कुछ लोग केवल ब्लाग लेखकों से हिट लेने के लिये उनसे संबंधित विषय ही उठाते हैं और हिट लेने में सफल होते हैं और जो ब्लागर अन्य विषय लिखते हैं उनको वैसे हिट नहीं मिलते पर उसके लिये किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।

कल की पोस्ट यौन शिक्षा और ब्रह्मचर्य पर थी, जिसमें कुछ हास्य तो कुछ चिंतन था. वैसे यौन शिक्षा और ब्रह्मचर्य जैसे विषयों पर मैंने अधिक अध्ययन किया नहीं किया है और यह जरूरी नहीं है कि मैं किताबों में लिखी हर बात को वैसे ही मान लूं। अपने चिंतन और मनन से मैं कोई नई परिभाषा या अर्थ भी वर्तमान संदर्भों में गढ़ भी सकता हूं। सरस्वती माता की कृपा और अपने प्राचीनतम ग्रंथों के अध्ययन और गुरूजनों की शिक्षा के साथ कुछ नवीनतम विचार और रचना के सृजन करने की प्रेरणा ने मुझे इतना सक्षम बनाया है कि अपने मौलिक विचार व्यक्त कर सकता हूं। मेरे निजी मित्र और साथी कभी मेरे विचारों से सहमत होते हैं और नहीं भी, पर एक बात सभी कहते हैं कि तुम्हारी बात में दम तो है। आशा है कि अपने ब्लाग लेखक साथियों की प्रेरणा से ऐसे ही मेरे ब्लाग बढ़ते रहेंगे।
दीपक भारतदीप

Monday, April 14, 2008

अंतर्जाल लेखकों के वैचारिक धरातल पर एक साथ खडे होने का मतलब-आलेख

जब मेरे ब्लागों पर कुछ ऐसे लोगों के कमेंट आते हैं जिनसे मैं परिचित नहीं हूं तो तत्काल जाकर उनके ब्लाग देखता हूं। मुझे आश्चर्य तब होता है जब वैचारिक धरातल पर सब मेरे साथ ही खड़े दिखाई देते है। परिचितों में तो करीब-करीब सभी एक ही वैचारिक संघर्ष में व्यस्त हैं। मैने ब्लागरों में जो बातें देखीं हैं वह भी गौर करने लायक है-

1. सभी ब्लागर अपने धर्म में आस्थावान हैं पर उनका कर्मकांडों और अंधविश्वासों से बहुत कड़ा विरोध है। इस मामले में वह यह मानने को तैयार नहीं है कि दिखावे की भक्ति कर लोगों को स्वर्ग का रास्ता दिखाया जाये जो कभी बना ही नहीं।

2.अपने विचारों के साथ ईमानदारी के साथ चलने की उनमें दृढ़ता है और वह किसी प्रकार की चाटुकारिता में यकीन नहीं करते।
3.देश के हालातों से बहुत चिंतित हैं और ऐसी घटना जिसमें किसी महिला को अपमानित किया जाता है, गरीब को सताया जाता है और निर्दोष को मारा जाता है उससे वह विचलित होते है।
4.राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति अटूट निष्ठा है और जिसको प्रमाणित करने के लिये वह किसी भी हद तक कष्ट उठा सकते हैं।
5. वह वर्तमान व्यवस्था से असंतुष्ट हैं। प्रचार माध्यमों के प्रति उनके मन में अनेक संदेह है और वह इसे व्यक्त करते हैं।

लिखने की शैली और प्रस्तुतिकरण के तरीके में अंतर हो सकता है पर कमोवेश मूल विचार में एकरूपता है। अपने आलेखों और कविताओं पर उनके रवैये से एक बात लगती है कि कहीं न कहीं उनके मन में इस समाज को बदलते देखने की इच्छा है। वह जानते हैं कि उनके लिखे से समाज नहीं बदलेगा पर मैं कहता हूं कि आज अगर हम कोई विचार आज लिखकर या बोलकर व्यक्त करते हैं तो कल वह समाज के हिस्सा बन ही जाता है। हमारे सामने भी ऐसा हो सकता है और हमारे बाद भी। काम कहने वाले और करने वाले दोनों मिट जाते हैं पर जो उनके शब्द होते हैं वह आगे चलते जाते हैं।

अक्सर लोग कहते हैं कि लिखे से समाज नहीं बदलता पर शब्द चलते हैं और कोई उनको पढ़कर प्रभावित होता है तो उसके कर्म पर प्रभाव होता है। आज जो मैं लिख रहा हूं वह किसी के शब्दों की प्रेरणा ही हैं न! किसी ने मुझे अभिव्यक्ति का पता दिया था लिखकर। वह मुझे कहां से कहां ले आया। यह तो एक शब्द हैं बहुत सारे शब्द हैं जिनको लेकर मैं आगे बढ़ा। मेरे लिखे से समाज नहीं बदला पर मेरे में बदलाव तो आया न! मैं अगर यहां लिख रहा हूं तो कोई जगह जहां से हट रहा हूं। अपने मनोरंजन के लिये टीवी या अखबार से परे होना पड़ता है। कहीं जाकर फालतू समय नष्ट करने से अच्छा मुझे लिखना लगता है।

निष्कर्ष यह है कि हिंदी में ब्लाग के पाठक और लेखक आज नहीं तो कल बढ़ेंगे ही। मैने एक चार वर्ष से अधिक पुराना ब्लाग देखा था उसमें उसका लेखक निराशा में था और हिंदी में ब्लाग लेखन की प्रगति से नाखुश था। आज हम देखें तो उसके मुकाबले स्थिति बहुत ठीक है। दरअसल लोग ऊबे हुए हैं और वर्तमान में उनकी अभिव्यक्ति का अपना कोई अधिक सशक्त साधन नहीं हैं, जो हैं उनसे वह संतुष्ट नहीं है। एक बात और है कि जो भी संचार और प्रचार माध्यम है वह चल तो हमारे पैसे से ही रहे हैं कोई अपनी जेब से नहीं चला रहा। हम उनका अप्रत्यक्ष भुगतान करते हैं पर उसका पता नहीं लगता यहां पर प्रत्यक्ष भुगतान कर रहे हैं उसको लेकर हम परेशान होते हें क्योंकि वह दिखता है। मै छह सौ रुपये का इंटरनेट का भुगतान करता हूं यह मानकर कि यह डिस्क कनेक्शन है जिसका डबल भुगतान करना है। लिखना तो मेरे लिये एक साधन है जिससे मुझे जीवन में ऊर्जा मिलती है।
जब मेरा यह सोच है तो ऐसा सोचने वाले और भी होंगे। यह अंतर्जाल पर ब्लाग लिखने और पढ़ने का सिलसिला इसलिये भी चलता रहेगा क्योंकि लिखने वाले इसका भुगतान करेंगे और जो इनका चला रहे हैं वह इसे बंद नहंी करेंगे। अन्य प्रचार माध्यम जरूर विज्ञापन न मिलने पर संकट में आ सकते हैं। जिस तरह ब्लाग लोगों की अभिव्यक्ति का साधन बन रहा है उससे तो ऐसा लगता है कि लोग अन्य जगह से हटकर इधर आयेंगे और यह एक सशक्त माध्यम बनेगा। ऐसे में जो प्रबंधन कौशल में माहिर होंगे वह आय भी अर्जित करेंगे और कुछ लोग इसका उपभोक्ता की तरह इस्तेमाल कर इसे प्राणवायु देते रहेंगे। आखिर दूसरे संचार और प्रचार माध्यमों में भी तो ऐसा ही हो रहा है। कोई खर्च कर रहा है और कोई कमा रहा है। मोबाइल पर फालतू बातें कर खर्च करने वाले क्या कम हैं? ऐसे में लिखने वाले भी ऐसा ही करेंगे। मेरा मानना है कि आगे संचार और प्रचार माध्यमों को इससे चुनौती मिलने वाली है और इसके कितना समय लगेगा यह कहना कठिन है पर अधिक नहीं लगेगा ऐसा मेरा अनुमान है। एक दृष्टा की तरह ही मैं इस खेल को देख रहा हूं। अभी हाल ही में कृतिदेव का यूनिकोड में परिवर्तित टूल मिलने के बाद तो मैने हास्य कविता लिखना कम ही कर दिया क्योंकि वह अधिक लिखना मुश्किल होने से ही लिखता था। हालांकि मुझे लगता है कि उन हास्य कवितओं के पाठक बहुत हैं और मुझे फिर लिखना शुरू करना पड़ेगा।

Wednesday, April 2, 2008

चिड़िया का घरौंदा-हिन्दी शायरी

तिनका-तिनका मूंह में दबाकर
मेरे कमरे में ला रही है
चिडिया अपना घरौंदा बनाने के लिये
कभी पंखे पर रखती है
कभी रोशनदान पर ही रख देती
पंखा चलाने पर
बिखर जाता है घरौंदा
फिर ले आती है तिनके
कहीं दूसरी जगह घरौंदा बनाने के लिये

कई बार चिडिया पंखे से
टकराकर कर गिर जाती है
जिनको बचा सकता हूं
बचाने की कोशिश करता हूं
उसका संघर्ष विचलित किये रहता है कि
कहीं मेरी गलती से
बिखर न जाये उसका घरौंदा
कई बार उसके घरौंदे
उठाकर दूसरी
सुरक्षित जगह पहुंचा देता हूं
पर वह तैयार नहीं होती इसके लिये
हमेशा चुनती है वही जगह
जो मेरी दृष्टि में उसके लिये असुरक्षित हैं
पर मैं नहीं समझा पाता उसे
वह तो चलती है
अपने पथ पर अपने इरादे लिये
............................................

Tuesday, March 18, 2008

सामान भी आदमी की तरह पुराने हो जाते हैं-हिन्दी शायरी

अपनी रौशनी बेचने के लिए
पहले अँधेरे वह करवाते हैं
सौदागरों को जमाने से क्या मतलब
उन्हें तो अपनी चीज के दाम सुहाते हैं
आग लगाने का सामान हो या बुझाने का
दोनों ही वह बाजार में सजाते हैं

चैन और अमन कभी बाजार में नहीं मिलते
सुख और प्यार कहीं सजता नहीं
पर सौदागर इनको भी सजाते हैं
डुगडुगी बजाकर सन्देश सुनाने वाले
उनके प्रचार में झूठ को ही सच बताते हैं
ए, बाजारमें सौदा लेने वालों
पैसे के साथ अपनी अक्ल भी साथ ले जाना
चीजें खरीदना पर दिल न लगाना
सामान भी आदमी की तरह पुराने हो जाते हैं
-------------------------------------

Monday, March 17, 2008

यादों से तोड़ लो दोस्ती-हिन्दी शायरी

यादों से तोड़ लो दोस्ती
भूलने की जहमत क्यों उठाते हो
समय के साथ चलते जाओ
जो छोड़ गए साथ उनको क्यों बुलाते हो
अपने मतलब के लिए लोग साथ आते
और फिर छोड़ जाते
किस-किसका हिसाब रखें
कब तक बिछड़ने का गम पालें
और अपने दर्द को चखें
यादों से समय नहीं कटता
भूलने की कोशिश करना कठिन लगता
इसलिए अपनी जिन्दगी की
राह पर नजर रखते चलते जाओ
---------------------------------------

Friday, March 14, 2008

आदमी व्यस्त नजर आता है-साहित्यक कविता

एक बच्चे के पैदा होने पर
घर में खुशी का माहौल छा जाता है
भागते हैं घर के सदस्य इधर-उधर
जैसी कोई आसमान से उतरा हो
ढूढे जाते हैं कई काम जश्ने मनाने के लिए
आदमी व्यस्त नजर आता है

एक देह से निकल गयी आत्मा
शव पडा हुआ है
इन्तजार है किसी का, आ जाये तो
ले जाएं और कर दें आग के सुपुर्द
तमाम तरह के तामझाम
रोने की चारों तरह आवाजें
कई दिन तक गम मनाना
दिल में न हो पर शोक जताना
आदमी व्यस्त नजर आता है

निभा रहे हैं परंपराएं
अपने अस्तित्व का अहसास कराएं
चलता है आदमी ठहरा हैं मन
बंद हैं जमाने के बंदिशों में
लगता है आदमी काम कर रहा है
पर सच यह है कि वह भाग रहा है
अपने आपसे बहुत दूर
जिंदा रहने के बहाने तलाशता
आदमी व्यस्त नजर आता है
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Monday, March 10, 2008

संत कबीर वाणी-मीठी वाणी से सब प्रसन्न होते हैं

कागा काको धन हरै कोयल काको देत
मीठा शब्द सुनाय के, जग अपनी करि लेत

              संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि कौवा किसका धन चोरी करता है और कोयल किसको क्या देती है, जबकि वह अपनी मीठी वाणी से सभी लोगों का मन हर लेती है।
            आज के सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या- इस संसार में कई लोग ऐसे हैं जो हमेशा कलुषित वाणी बोलते हैं और लोग उनसे बहुत नाराज रहते हैं जबकि कुछ लोग अत्यंत मधुर वाणी बोलते हैं जिससे सभी पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। भगवान् ने सबको वाणी दी है पर उसका इस्तेमाल हर कोई अपने ज्ञान और विवेक के अनुसार करता है। कौवा जब आवाज करता है तो कई लोग विचलित होते है और उनके मन में गुस्सा भर जाता है जबकि वह किसी से कुछ माँगता नहीं है और कोयल भी किसी को कुछ देती नहीं पर उसकी मधुर और कर्ण प्रिय वाणी मन मोह लेती है। इसलिए जितना हो सके मधुर बोलना चाहिए। इसके लिए थोडा ध्यान देने की जरूरत है और एक बार अभ्यास हो जाये तो फिर स्वत: मधुर बोल फ़ुट पड़ते हैं।
          किसी भी वाक्य को रूखे और कटु स्वर में बोलना सहज लगता है पर उसीको मीठा बोलने के लिए थोडा विचार करना पड़ता है इसलिए आलस्य वश उससे बचना चाहते हैं और इससे उनकी वाणी कटु हो जाती है। जैसे हमें अपने किसी मित्र से पेन मांगनी है और हम उसे सीधे कहें-''तुम्हारे पास पेन होगा, ज़रा देना तो।''
        इसी वाक्य को हम थोडा प्रेम से कहें -''यार, तुम्हारे पास एक पेन हो तो मुझे देना।''
आप देखें इसका प्रभाव क्या होता है। पहले वाक्य में मित्र पेन तो देगा पर उसके दिमाग में गुस्सा होगा या वह बहुत निकटस्थ हुआ तो उसके ह्रदय में कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी । अगर आप दूसरा वाक्य बोलेंगे तो उसके मन में खुशी का भाव उत्पन्न होगा-भले वह आपसे कभी कहे नहीं। इसलिए सामान्य व्यव्हार में आप दूसरों को प्रसन्न कर सकते हैं।

Sunday, March 9, 2008

मनुस्मृति:अपने नौकर से वफादारी निभाएं

आर्तस्तु कुर्यात्स्वस्थ: सन्यथाभाषितमादित:।
स: दीर्घस्यापि कालस्य तल्लभेतैव वेतनम।।


मनु स्मृति के इस श्लोक के अनुसार जो नौकर स्वस्थ अवस्था में ईमानदारी व निष्ठा से स्वामी के आदेश का पालन करता है वह रोगादि के कारण यदि लंबे समय तक अनुपस्थित रहे तो भी उसे वेतन प्रदान करना चाहिए।

आज के संदर्भ में व्याख्या- आज हम अक्सर ऐसी घटनाएँ देखते हैं जिसमें नौकर द्वारा मालिक के प्रति तमाम तरह के अपराध किये जाते हैं। दरअसल आज के भौतिक युग में सब जगह अविश्वास का माहौल है और ऐसे में किसी का विश्वास जीतना है तो उसकी सहायता कर ही यह संभव है। जो लोग धनी हैं उन्हें अपने नौकरों को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि विपति में वह उसकी सहायता करेंगे। कोई भी मालिक जब अपने नौकर को कोई काम कहता है तो वह उसे ईमानदारी से करता है तो उसकी प्रशंसा करना चाहिए। जब कई लोग बेईमानी से काम करते हैं उनको भी वेतन मिलता है तो और ईमानदार को भी वही तो न्याय कहाँ रह जाता है।

जो धनिक लोग चाहते हैं कि उनके नौकर ईमानदार रहें उन्हें उनके लिए नियत वेतन के साथ उसकी ईमानदारी के लिए एक राशि अपने मन में रख लेना चाहिए जो उसे बीमार पड़ने, बच्चों की शिक्षा और बेटी के विवाह आदि के समय उपहार के रूप में देनी चाहिए। अगर वह कभी स्वयं बीमार पड़ जाता है तो उसका वेतन तो देना चाहिए बल्कि उसका इलाज भी कराना चाहिए। उसे विश्वास दिलाना चाहिऐ कि वह अगर नौकर के रूप में वफादारी निभाएगा तो हम मालिक की तरह भी निभाएंगे। याद रखना श्रम खरीदा जा सकता है पर ईमानदारी नहीं।

Sunday, March 2, 2008

फटे हुए मामले पर कुछ नहीं लिखा-हास्य व्यंग्य

चेले को हमें एक निबंध लिखने को दिया और कहा-''कम से कम आधा घंटा तंग मत करना। हम अंतर्जाल पर लिख रहे हैं। बहुत दिन हुए कोई हिट होने वाला मसाला नहीं बना पाए। ''

उसके बाद हम कुर्सी पर आलथी-पालथी मारकर टाईप करने लगे। तो चेला बोला-''बढिया, गुरूजी। वाह मजा आ गया।''

हमने चौंक कर कहा-''क्या बात हैं अभी तो हमने तुम्हें ब्लोग लिखना और कमेन्ट देना सिखाया ही नहीं और तू देखते-देखते सीख गया। देख हमारे पास पढ़ने का तुझे कितना फायदा हो गया। अब तू अपने घर से डबल फीस ले आया कर। यह ब्लोग का विषय मुफ्त में नहीं सीखने दूंगा।''

चेला बोला-''गुरूजी, में ब्लोग की बात नही कर रहा हूँ। आप जिस तरह करवटें बदलकर लिख रहे हैं ऐसे अंग्रेज लेखक करते हैं। मेरे पापा बता रहे थे एक अंग्रेज लेखक ३२ प्रकार की कुर्सियों पर ६४ प्रकार की बैठक आकर लिखते थे। अब आप भी भी जिस तरह करवट बदलकर लिख रहे हैं उससे तो लगता है आप भी देश के नंबर वन हिन्दी ब्लोगर बन जायेंगे। ''

हमें गुस्सा आ गया-''तो तू हमारे जले पर नमक छिड़क रहा है जरूर गुरु माता ने तुझे हमारी फजीहत के बारे में बता दिया है। सुन पहली बात तो यह है कि वह लोग हमारे हलके ब्लोग को उड़ाकर ले गए और पांच रेटिंग रख दी। भारी ब्लोग तो वह लोग उठा ही नहीं पाए। उसके बाद जो हमने हास्य कवितायेँ बरसाईं वह भी बेमिसाल थीं और जमकर हिट हुईं थीं। तेरी गुरु माता तो बस हमारा मजाक बनातीं हैं। दूसरा यह अंग्रेज लेखकों की बात तो मेरे सामने किया ही मत कर। हम भारत के लोग जमीन पर जमीन के और देखते हुए लिखते हैं और इसलिए आज भी हमारा पुराना लिखा दुनिया में सम्मान पाता है। तीसरा यह है कि हम फटे हुए मामले पर लिख रहे हैं और इसलिए सुखासन में बैठकर लिख रहे हैं ताकि कहीं 'फटे में टांग न फंस जाये'।

चेला पहले तो देखने लगा फिर आश्चर्य चकित होते हुए बोला-''इस तरह फटे मामले पर लिखेंगे तो टांग नहीं फंसेगी?''

हमने कहा-''कैसे फंसेगी? कम अक्ल कहीं के! देख नहीं रहा आलथी-पालथी मारकर लिख रहे हैं।''

फिर बोला-''गुरु जी, पर मामला फटा कैसे है?''
हमने कहा-''हमें खुद नहीं मालुम? बस फटा हुआ है। लोग एक दूसरे पर बरस रहे हैं। उनको मिल रहे हैं जोरदार हिट बाकी तरस रहे हैं। ऐसा लगता है कि फटा हुआ मामला ही पढा जा रहा है। लोगों को फुरसत ही नहीं है कुछ और पढ़ने से।''
चेले ने पूछा-''गुरु जी, फिर आप क्यों झमेले में पढ़ रहे हैं। वैसे वह लोग लिख क्या रहे हैं।''
हमने कहा-''यही समझ में नहीं आ रहा है। हमने कल खूब प्रयास किया पर समझ में नहीं आया। कंप्यूटर के सामने उल्लुओं की तरह बैठे रहे।''

चेले ने पूछा-''फिर आप क्या लिख रहे हैं?''
हमने कहाँ-''हम भी लिख रहे हैं पर क्या हमको नहीं मालुम। अगर कुछ पढ़कर समझ में आता समझने वाली बात लिखते। अब हम भी लिख रहे हैं और किसी के समझ में आएगा इसमें हमें भी शक है। बात समझ में आये तो समझ वाली बात लिखें।''
उधर से गुरु माता की आवाज सुनकर किचन में चाय लेने चला गया। वहाँ उसकी गुरुमाता ने पूछा--''तेरे गुरूजी तुझे पढा रहे हैं कि कंप्यूटर से चिपके हुए हैं।''
चेले ने कहा--''गुरु जी फटे मामले पर कुछ आलथी-पालथी मारकर लिख रहे हैं।''
गुरुमाता ने पूछा-''क्यों? आलथी-पालथी मारकर क्यों?
चेले ने कहा-''इसलिए के फटे में टांग न फस जाये।''
गुरुमाता वहीं से जोर से चिल्लाकर बोली-''गुरु जी से कहो, दूसरों के मामले में टांग मत फंसाओ।

चेला चाय के दो कप लेकर आया और बोला-''गुरु जी, आखिर आप लिख क्या ले रहे हो। मुझसे गुरुमाता ने कहा है कि पूछ कर आओ।''

हमने कहा-'' बोल दे। कुछ नहीं लिख रहे। तुझे वहाँ सब कहने की क्या जरूरत थी? जाकर कह दे गुरूजी फटे मामले पर कुछ नहीं लिख रहे हैं।''

Saturday, February 23, 2008

संत कबीर वाणी:सोने का मदिरा से भरा पात्र भी निंदनीय

ऊंचे कुल की जनमिया करनी ऊँच न होय

कनक कलश मद सों, भरा साधू निंदा सोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि केवल ऊंचे कुल में जन्म लेने से किसी के आचरण ऊंचे नहीं हो जाते। सोने का घडा यदि मदिरा से भरा है तो साधू पुरुषों द्वारा उसकी निंदा की जाती है।

कोयला भी हो ऊजला जरि बरि ह्नै जो सेव

कनक कलश मन सों, भरा साधू निंदा होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं भली भांति आग में जलाकर कोयला भी सफ़ेद हो जाता है पर निबुद्धि मनुष्य कभी नहीं सुधर सकता जैसे ऊसर के खेत में बीज नहीं होते।

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