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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
सच्चे भक्त हैं जो लोग
भला वह कहां अपनी ताकत
दिखाने चौराहे पर आते हैं,
जो आकर भीड़ जुटायें
इंसानों को भेड़ बनाकर
वही बगुला भगत कहलाते हैं।
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वह भगत था पर बगुला न बना
इसलिये बगुला ही भगत बन गया,
करता रहा जो रोज भक्ति का शिकार,
हर शहर में उसका आशियाना तन गया।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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3.अनंत शब्दयोग
मुखौटों से रिश्ते रखते हुए
अब हम ऊबने लगे हैं,
वादों की नाव कभी चलती नहीं
इसलिये ख्वाबों में ही डूबने लगे हैं,
इंसानों के मर गये जज़्बात,
गद्दारी और वफादारी की नहीं जानते जात,
देखा हमने, क्योंकि रोज दुनियां के सच के साथ जगे हैं।
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किसी की दौलत और शौहरत देखकर
क्यों अपना दिल जला रहे हो,
अपने चिराग खुद जलाओ
दूसरों की रौशनी देखकर
अपनी आंखें क्यों गला रहे हो।
कह दिये किसी ने अपशब्द
भूल जाने में ही भलाई है,
रोकर सभी को दर्द बयान करने
व्यर्थ में ही जंगहंसाई है,
बोलने वाले को जलने दो
अपनी आग में
तुम क्यों याद कर
अपनी सोच को कांटों पर चला रहे हो।
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इंसानों में फरिश्ता दिखने की चाहत
उसे हैवान बना देती है,
बात करते हैं जो लोग सभी के भले की
मशहूरी पाने की उनकी चाहत
बंदूकें हाथ में थमा देती है।
मज़दूरों और गरीब की
इबादत करने का दिखावा है उनका
उनके बिछाये बम की धमक
बेबसों को भी लाश बना देती है।
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जो चले हैं स्वयं कालिख की राह,
उनसे स्वच्छ चरित्र के लिये
प्रमाण पाने की चाह,
एकदम व्यर्थ है,
काला अक्षर भैंस बराबर मानते जो लोग
उनके लिये गाय के गुण में भी अनर्थ है।
हर इंसान ढूंढता है
अपने ही जैसे साथी
अच्छा यह बुरा होना नहीं कोई शर्त है।
दागदार है जिनके चरित्र
रंगीन कहलाते हैं खुद को
साफ चेहरे उनको कबाड़ नज़र आते हैं,
रंगे हैं हाथ जिनके खून से
आत्मीय उनके बन जाते हैं,
बदनाम न हो इसलिये
लगाते हैं पैबंद इनामों का,
मुश्किल हो जाये तो उनके लिये
झूंड चल पड़ता लड़ने बेईमानों का
उनसे दरियादिली की आशा करना बेकार है
अपना साम्राज्य हर कीमत पर बचाने में ही
उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा अर्थ है।
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तारीफों के पुल अब उनके लिये बांधे जाते हैं,
जिन्होंने दौलत का ताज़ पहन लिया है।
नहीं देखता कोई उनकी तरफ
जिन्होंने ज़माने को संवारने के लिये
करते हुए मेहनत दर्द सहन किया है।
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खौफ के साये में जीने के आदी हो गये लोग,
खतरनाक इंसानों से दोस्ती कर
अपनी हिफाजत करते हैं,
यह अलग बात उन्हीं के हमलों से मरते हैं।
बावजूद इसके
सीधी राह नहीं चलते लोग,
टेढ़ी उंगली से ही घी निकलेगा
इसी सोच पर यकीन करते हैं।
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अब नहीं आती उनकी बेदर्दी पर
हमें भी शर्म,
क्योंकि बिके हुए हैं सभी बाज़ार में
चलेंगे वही रास्ता
जिस पर चलने की कीमत उन्होंने पाई।
आजादी के लिये जूझने का
हमेशा स्वांग करते रहेंगे,
विदेशी ख्यालों को लेकर
देश के बदलाव लाने के नारे गढ़ते रहेंगे
क्योंकि गुलाम मानसिकता से मुक्ति
कभी उन्होंने नहीं पाई।
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देश के पहरेदारों को
अपने ही घर में गोलियां लगने का
जश्न उन्होंने मनाया,
इस तरह गरीब के हाथों गरीब के कत्ल कों
पूंजीवाद के खिलाफ जंग बताया।
बिकती है कलम अब पूंजीपतियों के हाथ
बड़ी बेशर्मी से,
धार्मिक इंसान को धर्मांध लिखें,
तरक्की के रास्ते का पता लिखवाते अधर्मी से,
गरीबों और मज़दूरों के भले का नारा लगाते
पहुंचे प्रसिद्धि के शिखर पर ऐसे बुद्धिमान
जिन्होंने कभी पसीने की खुशब को समझ नहीं पाया,
भले ही दौलतमंदों के कौड़ियों में
उनकी कलम खरीदकर
समाज कल्याण के नारे लगाते हुए
अपनी तिजोरी का नाप बढ़ाया।
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