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Saturday, March 24, 2012

अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का तृतीय चरण-हिन्दी लेख (anna hazare's anti corruption movement part -3-hindi lekh or article

            अन्ना हजारे साहब फिर भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने आंदोलन की तीसरा चरण शुरु करने वाले हैं। वह एक दिन के लिये अनशन पर बैठेंगे और इस बार भ्रष्टाचार के विरुद्ध शहीद होने वाले लोगों के परिवार जन भी उनके साथ होंगे। ऐसे में देश के लोगों की हार्दिक संवेदनाऐं उनके साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ेंगी जिसकी इस समय धीमे पड़ रहे इस आंदोलन को सबसे अधिक आवश्यकता है । अन्ना हजारे के समर्थकों ने इस बार भ्रष्टाचार के विरुद्ध शिकायत करने वालों को संरक्षण देने के लिये भी कानून बनाने की मांग का मामला उठाया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि विषयवस्तु की दृष्टि से उनके विचारों में कोई दोष नहीं है। वैसे भी उन्होंने जब जब जो मुद्दे उठाये हैं उनको चुनौती देना अपनी निष्पक्ष विचार दृष्टि तथा विवेक का अभाव प्रदर्शित करना ही होगा।
          मूल बात यह है कि अन्ना हज़ारे के आंदोलन की गति कभी मंथर, कभी मध्यम तो कभी तीव्र होने की स्थिति आम निष्पक्ष तथा स्वतंत्र विश्लेषकों के लिये विचार का विषय बनती रही है। अन्ना हजारे और उनके समर्थक कहीं न कहीं से प्रायोजित हैं यह आरोप तो बहुत पहले से ही उसके विरोधी लगाते हैं पर मौलिक तथा असंगठित क्षेत्र के आम लेखक भी यह प्रश्न उठाते हैं कि आखिर उनकी गतिविधियों के लिये धन कहां से आ रहा है? अन्ना बड़ी आयु के हैं और उनका स्वास्थ्य खराब रहना स्वाभाविक है पर उनके इलाज का समय और स्थान अनेक तरह के प्रश्नों को जन्म देते हैं। जब प्रायोजन की बात भी जब सामने हो तब आंदोलन की गति तथा गतिविधियों दोनों की अनेक प्रश्नों को जन्म देती हैं। हमारे लेखों पर अनेक लोगों ने आपत्तियां की हैं। हम जब यह लिखते हैं कि यह आंदोलन भी बाज़ार के सौदागरों के धन तथा प्रचार समूहों के प्रबंधकों के सहारे चल रहा है जो जनता के असंतोष को भटकाने के लिये चलाया जा रहा है क्योंकि वह कभी लक्ष्य के पास जाता नहीं दिखता तो अनेक पाठक प्रतिकूल टिप्पणियां लिखते हैं। हमने पहले भी लिखा था कि पांच राज्यों के चुनाव के कारण प्रचार माध्यमों के पास विज्ञापन के लिये प्रस्तुत करने के लिये इन चुनावों के समय ढेर सारी सामग्री मिल रही थी। ऐसे में अन्ना हजारे के आंदोलन पर समाचार और चर्चा के लिये उनके पास समय नहीं था। इसलिये यह आंदोलन ठंडे बस्ते में चला गया या डाल दिया गया वह अलग से विचार का विषय है।
           अब स्कूलों में छुट्टियां होती जा रही हैं। गर्मी का समय है। क्रिकेट का भी कोई बड़ा कार्यक्रम नहीं दिखाई दे रहा है। ऐसे में इस आंदोलन को रंगा जा रहा है। निश्चित रूप से टीवी चैनलों पर भीड़ बनाये रखने में यह सहायक होगा।
          हम जैसे आम लेखकों पास न तो साधन होता है न समय कि कहीं से खबरें निकालें न ही यह सामर्थ्य होता है कि बड़े लोगों से गोपनीय चर्चा कर यहां कोई संकेत दें। पर कहते हैं न कि भगवान एक मार्ग बंद रखता है तो दूसरा खोल देता है। हमें उसने दैहिक तथा भौतिक रूप से इतना सामर्थ्यवान नहीं बनाया कि हम बड़े बड़े लोगों में उठ बैठकर बड़े मंचों पर चर्चा कर सकें पर उसने बौद्धिक रूप से चिंत्तन क्षमता को इतना सक्रिय कर दिया है कि सामने से आ रही खबरों के आगे पीछे अपनी दृष्टि रखकर उनके निष्कर्ष निकाल ही लेते हैं। हमारे अनुमान बाद में सही निकलते हैं इसलिये यह आत्मविश्वास ब्लॉगों पर लिखते हुए तो हो गया है कि अपनी बात लिखते हुए अब डर नहीं लगता। हमने बहुत पहले लिखा था कि यह यह आंदोलन प्रायोजित है, उस समय अनेक लोगों ने इस पर नाराजगी जताई पर हम देख रहे हैं बाद में अनेक इंटरनेट लेखक इसे स्वीकारने लगे। बहरहाल हमारे विचार और प्रयासों का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर कोई निर्णायक प्रभाव नहीं पड़ता यह बात दिल को तसल्ली देती है । देश में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन सफल हो यह तो हम भी कहते हैं इसलिये आंदोंलन की सक्रियता के लिये हम बाधक नहीं कहलाते वहीं अपनी बात भी कह जाते हैं। अलबत्ता हमें इसके परिणामों में बहुत दिलचस्पी है। देखें आगे क्या होता है?
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Wednesday, February 15, 2012

इंसानियत के तीमारदार-हिन्दी कविता (insaniyat ke teemardar-hindi kavita or poem)

बहादुरी के दावेदार
जंग के लिये हमेशा तैयार हैं,
बमों के जखीरों पर बैठकर
जहान को दिखा रहे हैं आंखें
दावा यह कि अमन के यार हैं।
कहें दीपक बापू
जब भी खेली जायेगी बारूद की होली
आम इंसानों का खून बहेगा,
सौदागरों के भौंपू सुनायेंगे
खूनखराबे के हाल
आम इंसान का दर्द कौन कहेगा,
बंदूक बना देती है
भले इंसान को भी हैवान,
खंजर जिसकी कमर में बंधा है
बन जाता है शैतान,
कोई खुशी से माने या भय से
उनका यह दावा कि
उनके काले कारनामों में भी
होता इंसानियत का दीदार है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Wednesday, September 21, 2011

32 रुपये और गरीबी-हिन्दी कविता (32 rupess and powerty or 32 rupaye aur garibi-hindi kavita or poem)

खबर यह थी कि
बत्तीस रुपये खर्च करने वाले लोग
गरीब नहीं माने जायेंगे,
किसी तरह की मदद नहीं पायेंगे।
तब तय किया भिखारियों की यूनियन ने
अब दानदाताओं से पांच दस रुपया मांगने की बजाय
पांच सौ और हजार रुपयें का नोट
मांगने के लिये हाथ बढ़ायेंगे,
खाना तो मिल जाता है कहीं भी
मगर दवा दारु के लिये
अब हमारा जिम्मा हमारे ही कटोरे पर है
उनको समझायेंगे।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Thursday, August 4, 2011

आज की कहानियों के दर्पण में समाज का प्रतिबिंब-हिन्दी लेख (today hindi story on TV chianal'episod and society)

          हिंदी में जो भी टीवी चैनल हम देखते हैं उसमे प्रसारित हास्य हो या सामाजिक पृष्ठभूमि वाला धारावाहिक, उनकी कहानियों का आधार बड़े शहरों की बहुमंजलीय इमारतों में रहने वाले लोगों की दिनचर्या ही होती है। कहा जाता है की साहित्य समाज का दर्पण है और इन कहानियों को यदि साहित्य माना जाये तो फिर कहना पड़ेगा कि पूरा भारत एक सभ्य और सम्पन्न देश है। छोटे शहरों, गांवों और गली, मुहल्लों और छोटे बाजारों का अस्तित्व ही मिट चुका है। इसका आभास बहुत कम बुद्धिजीवियों को होगा कि वह बड़े शहरों से बाहर जिस समुदाय को केवल प्रयोक्ता या उपभोक्ता समझकर चल रहा है, वह छोटे शहरों और गांवों में रहता है वह मानसिक रूप से धीरे धीरे इस बात को समझता है कि देश के बड़े शहरों में रहने वाले बुद्धिजीवी, रचनाकार, साहित्यकार, चित्रकार और फिल्मकार उसके साथ विदेशी जैसा व्यवहार कर रहे हैं। देखा तो यह भी जा रहा है कि हमारे देश के प्रसिद्ध बौद्धिक पुरुष किसी न किसी विदेशी समाज की सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा आर्थिक विचारधारा से प्रभावित होकर अपना काम करते हैं। छोटे शहरों में रहने वाले लेखक, कवि, रचनाकार तथा कलाकार भी इस बात को मानते हैं कि बड़े शहरों का न होने के कारण उनको कभी राष्ट्रीय परिदृश्य पर नहीं आ सकते। इस तरह हम देश में एक वैचारिक विभाजन देख सकते हैं।
            देश का शक्तिशाली बौद्धिक तबका अभी इस बात कि परवाह नहीं कर रहा है क्योंकि उसको लगता है कि देश में किसी भी प्रायोजित मुद्दे पर अपनी मुखर आवाज के दम पर चाहे जब लोगों को अपनी लय पर चला सकता है क्योंकि प्रचार माध्यम तो आखिर बड़े शहरों में ही चल रहे हैं और वहाँ केवल उसकी आवाज ही गूँजती है। सच कहें तो ऐसा लगता है कि देश केवल महानगर और राजधानियाँ रह गई हैं और छोटे श्हर उनके शासित प्रजा जहां के लोगों का अस्तित्व बेजुबानों से अधिक नहीं है।
                      कालांतर में इसके भयावह परिणाम होंगे। अभी तक देश का कथित बौद्धिक समुदाय सभी देश प्रेम तो कभी हादसों के समय समस्त लोगों को आंदोलित कर लेता है पर जैसे जैसे अधिक से अधिक लोगों में अपने छोटे शहर या गाँव की उपेक्षा का भाव होने की अनुभूति बढ़ती जाएगी वह उनके उठाया मुद्दों से विरक्ति दिखन लगेगा।
             टीवी चैनलों की कहानियों और कथानक साहित्य नहीं होते यह हम विशाल भारत की स्थिति को देखें तो साफ दिखाई देता है। विदेशी प्रष्ठभूमि की कहानी को देशी पात्रों के मिश्रण से तैयार करना वैसे भी साहित्य नहीं होता। व्यावसायिक रूप से यह इसलिए लाभप्रद दिखता है क्योंकि जिस हालत में रहता है उसे विपरीत कहानी देखना और सुनना चाहता है। भारत में छोटे शहरों में रहने वाले लोग बहुमंजलीय इमारतों में रहने वाले पात्रों को इसलिए देखते हैं क्योंकि उनके घर वैसे नहीं हैं और न वैसा माहोल मिलता है। कालांतर में वह इससे उसक्ता जाएगा और तब चित्तन और मनन का जब दौर चलगा तब उसका सोच अपनी उपेक्षा की तरफ जाएगा। तब देश के कथित बौद्धिक समुदाय के मुद्दों पर ऐसी प्रतिक्रिया नहीं देगा जैसी वह अपेक्षा करेगा।

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, June 18, 2011

साढ़े चार साल में दो लाख पाठक/पाठ पठन संख्या जुटा सका दीपक बापू कहिन ब्लाग-हिन्दी संपादकीय(hindi editorial on Deepak Bapu kahin)

            कल दीपक बापू कहिन ब्लाग ने दो लाख की पाठ पठन/पाठक संख्या पार कर ली। इसमें उसे चार साल का समय लगा जबकि इससे बाद के बने ब्लाग ‘हिन्दी पत्रिका’ तथा ‘ईपत्रिका’ ने ढाई लाख की सीमा तक पदार्पण कर लिया है। अभी भी यह कहना कठिन है कि हिन्दी ब्लाग जगत अपनी कोई उपस्थिति समाज की प्रक्रिया में दर्ज करा पा रहा है।
दीपक बापू कहिन के दो लाख पाठ पठन/पाठक संख्या पार करने पर प्रसन्नता व्यक्त करने से अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह जिंदगी के अनुभव सिखाने और समझाने वह ब्लाग है जिस पर लिखा जाता है पढ़ने के लिये, पर यह पढ़कर कई चीजें दिखाने वाला साबित हुआ है। यह इस लेखक का सबसे पहला ब्लाग है। ब्लाग बन गया यह भी पता नहीं लगा। यह ब्लाग है इसका पता दूसरा ब्लाग बनाने पर लगा।
       बहरहाल अपने साढ़े चार वर्ष की ब्लाग यात्रा से इस लेखक को बहुत कुछ ऐसी बातें प्रत्यक्ष रूप से अब समझ में आयीं जिनका पहले अनुमान भर  था। यह महत्वपूर्ण बात नहीं है कि हमारे ब्लागों को कितने लोगों ने पढ़ा बल्कि इन ब्लागों ने भारतीय समाज की सच्चाईयों कों गहराई से समझने का अवसर मिला यह तथ्य अत्यंत रोचक है। इसका आभास ब्लागों पर लिखे बिना नहीं हो सकता था क्योंकि बाज़ार, प्रचार तथा समाज के शिखर पुरुषों के लक्ष्य और उनकी पूर्ति में लगे प्रबंधकों ने अभिव्यक्ति के संगठिन साधनों पर इस कदर नियंत्रण कर रखा है उनकी योजनाबद्ध विचारधारा के प्रवाह को कोई समझ ही नहीं सकता। न लेखक न पाठक, न रचनाकार न दर्शक! लेखक रचनाकार प्रायोजित होकर वही लिख और रच रहे हैं जैसे उनके प्रायोजक चाहते हैं तो पाठक और दर्शक उसे स्वतंत्र वह मौलिक कृति समझ लेते हैं। एक सच यह कि प्रायोजित लेखन और रचना में अभिव्यक्ति अपना प्रभाव नहीं दिखाती क्योंकि वह चिंत्तन रहित होती है। दूसरा सच यह कि लेखन और रचनाकारी का प्रभाव अंततः समाज पर पड़ता है चाहे कोई इसे माने या नहीं। अगर हम आज अपने समाज को उथला, अंगभीर, चेतना विहीन, कायर तथा सामयिक विषयों से उदासीन पाते हैं तो इसका कारण यही है कि हमारे अखबार, टीवी, फिल्में और अन्य कलायें समाज के ऐसे ही स्वरूप का निर्माण कर रही हैं जिसमें आम इंसान के समक्ष प्रश्न छोड़ जाते हैं पर उत्तर नहीं होता। संवेदनाओं को उभारकर निराशा के अंधेरे में धकेला जाता है। साफ बात है कि प्रायोजक नहीं चाहते कि समाज स्वतंत्र रूप से मौलिक चिंतन वाला हो क्योंकि इससे वह अपने प्रश्नों का उत्तर ढूंढेगा। निराशा से आगे आकर आशाओं के लिये युद्ध करेगा जो कि उनके व्यापार के लिये खतरनाक है। जड़ समाज शिखर पुरुषों की सत्ता को स्थिर बनाये रखने में सहायक है कालांतर में वह राष्ट्र के लिये चिंत्तन के नाम पर केवल स्वार्थ पूर्ति का भाव संड़ांध फैलाने जा रहा है।
          ऐसे में ब्लाग लेखन एक आशा है पर फिलहाल उस पर विराम लगा मानना चाहिए। वजह यह कि बाज़ार और प्रचार के संयुक्त उपक्रमों ने टेलीफोन कंपनियों के प्रयोक्ता बनाये रखने के लिये एक समय ब्लाग का प्रचार किया। असीमित अभिव्यक्ति और पाठकों के बीच यह सेतु तेजी से बन सकता था पर बाद में ट्विटर और अब फेसबुक के प्रचार ने इसे हाशिए पर डाल दिया है। पहले अभिनेताओं, नेताओं, कलाकारों तथा अन्य प्रसिद्ध हस्तियों के ब्लागों की चर्चा होती थी। अब यही ट्विटर और फेसबुक के लिये हो रहा है। पहले सुपर स्टार के ब्लाग की चर्चा हुई अब उनके ट्विटर और फेसबुक की बात होने लगी है। मतलब एक सुपर स्टार है जिसे बाज़ार अभिव्यक्ति की हर विधा के प्रचार लिये उपयोग करता है ताकि आम प्रयोक्ता आकर्षण के शिकार बने रहें। लोग भी उधर जाते हैं। अब लोगों से चर्चा में पता लगता है कि फेसबुक उनके लिये महत्वपूर्ण विषय हैं। ऐसे में ब्लाग लेखन निरुत्साहित हुआ है यानि अभी पहने तो यहां नये हिन्दी लेखकों यहां अपेक्षा नहंी करना चाहिए और अगर आयें तो उनको पाठक आसानी से मिलें यह संभव नहीं हैं। ऐसे में पाठक हमारा ब्लाग देखें तो वह कहीं उसे फेसबुक समझकर भूल जायेंगे यह सत्य भी स्वीकार करना चाहिए।
बीच में पाठक संख्या बढ़ती नज़र आती थी पर अब थम गयी है। सही मायने में अपनी औकात बतायें तो वह यह है कि हम अभी भी एक इंटरनेट प्रयोक्ता हैं और लेखक के रूप में हमारी भूमिका एक लेख के रूप में भारत में कहीं चर्चित होने की संभावना नहीं है। हर महीने सवा छह सौ रुपये अगर इंटरनेट पर न भरें तो अपने ही ब्लागों को देखने से वंचित रह जायें। फिर यह कोई कहने वाला भी नहीं है कि आकर दुबारा लिखो। फिर भी विचलित नहीं है क्योंकि बाज़ार, प्रचार और समाज के शिखर पुरुषों के संगठित गिरोह के रूप में कार्य करने का पहले तो अनुमान ही था पर अब लिखते लिखते दिखने भी लगा है। इससे आत्मविश्वास बढ़ा ही है कि चलो किसी का दबाव हम पर नहीं है।
         प्रायोजक लेखकों की औकात देख ली। किसी ने पाठ चुराये तो किसी ने विचार। हमारे एक मित्र ने एक बड़े लेखक का लेख देखकर हमसे कहा कि ‘यार, ऐसा लगता है कि जो बातें तुम हमसे कहते हो वही उसने अब लिखी हैं। कहीं ऐसा तो नहीं तुम्हारा ब्लाग पढ़ा हो। वरना इतने साल से वह लिख रहे हैं पर ऐसी बात नहीं लिख पाये।’’
हमने कहा-‘‘पता नहीं, पर इतना जरूर जानते हैं कि आम पाठक भले ही ब्लाग न पढ़ता हो पर ऐसा लगता है कि बौद्धिक लोग पढ़ते होंगे और संभव है उन्होंने भी पढ़ा हो। अलबत्ता हमें आत्ममुग्धता की स्थिति में मत ढकेलो।’’
          हमारे दो पाठों के अनेक अंश लेकर एक लेख बना दिया गया। अध्यात्मिक ब्लाग को तो ऐसा मान लिया गया है जैसे कि कोई मुफ्त में लिख रहा हो। हमें हंसी आती है। पहले दुःख हुआ था पर श्रीमद्भागत गीता, पतंजलि योग शास्त्र, चाणक्य नीति, विदुर नीति, कबीर, रहीम, तुलसीदास,कौटिल्य का अर्थशास्त्र तथा गुरुग्रंथ साहिब पर लिखते लिखते ज्ञान चक्षु खुलते जा रहे हैं। ऐसे में दृष्टा बनकर देह को कर्ता के रूप में देखते हैं। वह दैहिक कर्ता कुछ नहीं कह सकता पर उसकी बात हम उससे लिखवा रहे हैं कि ‘ऐ मित्रों, पाठ चुराते रहो, विचार चुराते रहो इससे कुछ नहीं होने वाला! तुम इसके अलावा कुछ कर भी नहीं सकते। हमने कर्ता को देखा है वह जिन हालातों में लिखता है, सोचता है और चिंत्तन करता है वैसे में रहने की तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। सबसे बड़ी बात उस जैसा परिश्रम तुम नहीं कर सकते न तुम में वह योग्यता है। यह योग्यता केवल अध्यात्मिक चेतनाशील व्यक्ति के पास ही आ सकती है। पाखंड, शब्द चोरी, अहंकार और भ्रष्टाचार में लगे तुम जैसे लोगों के पास न भक्ति है न शक्ति! बस आसक्ति है जो कभी तुम्हें ऐसा लिखने नहीं देगी।’’
      किसी से शिकायत करना बेकार है। अंग्रेजी शिक्षा को धारण कर चुका और हिन्दी फिल्मों की नाटकीयता को सत्य मानकर चलने वाला समाज चेतना दिखाये ऐसी अपेक्षा करना भी बेकार है। श्रीमद्भागत गीता में कहा गया है कि ‘गुण ही गुणों में बरत रहे हैं‘ और इंद्रियों ही इंद्रिय गुणों में सक्रिय हैं, यह विज्ञान का सूत्र भी है। यह आज तक किसी ने नहीं लिखा कि श्रीमद्भागवत गीता दुनियां के अकेला ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान और विज्ञान दोनों ही हैं। ऐसे में जब समाज जिन पदार्थों को ग्रहण कर रहा है, जिन दृश्यों को देख रहा है और जिस गंध को निरंतर सूंध रहा है उसमें विरलों के ही ज्ञानी और चेतनशील होने की संभावना है। अधिक अपेक्षा रखना हम जैसे योग और ज्ञान साधक के लिये उचित भी नहीं है।
          फिर भी हम लिखते रहेंगे क्योंकि आखिरी सच यह कि हजारों में से कोई एक पढ़ेगा। उन हजारों में से भी कोई एक समझेगा। उन हजारों में से भी कोई एक मानेगा। यह हमारे लिये बहुत है। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भावगत का संदेश देते समय यह मान लिया था कि सभी उनकी बात नहीं समझेंगे। फिर भी उन्होंने दिया। वह हमारे आदर्श पुरुष हैं। यह उनकी कृपा है कि नित लिखते लिखते या कहें ज्ञान बघारते बघारते हम उस राह पर चल पड़े जिसकी कल्पना भी नहीं की। इसलिये हम तो विरले ही हुए। लोग खूब ज्ञान पर लिखते हैं उसे बघारते हुए धन ंसंपदा भी बना लेते हैं पर वह ज्ञान उनकी जिंदगी में काम नहीं आता। हमारे काम खूब आ रहा है। कई बार वाणी से शब्द निकलते हैं, अपने हाथ से ऐसे काम हो जाते हैं, ऐसे स्वर सुनने में आते हैं और ऐसे दृश्य सामने प्रस्तुत होते हैं जिनके आत्मिक संपर्क से हमारा मन प्रसन्न हो जाता है। हम कह सकते हैं कि यह पहले भी होता होगा पर सुखद अनुभूतियां अब होने लगी हैं। जिन लोगों को लगता हो कि यह फालतु आदमी है लिखता रहता है उनको बता दें कि हमारे पास अपने मन को लगाने के लिये लिखने के अलावा कोई मार्ग कभी रहा ही नहीं है। जय श्रीकृष्ण, जय श्री राम, हरिओम
       इस अवसर पर अपने पाठकों और साथी ब्लाग लेखकों का आभार इस विश्वास के साथ कि आगे भी अपना सहयेाग बनाये रखेंगे। यह उनके पठन और सत्संग का ही परिणाम है कि हमारे अंदर गजब का आत्मविश्वास आया है। इसके लिये आभारी हैं।जय श्रीकृष्ण, जय श्री राम, हरिओम
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
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Saturday, November 20, 2010

भलाई का धंधा आजकल चोखा है-हिन्दी व्यंग्य कविता (bhalai ka dhandha aajkal chokha hai-hindi vyangya kavita)

पूरे ज़माने की तरक्की करने का दावा
अपने आप में बस, एक धोखा है,
बिक जाता है आम इंसानों के बीच
यह नारा केवल वादों की कीमत पर
भलाई का धंधा आजकल बहुत चोखा है।
----------
एक धोखा देकर चला गया
दूसरा विश्वास निभाने का वादा लेकर आया,
उसने धोखा दिया तो
पहला फिर दिल औद दल बदल का आया,
अपने चेहरे पर उसने नया नकाब लगाकर,
जुबां पर नया वादा सजाया,
इस तरह सिंहासन का चक्र
भलाई के धंधे में समाया
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
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Sunday, September 19, 2010

एकता की अपील-व्यंग्य कविता (ekta kee apeel-hindi vyangya kavita

फिर हुआ है शहर में विस्फोट
इसलिये
आओ एकता की अपील के लिये
कुछ नये शब्द चुनें
जिनसे नयापन लगे
तभी लोगों को समझा पायेंगे।
एक जैसे शब्द लिखते हुए
बीत गये बहुत सारे वर्ष
इसलिये उनका प्रभाव नहीं दिखता
हम होंगे कामयाब तभी
जब नयापन लायेंगे।
हादसे रोकना हमारे बस में नहीं है
पर एकता की अपीलों में
हम अपना पूरा दम दिखायेंगे।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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