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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Saturday, July 5, 2008
कुछ गूगल के हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद टूल से भी पूछ लो-व्यंग्य
इसलिये उस टूल से अनुवाद के बाद उनको मैं पढ़ता हूं पर वह अनेक ऐसे शब्दों को नकार देता है जो दूसरी भाषाओं से लिये गये होते हैं या जबरन दो हिंदी शब्द मिलाकर एक कर लिखे जाते हैं। इसका अनुवाद सही नहीं है पर जितना है वह अंग्रेजी में पढ़ने योग्य हो ही जाता है। उसकी सबसे मांग शुद्ध हिंदी है। उस दिन चिट्ठा चर्चा में एक शब्द आया था जालोपलब्ध। मैंने इसका विरोध करते हुए सुझा दिया जाललब्ध। इस टूल पर प्रमाणीकरण के लिये गया पर उसने दोनों शब्दों को उठाकर फैंक दिया और मैं मासूमों की तरह उनको टूटे कांच की तरह देखता रहा। तब मैंने जाल पर उपलब्ध शब्द प्रयोग किया तब उसने सही शब्द दिया-जैसे शाबाशी दे रहा हो। मतलब वह इसके लिये तैयार नहीं है कि तीन शब्दों को मिलाकर उसक पास अनुवाद के लिये लाया जाये।
इधर बहुत सारे विवाद चल रहे हैं। कोई कहता है कि हिंदी में सरल शब्द ढूंढो और कोई कहता है कि हिंदी में उर्दू शब्दों का प्रयोग बेहिचक हो। कोई कहता हैं कि उर्दू शब्दों में नुक्ता हो। कोई कहता है कि जरूरत नहीं। इन बहसों में हमारे अंतर्जाल लेखक-जिनमें मैं स्वयं भी शामिल हूं-इस बात पर विचार नहीं करते कि कुछ गूगल के हिंदी अग्रेजी टूल से भी तो पूछें कि उसे यह सब स्वीकार है कि नहीं।
आप कहेंगे कि इससे हमें क्या लेना देना? भई, हिंदी में भी अंतर्जाल पर लिखकर हिट होने की बात तो अब भूल जाओ। भाई लोग, अब बाहर के लेखकों के लिये क्लर्क का काम भी करने लगे हैं। उनकी रचनायें यहां लिख कर ला रहे हैं और बताते हैं कि उन जैसा लिखो। अब इनमें कई लेखक ऐसे हैं जिनका नाम कोई नहीं जानता पर उनको ऐसे चेले चपाटे मिल गये हैं जो उनकी रचनाओें को अपने मौलिक लेखन क्षमता के अभाव में अपना नाम चलाने के लिये इस अंतर्जाल पर ला रहे हैं। सो ऐसे में एक ही चारा बचता है कि अंतर्जाल पर अंग्रेजी वाले भी हिंदी वालों को पढ़ने लगें और अगर वह प्रसिद्धि मिल जाये तो ही संभव है कि यहां भी हिट मिलने लगें।
मैं यह मजाक में नहीं कह रहा हूं। यह सच है कि भाषा की दीवारें ढह रहीं हैं और ऐसे में अपने लिखे के दम पर ही आगे जाने का मार्ग यही है कि हम इस तरह लिखें कि उसका अनुवाद बहुत अच्छी तरह हो सके। हालांकि मैंने प्रारंभ में कुछ पाठ वहां जाकर देखे पर फिर छोड़ दिया क्योंकि उस समय कुछ अधिक हिट आने लगे थे। अब फिर वेैसी कि वैसी ही हालत हो गयी है और अब सोच रहा हूं कि पुनः गूगल के हिंदी अंग्रजी टूल पर ही जाकर अपने पाठ देखेंे जायें वरना यहां तो पहले से ही अनजान लेखकों को यहां पढ़कर अपना माथा पीटना पड़ेगा। अखबार फिर उन लेखकों और उनको लिखने वाले ब्लाग लेखकों के नाम छापेंगे। अगर अपना नाम कहीं विदेश में चमक जायेगा तो यहां अपने आप हिट मिल जायेंगे। वैसे भी यहां हिंदी वाले अंग्रेजी की वेबसाईटें देखना चाहते है और उनके लिये हिंदी में पढ़ना एक तरह से समय खराब करना है ऐसे में हो सकता है कि जब यहां प्रचार हो जाये कि अंग्रेजी वाले भी हिंदी में लिखे पाठों को पढ़ रहे है तब हो सकता है कि उनमें रुचि जागे। यहां के लोग विदेशियों की प्रेरणा पर चलते हैं स्वयं का विवेक तो बहुत बाद में उपयोग करते हैं।
Tuesday, May 6, 2008
यौन शिक्षा चाहिए या ब्रह्मचर्य का ज्ञान-व्यंग्य
देश में कई लोग इस बहस में लिप्त हैं कि बच्चों को यौन शिक्षा दी जानी चाहिए कि नहीं। जब जलचर, नभचर और थलचर समस्त जीव यौन क्रीड़ा में पारंगत हैं तो फिर मनुष्य में क्या कोई कमी है या उसकी बुद्धि पर विद्वानों का भरोसा नहीं रहा है-इस प्रकार की बहस देखकर मेरे मन में यह विचार आता है।
एक बात स्पष्ट है कि इस देश में अपनी प्राचीनतम समृद्ध ज्ञान की विरासत को त्याग दिया इसलिये अब आधुनिक पीढ़ी के लिये पाश्चात्य सभ्यता के नये ज्ञान को अपनाने में समय लग रहा है। शायद इस देश को कामक्रीड़ा के कुछ नये तरीका सीखने की आवश्यकता है। कहते हैं कि नया मुल्ला प्याज अधिक खाता है। पाश्चात्य संस्कृति और विचारधारा के पोषक विद्वानों की पीढ़ी अभी नयी है इसलिये वह ऐसे अनोखे सुझाव देती है जिस पर केवल व्यंग्य ही लिखा जा सकता है। यहां मैंने पीढ़ी शब्द इसलिये इस्तेमाल किया क्योंकि कुछ मर खप गये और अब उनके शिष्य पाश्चात्य सभ्यता में अभी नये नये रंगे हैं। जिस तरह आदमी पर नयेपन का नशा चढ़ता है उसी तरह पीढि़यों पर भी चढ़ता है। यह विद्वानों की नयी पीढ़ी अपने देश के प्राचीनतम ज्ञान को पढ़े बिना ही उसे बेकार मान लेती है।
भारत में गरीबी का कारण बढ़ती जनसंख्या को माना जाता है। जनसंख्या वृद्धि का कारण यहां के मौसम का गर्म होना भी कहा जाता है। अर्थशास्त्र के अनुसार यहां ग्रीष्म जलवायु होने के कारण लोग अधिक परिश्रम नहीं कर पाते और करते हैं तो थक जाते हैं और फिर गरीबी के कारण उनके पास मनोरंजन के साधन न होने और उस पर शरीर की अधिक गर्मी से उनके पास कामक्रीड़ा करने के अलावा कोई साधन नहीं है। भारत के लोगों को यौन शिक्षा देने का मतलब है कि किसी ज्ञानी को सिखाना। अगर आप कहीं लड़कों के झुंड में यह चर्चा शुरू करें तो सभी अपना ज्ञान प्रदर्शित करेंगे।
हमारे ऋषि मुनियों ने यहां ब्रहम्चर्य के प्रचार किया। अब उसका कोई गलत अर्थ ले या न समझे तो उसमें उनका क्या दोष? ब्रहम्चर्य शब्द सुनते ही यहां के लोग-जिसमें कथित ज्ञानी संत भी शामिल हैं-मानने लगते हैं कि किसी पुरुष द्वारा किसी स्त्री को पूरे जीवन में हाथ न लगाना। हां, यह ब्रह्मचर्य का चरम शिखर है पर केवल यही नहीं है। ब्रह्मचर्य एक औषधि है जो आप अपने अनुसार उपयोग कर सकते हैं। ब्रह्मचर्य का अर्थ है कि आप अपने द्वारा तय अवधि में अपने अंदर काम के भाव को कतई स्थान न दें। यह स्वयं पर नियंत्रण करने के विधि है। अधिक गहराई से सुनना चाहें तो आपकी एक भी इंद्रिय इससे पीडित नहीं होना चाहिए तभी आप ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर सकते हैं। पर यह ब्रह्मचर्य का व्रत आखिर रखना क्यों चाहिए? ब्रहम्चर्य का अर्थ यह कदापि नहीं है कि विवाह न करें पर अपनी इंद्रिय पर नियंत्रण रखें ताकि जीवन में अभ्युदय के लिए आपकी देह में पर्याप्त शक्ति बनी रहे।
कामक्रीड़ा में मनुष्य की समस्त इंद्रिय पूरी शक्ति के साथ काम करतीं हैं उसमें शरीर से जो रस निकलता है वह अमृत की तरह होता है। उसका अधिक क्षय देह और मन को कमजोर करता है और उसमे आत्मविश्वास की कमी आती है। कामक्रीड़ा कोई हमारी देह से पृथक नहीं है बल्कि उसके अंग ही इसमें काम आते हैं। मुख से हम भोजन और जल ग्रहण करते हैं, आंखें से दृष्य देखते हैं और कानों से सुनते हैं, नाक से सूंघते हैं और हाथ से स्पर्श करते है। यह हमारी देह में आने के द्वार हैं और फिर उसमें जाने के र्भी द्वार है जिनसे अंदर आयी वस्तु कचड़े के रूप में निकलती है। कोई भोजन करने, दृश्य देखने, कानों से सुनने और शरीर से कचड़ा निकालने की बात नहीं करता? आखिर क्यों। शरीर मे बनने वाला यह वीर्य रस बहुत अनमोल है और इसको क्षय से बचाने के लिये ही ब्रह्मचर्य का नियम बनाया गया। एक ऐसी अवधि जिसमें मनुष्य अपने इस कीमती रस को क्षय रोके-यही ब्रह्मचर्य है। जिस वीर्य रस को केवल कामक्रीड़ा के लिये समझा जाता है वह हमारे शरीर में रहकर आत्मविश्वास भी बढ़ाता है और कम होने पर आदमी कायर भी हो जाता है। जिस तरह भोजन और जल ग्रहण करने से शरीर में रक्त और जल का निर्माण होता है उसी तरह वीर्य का भी निर्माण होता है। अगर इसके बारे में बच्चों को शुरू में बताया जाये कि उनके शरीर में मौजूद यह रस कितने काम का है तो वह इसका महत्व समझेंगे। जो लोग अधिक कामक्रीड़ा में लिप्त रहते हैं उनके अंदर साहस और आत्मविश्वास की कमी हो जाती है। खासतौर से नये युवक जिनको जीवन पथ पर अपनी पुरानी पीढ़ी से अधिक संघर्ष करना है उनके लिये इस वीर्यरस का बहुत महत्व है क्योंकि इसकी मौजूदगी आदमी में आत्मविश्वास और स्फूर्ति उत्पन्न करती है। हमारे समाज में बलात्कार बहुत बड़ा अपराध माना जाता है पर साथ ही यह भी बलात्कारी को कभी बहादुर नहीं माना जाता। अपना वीर्य निकलने के बाद पुरुष की इंद्रियां शिथिल हो जातीं हैं। जो युवावस्था में इसमें अधिक लिप्त होते हैं वह जीवन में विकास वैसा नहीं कर पाते जैसा कम लिप्त होने वाले कर पाते हे।
सच तो यह है कि समाज में जो यौन अपराध बढ़ रहे हैं उसका कारण यौन शिक्षा की कमी नहीं बल्कि माता पिता द्वारा अपने लड़कों की शादी में अधिक दहेज लेने की इच्छा से उनके विवाह में देरी करना है। उनको यौन शिक्षा देने की बजाय आधे बूढ़े हो चुके उन युवकों के माता पिता से यह पूछना चाहिए कि ‘तुम्हारा लड़का अपना वीर्य रस का इस्तेमाल कैसे करता है’। यह भी वास्वविकता है कि अगर ब्रह्मचर्य का भाव नहीं है तो युवकों की देह में इस रस की अधिकता उन्हें कुमार्ग पर जाने के लिये बाध्य करती है-अब आप वह कुमार्ग मत पूछ लेना, बहुत से हैं-और जब आप उनके माता पिता से यह सवाल करेेंगे तो वह शर्मिंदा होंगे पर यह इस समाज का सच है। मैंने वीर्य रस शब्द का उपयोग कर कोई गलत नहीं किया क्योंकि हमारे धर्मग्रंथों में इसका उल्लेख है यह अलग बात है कि लोग इस शब्द का उपयोग बातचीत में करने में सकुचाते हैं। इसके बावजूद यह वास्तविकता है कि यह वीर्यरस पुरुष के अंदर मौजूद रहते हुए उसे आत्मविश्वासी और बुद्धिमान बनाता है। इसकी कमी से व्यक्ति युवावस्था में भी मानसिक रूप से वृद्धावस्था को प्राप्त हो जाते है। अभी इस विषय पर बहुत कुछ लिखना है। शेष किसी अगले अंक में
Friday, April 25, 2008
स्वयंभू होने का सुख-हास्य व्यंग्य
हमारे मित्र ने कहा-‘‘हां, कभी होते थे पर अब नहीं रहे, पर क्षेत्रवाद के आधार पर तो विभाजन है ही। हालांकि गौत्र के आधार तो हमें भी पता नहीं है।
मुझे अपने एक ऐसे मित्र की याद आयी जो लेखक भी और उससे मेरी पटरी नहीं बैठती। कई बार तो उससे वाद-विवाद काफी तीखा भी हो चुका है। वह कहीं मुलाकात होने पर उल्टी बात शुरू करता और मेरे लिखे पर विवाद करता है। हालांकि जिस मित्र की बात कर रहा हूं वह भी उससे इसी बात से नाराज रहते हैं कि वह हमारे लिखे पर बेकार की कमेंट करता रहता है। बहरहाल हमने अपने उस मित्र से कहा-‘‘हां, मुझे लगता है कि उस बड़बोले का गौत्र तुमसे अलग ही होगा। यार, उससे मेरी कभी नहीं बनती और तुमसे बन जाती है।’8
मेरे मित्र ने मुझसे कहा-‘‘यार, उससे तुम्हारी नहीं बनती यह तो हमें मालुम है पर यह गौत्र वाली बात उससे मत जोड़ो क्योंकि तुम दोनो हो लेखक और मेरे ख्याल से तुम लोगों की वही जाति और गौत्र होता है। कहीं तुम्हारी याद आती है तो हमारे दिमाग में यही बात रहती है कि तुम लेखक हो। तुम तो हिंदी के लेखक हो और कोई अगर तुम में जाति ढूंढेगा तो बेवकूफ ही कहलायेगा। तुम्हारा झगड़ा हिंदी के परंपरांगत लेखकों से कम थोडे+ ही है और हमें उसका लिखा पसंद नहीं है पर है तो वह भी लेखक। वैसे भी तुम लोग अपने लिखे में किसी को बख्शते हो जो हम तुम्हें किसी जाति विशेष से जोड़कर देखें’’
उसकी बात पर सब मित्र सहमत हो गये और मुझे हंसी आयी क्योंकि उसके कहने से मुझे अहसास हुआ कि वह सही कर रहा था-सबसे अच्छा लगा कहने का उसका सहज भाव। वहां एक मौजूद अन्य मित्र बोला-‘‘तभी तो जब हमारे सामने तुम लोगों की बहस होती है तो हम बिल्कुल नहीं बोलते क्योंकि लगता है कि दो लेखकों की लड़ाई में पड़कर अपनी अज्ञानता न दिखा बैठें।’
बहरहाल हम दोनों को स्वयंभू लेखक के रूप में मित्र लोगांे में पहचाना जाता है और मेरे ब्लाग पढ़ने वाले मित्र तो मुझे स्वयंभू लेखक और संपादक भी कहने लगे हैं। पहले मैं खूब सुनता था कि अमुक तो स्वयंभू अध्यक्ष है या सचिव है या संपादक है और जब अपने लिये ऐसी उपमाएं सुनता हूं तो हंसी आती है। स्वयंभू का मतलब है कि आप स्वयं घोषित कर देते हैं पर अन्य कोई नहीं मानता। अगर कोई दूसरा बनाये तो आप घोषित हो जाते हैं नहीं तो स्वयंभू कहलाते हैं। हम पुराने संपादक रह चुके हैं पर अब नहीं हैं और ब्लोग पर लिख छोड़ा है तो वह किसी सेठ का नहीं है जो हमें कोई मान लेगा।
इसके बावजूद स्वयंभू होने में सुख तो लगता है। यह अब महसूस होने लगा है। कल मेरा एक ब्लाग बीस हजार की व्यूज संख्या को पार करने वाला है। आज मुझे एक मित्र ने याद दिलाया और कहने लगा कि-‘‘दस हजार का संदेश तो हम नहीं पढ़ पाये थे पर वह तुम्हारा ब्लोग 19900 पार कर चुका है और कोई जोरदार संदेश लिखना।‘‘
हमने पूछा-‘‘क्या जरूरी है? तुंम ही तो कहते हो कि ब्लागरों के लिये कम लिखो। आम पाठकों के लिये व्यंग्य और कहानी लिखो। फिर क्या जरूरी है कि हम लिखें।’’
वह बोला-‘‘नहीं, मेरा मतलब है कि तुम पाठकों के लिये ही लिखो। यार हम देखना चाहते हैं कि तुंम स्वयंभू संपादक के रूप में कैसे लिखते हो? अगर जोरदार रहा तो हम तुम्हें संपादक के रूप में मान्यता दे देेंगे। तुम ही खुद ही कहते हो कि स्वयंभू उसको कहा जाता है जिसे किसी और की मान्यता नहीं होती। जब मान्यता दे देंगे तो फिर तुम्हारे स्वयंभू होने का प्रश्न नहीं उठता। हां, लेखक तुम हो क्योंकि तुंम्हारा लिखा हमें पसंद है।’
सच बात तो यह है कि हमारे पास इतने ब्लाग हो गये हैं कि और व्यस्तता बढ़ गयी है पर हमारे मित्र वर्डप्रेस के ब्लागों पर व्यूज अवश्य देखते हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि हमारे मित्रों ने यह तक अनुमान लगा लिया कि वह एक दो दिन में इस सीमा को पार कर लेगा।
हमने मित्र के कहने पर घर आते ही पाठकों के लिये बीसहजारीय संदेश लिखने का प्रयास किया पर कई कागज फाड़ चुके हैं। कुछ समझ में नही आ रहा कि क्या लिखें? कहीं ऐसा न हो कि मित्रों से संपादक के रूप में मिली मान्यता खतरे मेंे पड़ जाये। काफी माथामच्ची करने के बाद हमने आज लिखने का विचार छोड़ दिया क्योंकि एक तो वह ब्लाग आज उस संख्या को छू नहीं रहा दूसरा हमने सोचा कि जितना सुख स्वयंभू में उतना मान्यता मिलने में नहीं है। स्वयंभू होने पर लोग छींटाकशी कम ही करते हैं क्योंकि उनके दिमाग में वास्तविक छवि वह नहीं होती जो हम बताते हैं। अभी यह कोई नहीं कहता कि‘यार कैसे संपादक हो’, कहीं मान्यता मिल गयी तो फिर ‘यार कैसे लेखक हो’ कि जगह जुमला संपादक वाला हो जायेगा। स्वयंभू का सुख उठा लें यही बहुत है इसलिये सोचा कि जब ब्लाग बीसहजारीय संख्या को पार करेगा तो स्वयंभू लेखक और संपादक की तरह ही लिखेंगे क्योंकि हमें लगता है कि हम तभी लिख पाते हैं जब अपने को स्वयंभू समझते हैं और बचपन से शायद इसलिये यह लिखने का रोग लग गया।
Thursday, March 6, 2008
विदुर नीति: संयम के अलावा शांति का कोई रास्ता नहीं
- विद्या, तप, इन्द्रियों पर संयम और लोभ के त्याग के अलावा मनुष्य के पास शांति का कोई मार्ग नहीं है ।
- बुद्धि से मनुष्य अपने भय को दूर करता है, तपस्या से श्रेष्ठता और उच्च स्थान प्राप्त करता है। गुरु की ह्रदय से सेवा और नित्य योग साधना करते हुए तन और मन में शांति पाता है।
- जिसे मोक्ष की इच्छा होती है वह मनुष्य पुण्य का भी आश्रय भीं नहीं लेते। वह वेद पढ़कर भी उसके पुण्य का आश्रय नहीं लेते और निष्काम और निर्लिप्त भाव से इस लोक में विचरण करते हुए सारे काम कर आनंद लेते हुए मोक्ष प्राप्त करते हैं ।
- जो परस्पर भेदभाव करते हैं वे कभी धर्म का आचरण नहीं करते। सुख भी नहीं पाते। उन्हें कभी इस संसार में गौरव प्राप्त नहीं होता और कभी शांत नहीं रह पाते।
- जैसे गाय में दूध, विद्वान में तप और युवा स्त्रियं में चंचलता का भाव होना स्वाभाविक है , वैसे ही अपनी जाति के लोगों से भय होना स्वाभाविक है।
Sunday, March 2, 2008
फटे हुए मामले पर कुछ नहीं लिखा-हास्य व्यंग्य
उसके बाद हम कुर्सी पर आलथी-पालथी मारकर टाईप करने लगे। तो चेला बोला-''बढिया, गुरूजी। वाह मजा आ गया।''
हमने चौंक कर कहा-''क्या बात हैं अभी तो हमने तुम्हें ब्लोग लिखना और कमेन्ट देना सिखाया ही नहीं और तू देखते-देखते सीख गया। देख हमारे पास पढ़ने का तुझे कितना फायदा हो गया। अब तू अपने घर से डबल फीस ले आया कर। यह ब्लोग का विषय मुफ्त में नहीं सीखने दूंगा।''
चेला बोला-''गुरूजी, में ब्लोग की बात नही कर रहा हूँ। आप जिस तरह करवटें बदलकर लिख रहे हैं ऐसे अंग्रेज लेखक करते हैं। मेरे पापा बता रहे थे एक अंग्रेज लेखक ३२ प्रकार की कुर्सियों पर ६४ प्रकार की बैठक आकर लिखते थे। अब आप भी भी जिस तरह करवट बदलकर लिख रहे हैं उससे तो लगता है आप भी देश के नंबर वन हिन्दी ब्लोगर बन जायेंगे। ''
हमें गुस्सा आ गया-''तो तू हमारे जले पर नमक छिड़क रहा है जरूर गुरु माता ने तुझे हमारी फजीहत के बारे में बता दिया है। सुन पहली बात तो यह है कि वह लोग हमारे हलके ब्लोग को उड़ाकर ले गए और पांच रेटिंग रख दी। भारी ब्लोग तो वह लोग उठा ही नहीं पाए। उसके बाद जो हमने हास्य कवितायेँ बरसाईं वह भी बेमिसाल थीं और जमकर हिट हुईं थीं। तेरी गुरु माता तो बस हमारा मजाक बनातीं हैं। दूसरा यह अंग्रेज लेखकों की बात तो मेरे सामने किया ही मत कर। हम भारत के लोग जमीन पर जमीन के और देखते हुए लिखते हैं और इसलिए आज भी हमारा पुराना लिखा दुनिया में सम्मान पाता है। तीसरा यह है कि हम फटे हुए मामले पर लिख रहे हैं और इसलिए सुखासन में बैठकर लिख रहे हैं ताकि कहीं 'फटे में टांग न फंस जाये'।
चेला पहले तो देखने लगा फिर आश्चर्य चकित होते हुए बोला-''इस तरह फटे मामले पर लिखेंगे तो टांग नहीं फंसेगी?''
हमने कहा-''कैसे फंसेगी? कम अक्ल कहीं के! देख नहीं रहा आलथी-पालथी मारकर लिख रहे हैं।''
फिर बोला-''गुरु जी, पर मामला फटा कैसे है?''
हमने कहा-''हमें खुद नहीं मालुम? बस फटा हुआ है। लोग एक दूसरे पर बरस रहे हैं। उनको मिल रहे हैं जोरदार हिट बाकी तरस रहे हैं। ऐसा लगता है कि फटा हुआ मामला ही पढा जा रहा है। लोगों को फुरसत ही नहीं है कुछ और पढ़ने से।''
चेले ने पूछा-''गुरु जी, फिर आप क्यों झमेले में पढ़ रहे हैं। वैसे वह लोग लिख क्या रहे हैं।''
हमने कहा-''यही समझ में नहीं आ रहा है। हमने कल खूब प्रयास किया पर समझ में नहीं आया। कंप्यूटर के सामने उल्लुओं की तरह बैठे रहे।''
चेले ने पूछा-''फिर आप क्या लिख रहे हैं?''
हमने कहाँ-''हम भी लिख रहे हैं पर क्या हमको नहीं मालुम। अगर कुछ पढ़कर समझ में आता समझने वाली बात लिखते। अब हम भी लिख रहे हैं और किसी के समझ में आएगा इसमें हमें भी शक है। बात समझ में आये तो समझ वाली बात लिखें।''
उधर से गुरु माता की आवाज सुनकर किचन में चाय लेने चला गया। वहाँ उसकी गुरुमाता ने पूछा--''तेरे गुरूजी तुझे पढा रहे हैं कि कंप्यूटर से चिपके हुए हैं।''
चेले ने कहा--''गुरु जी फटे मामले पर कुछ आलथी-पालथी मारकर लिख रहे हैं।''
गुरुमाता ने पूछा-''क्यों? आलथी-पालथी मारकर क्यों?
चेले ने कहा-''इसलिए के फटे में टांग न फस जाये।''
गुरुमाता वहीं से जोर से चिल्लाकर बोली-''गुरु जी से कहो, दूसरों के मामले में टांग मत फंसाओ।
चेला चाय के दो कप लेकर आया और बोला-''गुरु जी, आखिर आप लिख क्या ले रहे हो। मुझसे गुरुमाता ने कहा है कि पूछ कर आओ।''
हमने कहा-'' बोल दे। कुछ नहीं लिख रहे। तुझे वहाँ सब कहने की क्या जरूरत थी? जाकर कह दे गुरूजी फटे मामले पर कुछ नहीं लिख रहे हैं।''
Monday, February 25, 2008
संत कबीर वाणी:गुरु करें जानकर, पानी पिएँ छानकर
बिना विचारै गुरु करे, परे चौरासी खानि
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की पानी को सदैव छान कर पीना चाहिऐ तथा गुरू को अच्छी तरह जान कर ही अपना गुरु बनाना चाहिऐ . छान कर पानी पीने से शरीर को व्याधियां नहीं होती और गुरु से सदगति प्राप्त होती है. अगर किसी अयोग्य को गुरु बना लिया तो फिर चौरासी के चक्कर में पड़ना पडेगा।
गुरु गुरु में भेद है, गुरु गुरु में भाव
सोईं गुरु नित वंदिए, शब्द बतावे दाव
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु शब्द एक ही पर फिर भी गुरु कहलाने वाले लोगो के कर्मों के आधार पर उनमें अंतर होता है. ऐसे व्यक्ति को बुरु बनाना चाहिऐ जो शब्द के दाव बताने की अलावा उसके गूढ़ और भावनात्मक अर्थ बताता है।
Sunday, February 24, 2008
संत कबीर वाणी- हरि रस जैसा कोई रसायन नहीं
तिल इक घटमैं संचरे, तौ सब तन कंचन होई
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी रसायनों का सेवन कर लिया मैंने मगर हरि-रस जैसी कोई और रसायन नहीं पाई। एक तिल भी घट में शरीर में यह पहुंच जाए तो वह सारा ही कंचन में बदल जाता है।
'कबीर' भाठी कलाल की, बहुतक बैठे आई
सिर सौंपे सोई पिये, नहीं तौ पीया न जाई
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कलाल की भट्ठी पर बहुत सारे आकर बैठ गए हैं, पर इस मदिरा को कोई एक ही पी सकेगा, जो अपना सिर कलाल को प्रसन्नता के साथ सौंप देगा।
Saturday, February 23, 2008
संत कबीर वाणी:सोने का मदिरा से भरा पात्र भी निंदनीय
ऊंचे कुल की जनमिया करनी ऊँच न होय
कनक कलश मद सों, भरा साधू निंदा सोय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि केवल ऊंचे कुल में जन्म लेने से किसी के आचरण ऊंचे नहीं हो जाते। सोने का घडा यदि मदिरा से भरा है तो साधू पुरुषों द्वारा उसकी निंदा की जाती है।
कोयला भी हो ऊजला जरि बरि ह्नै जो सेव
कनक कलश मन सों, भरा साधू निंदा होय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं भली भांति आग में जलाकर कोयला भी सफ़ेद हो जाता है पर निबुद्धि मनुष्य कभी नहीं सुधर सकता जैसे ऊसर के खेत में बीज नहीं होते।
Friday, January 4, 2008
भारतीय खिलाडियों ने आस्ट्रेलिया की शिकायत क्यों नहीं की?
एंड्रू साईमंस ने कई बार भारतीय खिलाडियों से बदतमीजी की है और वह उसे झेल जाते हैं। असल में उन्हें अपने अपमान से अधिक अपने पैसे कमाने की पडी रहती हैं। अक्सर भारत और पाकिस्तान के खिलाड़ी विदेशी खिलाडियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से शिकायत तो करते हैं पर आधिकारिक रूप से शिकायत करने की बात आती है तो सब नाक भौं सिकोड़ लेते हैं-''क्रिकेट तो सभ्य लोगों का खेल है और इसमें यह सब चलता है।''
यही कारण है की इस दोनों देशों के खिलाडी ही प्रतिबंधों का शिकार होते हैं और कहते हैं कि इंग्लेंड और आस्ट्रेलिया के खिलाडियों के खिलाफ कार्यवाही नहीं होती। सच तो यह बात है कि आज तक इन देशों के खिलाडियों के खिलाफ कभी शिकायत नहीं हुई। अगर अंपायर स्टीव बकनर इन देशों के पक्ष में गलती करता है तो शिकार होने वाले एशियाई देश कभी उसके खिलाफ शिकायत नहीं करते। अगर वह ऐसी गलतियां इन देशों के खिलाफ करता तो अभी तक उसे रास्ता नापना पड़ता। बाहर आकर प्रेस में शिकायत करने से कोई मतलब नहीं है जब तक कोई आधिकारिक शिकायत नहीं की जाती।
अब इससे तो यही स्पष्ट होता है की एशियाई देशों के खिलाड़ी अपने तथाकथित अपमान को कुछ न गिनते हुए केवल उसे अपने प्रचार के लिए इस्तेमाल करते हैं या इसमें सभी देशों के खिलाड़ी इसलिए शामिल हैं ताकि लोगों का खेल से इतर ध्यान लगाकर मनोरंजन कराया जाये, और एशिया के देश भी सोचते हैं की चलो अपने किसी खिलाड़ी को प्रतिबन्ध का सामना करना पडा तो उसकी जगह नया खिलाड़ी शामिल कर लें वैसे तो बाजार के दबाव में उनको शामिल नहीं कर पाते। इससे तो एक चीज और जाहिर होती है की क्रिकेट खेलने की जरूरत भारत को अधिक है क्योंकि यहाँ के बाजार को उससे बने बनाए माडल मिल जाते हैं और आस्ट्रेलिया वाले तो बिचारे इसका बोझ ढो रहे हैं। उनको कोई फायदा नहीं है अगर उनकी शिकायत कर अगर किसी खिलाडी को प्रतिबन्ध के दायरे में लाया गया तो हो सकता है कि वह क्रिकेट खेला छोड़ दें और तब तो क्रिकेट का भत्ता बैठ जायेगा ऐसे में हानि तो भारत में इस खेल से आर्थिक लाभ उठाने वालों को ही होगी। क्या इसलिए ही भारतीय खिलाड़ी अपने आत्मसम्मान को अनदेखा कर देते हैं। अगर नहीं तो आज तक आस्ट्रेलिया के खिलाडियों के खिलाफ शिकायत क्यों नहीं की?
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रंक का नाम जापते भी राजा बन जाते-दीपक बापू कहिन (Rank ka naam jaapte bhi raja ban jate-DeepakBapuKahin) - *रंक का नाम जापते भी राजा बन जाते, भलाई के दावे से ही मजे बन आते।* *‘दीपकबापू’ जाने राम करें सबका भला, ठगों के महल भी मुफ्त में तन जाते।।* *-----* *रुपये से...7 years ago
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पश्चिमी दबाव में धर्म और नाम बदलने वाले धर्मनिरपेक्षता का नाटक करते रहेंगे-हिन्दी लेख (Convrted Hindu Now will Drama As Secularism Presure of West society-Hindi Article on Conversion of Religion) - हम पुराने भक्त हैं। चिंत्तक भी हैं। भक्तों का राजनीतिक तथा कथित सामाजिक संगठन के लोगों से संपर्क रहा है। यह अलग बात है ...8 years ago