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Sunday, February 9, 2014

भर्तृहरि नीति शतक-किसी का स्वार्थ पूरा किये बिना सम्मान पाने की इच्छा व्यर्थ(bhartihari neeti shatak-kise ka swarth poora kiye bina samman pane ki ichchha vyarth)



      इस संसार में भौतिक विकास की चाह हर मनुष्य को होती है। सभी को भारी धन संपदा या वैभव नहीं मिल पाता-ऐसे में कहा जा सकता है कि यह भाग्य की महिमा तो यह भी माना जा सकता है कि जिन मनुष्यों पर माया की कृपा अधिक नहीं है या अल्प है वह उनके कर्म का ही परिणाम है।  भौतिक आधार पर मनुष्य के तीन वर्ग माने गये हैं-उच्च, मध्यम और निम्न। यही आधार उसके आचरण और व्यवहार से भी तय होता है। निम्न कोटि का व्यक्ति धन संपदा अधिक होने पर अत्यंत अहंकार पूर्ण व्यवहार करने लगता है जबकि मध्यम वर्ग का व्यक्ति अपने आप में डूबकर सामान्य लोगों से कट जाता है।  उच्च वर्ग का व्यक्ति अपने धन का उचित प्रयोग करने के साथ ही जहां नम्र होता है वहीं समय समय पर वह समाज के लिये दान या सहायता के रूप में व्यय भी करता है।  जहां तक धन संपदा होने पर समाज में सम्मान का प्रश्न है तो लोग दिखावटी रूप से सभी का करते हैं मगर हार्दिक प्रेम उनका केवल उन्हीं धनपतियों को देते हैं जो वास्तव में समाज के लिये हितकर होते हैं।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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किं तेन हेमगिरिणा रजतद्रिणा वा यत्राश्रिताश्च तरवस्तरवस्त एव।
मन्यामहं मलयमेव यदाश्रयेण कङ्कोलनिन्वकुटजा अपि चन्दनाः स्युः।।
     हिन्दी में भावार्थ-सुमेरु  पर्वत सोने से भरा है  है मगर उस पर स्थित पेड़ पौ़द्यों को कोई लाभ नहीं क्योंकि उनका मूल रूप नहीं बदलता।  उससे अच्छा तो मलय पर्वत है जहां के सारे पेड़ पौद्ये उसके सानिध्य में चंदनमय हो जाते हैं।
      आमतौर से देखा गया है कि अध्यात्मिक दृष्टि से निम्म कोटि के व्यक्ति धन आने पर इतने आत्ममुग्ध हो जाते हैं कि जहां तहां अपनी प्रशंसा स्वयं करते हैं। कई तो ऐसे भी होते हैं कि अपने दान तथा त्याग का झूठा प्रचार करते हैं। इन लोगों से परिवार के अलावा अन्य कोई लाभान्वित नहीं होता इसलिये हार्दिक प्रेम का उन्हें अनुभव नहीं होता इसलिये न वह किसी से करते हैं न कोई उनको देता है-वह तो अपने अंदर ही यह भ्रम पाल लेते हैं कि हमारे पास धन है तो समाज वैसे ही सम्मान करता है। यही स्थिति मध्यम वर्ग की भी होती है।  इसके विपरीत उच्च कोटि वाला धनिक यह जानता है कि जब तक वह किसी के लिये लाभदायक अवसर पैदा नहीं करेगा तब तक समाज से सम्मान पाने की  ही नहीं वरन् धन की सार्थकता देखने की भी उसकी इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकती।  व्यक्ति वही महान या बड़ा कहलाता है जो अपने तथा परिवार से प्रथक जब बाह्य रूप में स्थित होकर परोपकार का काम करे। 
     कहने का अभिप्राय यह है कि इस भौतिक संसार में जब तक हम किसी को प्रत्यक्ष लाभ नहीं दे सकते तब तक किसी प्रकार का प्रेम या सम्मान पाने की आशा करना व्यर्थ है। दूसरे शब्दों में यह कहें कि हम जब किसी व्यक्ति से सम्मान या प्रेम की आशा करें तो यह भी विचार करना चाहिये कि हम उसके लिये काम के हैं या नहीं।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Sunday, February 2, 2014

समाचार और बहस की फिल्म में वांछित तीसरा पात्र-विशिष्ट रविवारीय लेख(samachar aur bahas ki film mein vaanchhit teesra paatra-vishshth ravivariya lekh)



             2014 में लोकसभा के आम चुनाव होने तय हैं। हमारे देश में सामान्यतः राष्ट्रीय, प्रांतीय तथा नगरीय प्रतिनिधि सभाओं को चुनाव पांच वर्ष में एक बार अवश्य होते हैं।  प्रचार माध्यमों के लिये राष्ट्रीय और प्रांतीय चुनाव हमेशा ही आकर्षक प्रचार तथा बहस की सामग्री प्रदान करने वाले होते हैं जिनसे उनको अपने विज्ञापन के बीच प्रसारित कर अपने सामाजिक दायित्व निभाते दिखने की सुविधा मिलती है। टीवी चैनलों और अखबारों का वर्तमान लोकतंत्र में इतना जबरदस्त प्रभाव है कि चुनावी राजनीति में सक्रिय हर राजनेता अपनी छवि धवल बनाये रखने के लिये इनके प्रसारणों तथा प्रकाशनों पर ध्यान रखता है।  इनके प्रकाशन राजनीतिक संगठनों पर इस कदर प्रभाव डालते हैं कि उनमें अनेक प्रवक्ता इसलिये रखे जाते हैं ताकि समय समय पर अनेक चैनलों पर एक साथ चल रही बहस में उनकी हिस्सेदारी रहे।  जब सामाजिक मसले पर बहस हो रही हो तो अनेक बार ऐसा भी होता है कि एक समाज सेवक एक चैनल पर चल रही बहस खत्म कर दूसरे पर अवतरित होता है क्योंकि उनके पास ऐसा अनेक प्रवक्ताओं वाला कोई संगठन नहीं होता।
            भारतीय राजनीति पर इन प्रचार संगठनों का प्रभाव प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता है। प्रत्यक्ष तो प्रकट है पर अप्रत्यक्ष का अनुमान ही किया जा सकता है।  अनेक बार ऐसी गतिविधियां और बयान सामने आते हैं कि लगता है कि उनका प्रायोजित निर्माण हुआ हो ताकि प्रचार माध्यमों को उन पर सनसनी भरे समाचार तथा संवेदनशील बहस का अवसर मिल सके।  खासतौर से सामाजिक विषयों पर अक्सर कहा जाता है कि अमुक आदमी ने मीडिया में नाम पाने के लिये उलूलजुलूल बयान दिया है। उस समय शंकायें उठती हैं कि कहीं वह प्रायोजित सामाजिक घटना यह बयान तो नहीं है। जिस तरह हमारे देश में समाज को  महिला, बालक, वृद्ध, बीमार तथा भूखों के वर्ग में बांटकर टुकड़ा टुकड़ा अभियान चलाकर प्रचार पाने की रीति चली है उसी तरह ही प्रचार माध्यम भी प्रतिदिन विषय बदलकर बहसों का रूप बदलते हैं।  जब कुछ भी न हो तो महिला विषयों पर चर्चा हो जाती है। राजनीति से ज्यादा समाज के विषय पर कही गयी सनसनीपूर्ण बात ज्यादा इन प्रचार माध्यमों को आकर्षक लगती है। ऐसे में महिलाओं को  लेकर कोई फालतु बयान उनके लिये चिंता का विषय दिखाने के लिये होता है जबकि वह विज्ञापनों के बीच समाचार तथा बहस के प्रसारण में रुचिकर हो जाता है।
            महिलाओं पर कई विवादास्पद बयान आते हैं पर अगर किसी प्रतिष्ठत व्यक्ति का हो तो उस पर सार्वजनिक चर्चा होना ही है।  ऐसे में यह समझ में नही आता कि उस व्यक्ति ने अपना बयान प्रचार पाने के लिये दिया या प्रचार माध्यमों के प्रबंधकों ने अपने प्रयास से दिलवाया।  अभी हाल ही में एक नये दल के उदय हुआ जिसके कर्णधार तक यह मानते हैं कि प्रचार माध्यमों ने उनको इतनी ऊंचाई तक पहुंचाया है।  स्वयं प्रचार माध्यमों ने अपने सर्वेक्षण में इस बात को पाया कि 42 फीसदी लोग उस दल के उदय में समाचारों और बहसों का केंद्र बिन्दू में अधिक समय तक रहना मानते हैं।  ऐसा लगता है कि नियमित राजनीतिक परिदृश्य से उकताये प्रचार प्रबंधकों को लग रहा था कि फिल्मी कहानी की तरह प्रसारित उनके समाचार तथा बहसों में कोई तीसरा पात्र भी होना चािहये। जिस तरह कभी भारतीय सिने जगत में बहुनायक वाद था उसी शैली में प्रचार प्रबंधक यह चाहते रहेे होंगे कि उनके प्रतिदिन फिल्म या धारावाहिक की तरह प्रसारित होने वाले समाचार और बहसों में कभी कभी ऐसे पात्र उभरने चाहिये जो कभी कॉमेडी तो कभी अतिगंभीर वातावरण बनाने मंें सहायक हों।  यह स्थिति वैसे ही जैसे कि फिल्म में मनोरंजन के साथ ही कभी हास्य तो कभी अतिगंभीर संदेशवाहक दृश्य संयोजित किया जाता है।  जिस तरह वह दल प्रचार माध्यमों ने उभारा तो एक समय ऐसा लगा कि वह उसे देशव्यापी विेजेता बना देंगे मगर अंततः उन्हें अपना अर्थशास्त्र भी देखना ही था इसलिये धीरे धीरे अब वह उसी दल के प्रति नकारात्मक प्रचार भी करने लगते हैं।  उसका अस्तित्व बना रहे ताकि भविष्य में काम इसलिये उसका सकारात्मक पक्ष भी रख रहे हैं। जिस तरह यह दल पहले चल रहा था उससे लगा कि यह पूरे देश में छा जायेगा पर अब इसकी संभावना नगण्य रह गया है। कहने का अभिप्राय यह है कि प्रचार माध्यमों ने एक बहुत बड़ी  शक्ति हासिल कर ली है।
            हम इस शक्ति से ईर्ष्या नहीं करते वरन् चाहते हैं कि इसका वह भारतीय समाज के निर्माण में अपनी  लगायें। यह कार्य केवल अध्यात्मिक टीवी चैनलों या लोगों के भरोसे करने की बजाय वह आम आदमी की आवाज को अपने पर्दे पर स्थान देकर ही किया जा सकता है।  अभी प्रचार माध्यमों ने कुछ प्रतिभाशाली बालकों का प्रदर्शन दिखाया जो काफी प्रशंसनीय था।  आम नागरिक में सामूहिक आत्मविश्वास भरने के लिये यह आवश्यक है कि उसकी आवाज और शब्दों को प्रचार माध्यम स्थान दें।  हमने देखा है कि प्रतिष्ठित लोगों के ट्विटर, फेसबुक और ब्लॉग की सामान्य बातों को भी यह लोग प्रचारित करते हैं। एक तरह से यह वातावरण बनाया गया है कि सामाजिक अंतर्जालीय जनसंपर्क पर केवल बड़े ही लोग प्रभावशाली ढंग से सक्रिय हैं। सामान्य जनों की सक्रियता का कोई अर्थ नहीं है। हमारा मानना है कि टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में अगर सामान्य जनों की आवाज को उनका नाम देकर प्रकाशित किया जाये तो समाज का आत्मविश्वास बढ़ेगा।  एक बात याद रखें लिखने या बोलने की कला प्रतिष्ठित लोगों में नहीं होती वरन् सामान्य जन भी माहिर होते हैं पर चूंकि उन्हें कोई स्थान नहीं देता इसलिये समाज में प्रचार माध्यमों को लेकर भी निराशा व्याप्त है।
            बहरहाल आने वाले लोकसभा चुनावों के निकट आते आते अनेक गंभीर तो अनेक हास्य जनक समाचार सामने आयेंगे।  जहां राजनीतिक संगठन आने वाले चुनावों की तैयारी में व्यस्त हैं तो प्रचार प्रबंधक भी इस तरह की योजना बन रहे होंगे कि इस महाकुंभ में की अर्थनदी में स्वयं भी नहा लें। हम जैसे आम इंसान और फोकटिया लेखक की भूमिका एक दर्शक की तरह होती है। यह अलग बात है कि हिन्दी भाषा तथा टंकण का ज्ञान होने के साथ ही कंप्यूटर चलाने का अभ्यास हमें अपनी अभिव्यक्ति को अंतराष्ट्रीय रूप देने का अवसर मिल जाता है। इस अंतर्राष्ट्रीय रूप को लेकर हम खुशफहमी नहीं पालते और गलतफहमी नहीं पालें-यह तक हमने इसलिये दिया क्योंकि हमारे ब्लॉग बताते हैं कि उन्हें अनेक देशों में पढ़ा जाता है हालांकि पाठ तथा पाठकों की संख्या कोई अधिक नहीं होती।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Monday, January 27, 2014

अपना चंदन रहें खुद घिसते-हिन्दी व्यंग्य कविता(apna chandan rahen ghiste-hindi vyangya kavita)



लगता है ख्वाब में आयेंगे आसमान  से फरिश्ते,
निभायेंगे बिना मिन्नत किये हमसे अपने रिश्ते।
कहें दीपक बापू
हर पल जंग लड़ना ही  जिंदगी की सच्चाई है,
भले ही पलायन करने की कसम हमने खाई है,
बहुत आशिक कर चुके चांद तारे जमीन पर लाने के इरादे,
आकाश मुस्करा रहा है सदियों से सुनकर झूठे वादे,
सपने देखना अब बंद कर दिया लोगों ने,
खरीद रहे दूसरे की सोच घेरा दिमागी रोगों ने,
सभी के घर भरे दुनियां भर के सामानों से,
फिर भी ख्वाहिशों के झुंड के लिये फिर रहे अरमानों से,
दिल बहलाने के लिये भटकते लोगों का समझाना कठिन है
 अक्लमंदों के लिये ठीक यही कि अपना चंदन रहें खुद घिसते।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Tuesday, January 21, 2014

कागजी नाव-हिन्दी व्यंग्य कविता (kagzi naav-hindi vyangya kavita)




वह ठहरे हल्के इंसान
चेहरे पर रोज नया मुखौटा लगाकर आते हैं,
गंभीरता का करते हैं नाटक
जल्दी ही जोकर हो जाते हैं।
कहें दीपक बापू
वादों पर कभी वह खरे उतर सकते नहीं,
अपने भरोसे पर यकीन खुद करते नहीं,
यह प्रचार का खेल हैं
जहां उनकी काली नीयत भी सुंदर नज़र आती है,
फरेबी अदायें महंगी बिक जाती हैं,
सौदागर बेच रहे बाज़ार में कागजी ख्वाब,
कारिंदों करें कारिस्तानी वह दिखायें रुआब,
सियायत हो या ज़माने का भला
कामयाब खिलाड़ी वही नज़र आते हैं,
वादों से वफादारी निभाने के बजाय
कागजी नाव जो चला पाते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Saturday, January 11, 2014

रहीम दर्शन-परोपकार की भावना हर मनुष्य में होती है(rahim darshan-paropkar ki bhawana hay manushya mein hotee hai)



            आधुनिक लोकतांत्रिक युग में प्रत्येक देश में जनप्रतिनिधि शासनतंत्र चलाते हैं।  पहले राजतंत्र में राजा लोग बिना किसी शोरशराबे के जनहित करते थे पर अब लोकतांत्रिक प्रणाली में इन जनप्रतिनिधियों को एक अवधि के पास जनता के सामने जाना होता है इसलिये वह अपने हर प्रयास को जनकल्याण से जोड़कर अपना प्रचार करते हैं। दूसरी बात यह है कि राज्य व्यवस्थाओं में अनुप्पादक कार्यों पर अधिक व्यय किया जाने लगा है। पूरे विश्व में कंपनी नामक दैत्य को अर्थव्यवस्था सौंप दी गयी है जिसमें समाज के प्रति दया या ममता का भाव होना ही संभव नहीं है। इस कंपनी दैत्य की दिलचस्पी केवल अपने उत्पादन तथा आय के बढ़ते आंकड़ों में होती है। छोटे, मध्यम तथा उच्च वर्ग के निजी व्यवसायों को एकदम समाप्त किया जा रहा है। देखा जाये तो निजी व्यवसाय वर्ग में लगे लोग समाज और आय में सामजंस्य बनाकर चलते रहे हैं जिसे इस कपंनी दैत्य समाप्त करता जा रहा है। राज्य व्यवस्थाओं में कंपनियों के स्वामियों का हस्तक्षेप अब प्रत्यक्ष दिखने लगा है। इस उहापोह की स्थिति में  समाज अस्थिर हुआ है जिससे लोग अब स्वयं के संघर्ष में लिप्त होते जा रहे हैं।  इधर राज्य व्यवस्था में लोगों की दिलचस्पी बनाये रखने के लिये समाज कल्याण का विषय इस तरह जोड़ा गया है जिससे लोगों को अपने पक्ष में रखा जा सके। इस तरह का प्रचार निरंतर होता है कि लोगों का कल्याण राज्य ही कर सकता है और जो राज्यकर्म से परे है वह किसी का सहायक नहीं हो सकता।

कविवर रहीम कहते हैं कि
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हित रहीम इतनै करैं, जाकी जितौ बिसात।
नहिं यह रहै न वह रहै, रहै कहन की बात।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-परोपकार का भाव हर मनुष्य में होता है। जिसका जितना सामर्थ्य होता वह दूसरे की सहायता किये बिना नहीं रहता। यह अलग बात है कि किसी की चर्चा होती है किसी की नहीं।

            यह मानना गलत है कि समाज में आम लोगों की दिलचस्पी नहीं होती। सच बात तो यह है कि हर इंसान में परोपकार की भावना होती है।  इस संसार में लोग राज्य व्यवस्थाओं की वजह से नहीं वरन् एक दूसरे की सद्भावना की वजह से जिंदा रहते हैं। कहते हैं कि भगवान भूखा उठाता है पर सुलाता नहीं है, यह मानवीय संवदेनाओं को संकेत करता है। हमारे देश में तो भले ही समाज जाति, धर्म और भाषाई आधार पर बंटा है पर जहां किसी व्यक्ति पर संकट हो वहां लोग मदद करते समय इस बात की परवाह नहीं करते कि पीड़ित व्यक्ति आखिर किस समुदाय का है? सभी लोग बड़े बड़े दान नहीं करते पर जो छोटे दान करते हैं वह प्रचार करने नहीं आते। आजकल कंपनी दैत्य लोगों की सहायता के नाम पर बड़े बड़े गीत, संगीत और खेल के तमाशे करते हैं।  खासतौर से गरीब बच्चों के नाम पर बड़े अभिनेताओं, गायकों और खिलाड़ियों का जमावड़ा किया जाता है। इस तरह समाज में यह प्रचार किया जाता है कि समाज कल्याण पैसे और पद की शक्ति के सहारे ही किया जा सकता है। जबकि हमारा मानना है कि इस तरह से सामान्यजनों को बहलाया जाता है ताकि अव्यवस्था, गरीबी, तथा तनाव से ग्रस्त लोग बागी नहीं हो जाये। एक बात याद रखें जिनके पास पद, पैसे और प्रतिष्ठा का ढेर लगा है वह व्यवस्था में परिवर्तन से घबड़ाते है।  इसलिये समाज में फैले असंतोष से भयभीत होेने के कारण वह कुछ व्यय इस तरह करते हैं जिससे बगावत थमी रहे।  सच बात यह है कि आम मनुष्य दूसरे का स्वभाविक रूप से सहायक होता है।  जिस तरह कोई आदमी ऐसा नहीं मिलता जिसने कभी जीवन में कोई अपराध नहीं किया हो उसी तरह ऐसा भी नहीं मिल सकता जिसने कभी किसी यथासंभव मदद न की हो।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Saturday, December 28, 2013

मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख-राज्यकर्म के लिये राजनीति का ज्ञान होना चाहिये(manu smriti -rajya karma ke liye rajneeti ka gyan ka hona chahiye)



            हमारे देश राजतंत्र समाप्त होने के बाद लोकतांत्रिक प्रणाली अपनायी गयी जिसमें चुनाव के माध्यम से  जनप्रतिनिधि चुने जाते हैं।  भारत एक बृहद होने के साथ भौगोलिक विविधता वाला देश है। लोकसभा राष्ट्रीय, विधानसभा प्रादेशिक, नगर परिषद तथा पंचायत स्थानीय स्तर पर प्रशासन की देखभाल करती हैं। देखा जाये तो राजतंत्र में राजा के चयन का आधार सीमित था इसलिये आम आदमी राजकीय कर्म में लिप्त होने की बात कम ही सोचता था। हालांकि इस संसार में अधिकतर लोग राजसी प्रवृत्ति के ही होते हैं पर राजतंत्र के दौरान क्षेत्र व्यापार, कला, धर्म तथा प्रचार के अन्य क्षेत्रों में स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने तक ही उनका प्रयास सीमित था। लोकतंत्र ने अब उनको आधुनिक राजा बनने की सुविधा प्रदान की है।  चुनावों में वही आदमी जीत सकता है जो आम मतदाता के दिल जीत सके।  बस यहीं से नाटकीयता की शुरुआत हो जाती है।  स्थिति यह है कि कला, पत्रकारिता, फिल्म, टीवी तथा धर्म के क्षेत्र में लोकप्रिय होता है वही चुनाव की राजनीति करने लगता है। वैसे राजनीति राजसी कर्म की नीति का परिचायक होती है जो अर्थोपार्जन की हर प्रक्रिया का भाग होता है।  राज्यकर्म तो इस प्रक्रिया का एक भाग होता है। राजनीति उस हर व्यक्ति को करना चाहिये जो नौकरी, व्यापार अथवा उद्योग चला रहा है।  केवल चुनाव ही राजनीति नहीं होती पर माना यही जाने लगा है।
            इससे हुआ यह है कि बिना राजनीति शास्त्र ज्ञान के लोग पदों पर पहुंच जाते हैं पर काम नहीं कर पाते। राजकीय कर्म की नीतियां हालांकि परिवार के विषय से अलग नहीं होती पर जहां परहित या जनहित का प्रश्न हो वहां शिखर पुरुषों को व्यापक दृष्टिकोण अपनाना पड़ता है।  इसलिये राजनीति शास्त्र का उनको आम इंसान से अधिक होना आवश्यक है।  भारत में आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक व्यवस्थाओं  से हमेशा ही लोगों में अंतर्द्वंद्व देखा गया है।  देखा यह गया है कि रचनात्मक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति लंबे समय तक अपना स्थान बनाये रखता है पर अनवरत अंतर्द्वंद्व की प्रक्रिया के बीच जब कोई विध्वंसक प्रवृत्ति का व्यक्ति खड़ा हो जाता है तो तनावग्रस्त समाज में उसकी छवि नायक की बन जाती है। दूसरी बात यह है कि जब लोग अपनी समस्याओं से जूझते हैं तब उनके बीच जोर से ऊंची आवाज में बगावत की बात कहने से लोकप्रियता मिलती है।  यही लोकप्रियता चुनाव जीतने का आधार बनती है।  इससे उन लोगों को जनप्रतिनिधि होने का अवसर भी  मिल जाता है जो बगावती तेवर के होते है पर उनमें रचनात्मकता का अभाव होता है।
मनु स्मृति में कहा गया है कि
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साम्रा दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक।
विजेतुः प्रयतेतारीन्न युद्धेन कदाचत्।।
            हिन्दी में भावार्थ-अपने राजनीतिक अभियान में सफलता की कामना रखने वाले पुरुष को साम, दाम तथा भेद नीतियों के माध्यम से पहले अपने अनुकूल बनाना चाहिये। जब यह संभव न हो तभी दंड का प्रयोग करना श्रेयस्कर है।
उपजप्यानुपजपेद् बुध्येतैव च तत्कृतम।
बुत्तों च दैवे बुध्यते जयप्रेप्सुरपीतभीः।।
            हिन्दी में भावार्थ-राजनीतिक अभियान में पहले अपने विरोधी पक्ष के लालची लोगों को अपने पक्ष में करना चाहिये। उनसे अपने विरोधी पक्ष की नीति तथा कमजोरी का पता लगाकर अपने अभियान को सफल बनाने का प्रयास करना चाहिये।
            हमारे देश में अनेक प्रकार के राजनीतिक परिदृश्य देखने को मिले हैं।  अनेक संगठन बने और बिगड़े पर देश की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति यथावत रही।  नारे लगाकर अनेक लोग सत्ता के शिखर पर पहुंचे राजनीति तथा प्रशासन का ज्ञान न होने की वजह से वह प्रजाहित की सोचते तो रहे पर आपने कार्यक्रम क्रियान्वित नहीं कर सके। साहित्य, कला, फिल्म तथा पत्रकारिता के साथ ही जन समस्याओं के लिये जनआंदोलन करने वाले लोग जनमानस में लोकप्रियता प्राप्त कर चुनाव जीत जाते हैं पर जहां प्रशासन चलाने की बात आये वहां उनकी योग्यता अधिक प्रमाणित नहीं हो पाती।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Thursday, December 19, 2013

चुनाव और आंदोलन दोनों ही राजसी कर्म के परिचायक-हिन्दी लेख(chunav or election and andolna or agitation rajsi karma ke parichayak-hindi lekh or article)



                        एक बात समझ में नहीं आती कि हमारे भारत में राजनीति का आशय हमेशा ही चुनाव के माध्यम से राजकीय पद प्राप्त करने की प्रक्रिया से ही क्यों जोड़ा जाता है। हम संदर्भ अन्ना हजारे जी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से ही ले रहे है क्योंकि वह वर्तमानकाल में अधिक प्रासंगिक लगता है।  अन्ना हजारे कहते हैं कि मेरा आंदोलन गैर राजनीतिक है। अन्ना हजारे से संबंधित कुछ उनके भक्तों ने एक राजनीतिक दल का गठन किया तो कहा गया कि वह राजनीति में आ गये हैं।  ऐसा लगता है कि भारत में पश्चिमी आधार पर चलने वाले चिंत्तक राजनीति शब्द के मायने का  संकीर्ण अर्थ ले रहे हैं। 
            अगर हम श्रीमद्भागवत गीता के कर्म विभाग का अध्ययन करें तो सात्विक, राजस तथा तामस तीन प्रकार के कर्म होते हैं।  सात्विक कर्म में लगे लोगों का एक ही नियम होता है कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुन गाओ। ऐसे लोग समाज के लिये स्वयं बढ़कर काम नहीं करते पर अगर सामने आ जाये तो मुख नहीं मोड़ते।  अलबत्ता वह समाज में संकट खड़ा नहीं करते इसलिये वह प्रशंसा के पात्र होते हैं। तामसी कर्म में लगे लोगों आलस्य, प्रमाद तथा धीमी गति से काम करने वाले होते हैं इसलिये उनसे भी समाज के परोपकार की आशा करना ही  व्यर्थ है।  सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य राजसी कर्म है जिसकी पहचान है काम, क्रोध, मोह, लोभ, तथा अहंकार  जैसे गुणों के रूप में होती है।  सकारात्मक रूप से यह गुण ही है नकारात्मक रूप से ही इन्हें दुर्गुण कहा जाता है। जिनकी मूल प्रवृत्ति ही राजसी है वह सदा प्रतिफल की आशा से काम करते हैं जो राजसी कर्म की पहचान है।  अपने हितों के मोह में प्रतिफल पाने का लोभ मनुष्य को सक्रिय रखता है। उसके न मिलने पर उसे क्रोध आता ही है। मिल जाये तो वह उससे भरपूर सुविधायें जुटाने की कामना भी वही करता है।  न मिले तो क्रोध और मिल जाये तो अहंकार आता ही है। सात्विक लोग अपनी सुविधानुसार राजसी कर्म करते ही हैं क्योंकि इसके बिना उनका गुजारा नहीं होता। तामसी प्रवृत्ति के लोग भी येनकेन प्रकरेण यह करने के लिये बाध्य होते हैं। किसी भी राजसी कर्म करने के लिये नीतिगत रूप से काम करना ही राजनीति है। कहने का अभिप्राय यह है कि न केवल राज्य कर्म के लिये वरन् व्यक्तिगत राजसी कर्म के लिये भी राजसी प्रवृत्ति में लिप्त होना ही होता है।
            पहले तो हम लोकतंत्र की बात करें जिसमें जिस तरह चुनाव उसका भाग होते हैं। इसी लोकतंत्र में जहां जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले सरकार बनाते है तो ऐसे लोग भी होते है जो अपनी मांगों के लिये आंदोलन चलाते हैं।  यह चुनाव और आंदोलन दोनों ही आज की लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का भाग हैं। अन्ना हजारे स्वयं सात्विक प्रवृत्ति के हैं पर उनकी छवि राजसी कर्मों में श्रेष्ठता के कारण है।  अन्ना हजारे साहब का आंदोलन अब दो भागों में बंट गया है एक चुनाव की तरफ आया तो दूसरा आंदोलन को ही देश के बदलाव का मार्ग मानकर वहीं डटा है।  जहां प्रजा हित का प्रश्न हो वहां राजा को छल कपट, धोखा तथा राजनीतिक स्वार्थपरायणता के लिये तत्पर रहना चाहिये यह राजनीति शास्त्र कहता है।  सात्विक मनुष्य चूंकि यह काम नहीं कर सकते इसलिये ही राज्यकर्म से दूर ही रहते हैं।  अगर राजसी कर्म में कोई श्रेष्ठ व्यक्ति हो तो वह सात्विक से कम नहीं होता मगर शर्त यह है कि उसे अपने काम की प्रकृत्ति का ज्ञान होना चाहिये।  राजसी कर्म करते समय श्रेष्ठ करते समय सात्विक दिखना तो चाहिये पर उससे दूर होना ही लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक हो सकता है।
            अन्ना से अलग हुए लोगों ने चुनाव के क्षेत्र में कदम रखा है। उन्हें सफलता तो मिली है पर वह स्थाई नहीं हो सकती।  आंदोलन चलाना और सरकार चलाने में अंतर होता है। आंदोलन दमदार हो तो सरकार को झुकना पड़ता है पर अगर सरकार दमदार हो तो आंदोलन की हवा भी निकाल सकती है। एक बात तय रही कि राजसी कर्म स्वार्थ से परे नहीं हो सकते। दूसरी बात यह कि राजसी कर्म करते हुए अगर किसी ने अपने लिये संपन्नता नहीं अर्जित की तो उसे समाज बड़ी दयनीय दृष्टि से देखता है।  अन्ना हजारे के चंद भक्त उनसे अलग होकर चुनाव के माध्यम से समाज में बदलाव का जो लक्ष्य सामने रख रहे हैं उनकी नीयत पर हमें संदेह नहीं है पर मुख्य बात यह है कि उनके अनुयायी भी उनकी तरह ही होंगे इस पर संदेह है। कुछ समय के लिये उनको युवाओं का उत्साही वर्ग अवश्य मिल जाये पर कालांतर में राज्य सुख उनको वैसा ही ईमानदार बने रहने देगा इसमें संदेह है जैसा कि प्रारंभ में होंगे।  बहरहाल अभी तो यह कहना कठिन है कि अन्ना हजारे के उनसे अलग हुए पुराने भक्त कि चुनाव के माध्यम से समाज में कितना बदलाव ला पायेंगे पर एक बात तय है कि उन्होंने भारतीय राजनीति को एक नयी दिशा देने का प्रयास तो किया है। आगे देखें क्या होता है। 


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Monday, December 2, 2013

इस संसार में सभी लोग एक जैसे नहीं होते-हिन्दी चिंत्तन लेख(is sansar mein sabhi log ek jaise nahin hote-hindi chinntan lekh)



                        अभी हाल ही में कुछ प्रसिद्ध लोगों के यौन प्रकरणों तथा बलात्कार के आरोपों पर भारतीय प्रचार माध्यमों ने इतना शोर मचाया है जैसे लगता है कि यहां इस देश में बस केवल यही हो रहा है।  टीवी चैनलों पर जमकर बहसें हो रही हैं।  पुरुषों की मानसिकता पर तमाम तरह के सवाल उठ रहे हैं। कुछ महिला विद्वान तो यह मानने को ही तैयार ही नहीं है कि कोई भला आदमी इस संसार में भी हो सकता है।  बड़े शहरों में रहने वाली इन महिला विद्वानों  पर प्रगतिशील तथा जनवादी विचाराधाराओं का ऐसा प्रभाव है कि उन्हें भारतीय अध्यात्म के संदर्भों का ज्ञान देना ही बेकार है। भारतीय अध्यात्म में इस संबंध में अनेक प्रकार की बातें कही गयी है।
            सच बात तो यह है कि कोई पुरुष बलात्कार के आरोपों से घिरता है तो उसे अत्यंत निकृष्ट माना जाता है। यहां तक कि अपराध जगत के लोग भी इसे घिनौना आरोप मानते हैं। कुछ लोग बताते हैं कि जेलों में चोर तथा बलात्कार के आरोपियों को अन्य कैदी अत्यंत कमजोर मानते हुए उनका उपहास उड़ाते हैं।  टीवी पर जब बहस होती है तो ऐसा लगता है कि जैसे हर पुरुष मौका पड़ने पर यौन दुराचार के लिये तैयार हो जाता है। यह भ्रम है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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वैराग्ये सञ्चरत्येको नीतौ भ्रमति चापरः।
श्रृङ्गरे रमते कश्चिद् भुवि भेदाः परस्परम्।।
            हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में सभी लोग एक जैसे नहंी है। सभी की रीति नीति प्रथक प्रथक हैं। कोई वैराग्य में रत है तो कोई नीतिशास्त्र के अनुसार जीवन जीता है तो कोई काम के अधीन होकर श्रृंगार रस में डूबा रहता है।
            आजकल खुली बाज़ार व्यवस्था ने जहां कथित रूप से जिस विकास का दावा किया जाता है वही ऐसे अपराधों की जननी भी है जिनकी कल्पना आज से कुछ वर्ष पूर्व तक नहीं की जाती थी।  अपराध विशेषज्ञों के अनुसार महिलाओं के प्रति अपराध आमतौर से उनके निकटस्थ लोग ही करते हैं। इस तथ्य पर कोई महिला विद्वान ध्यान नहीं देती और बिना वजह पुरुषवादी मानसिकता को कोसती हैं।  इस संसार में सभी प्रकार के लोग हैं।  यह अलग बात है कि कुछ अपराधिक घटनायें समाज में सनसनी फैलाती हैं पर यहां यह भी याद रखने लायक हैं कि देश की बढ़ती आबादी में बेरोजगारी, महंगाई तथा असुरक्षा के वातावरण में यौन अपराधों का बढ़ना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।  लोग कड़े कानून बनाने की मांग तो करते हैं पर उसे लागू करने वाली व्यवस्था पर किसी का ध्यान नहीं जाता। जबकि अगर हम देखें तो समस्या यह नहीं है कि कानून कड़े नहीं है वरन् कहीं न कहीं हम ऐसी व्यवस्था को अपनाये हैं जो उस ढंग से काम नहीं कर पा रही जैसी की हम अपेक्षा करते है।



लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Thursday, November 7, 2013

हम मोर नहीं है-हिन्दी व्यंग्य कविता(ham more nahin hain-hindi vyangya kavita)



पटाखों के शोर से
फटते कान,
धुऐं से जलती आंखें,
प्रदूषित हवा से भरती हुई छाती
दीपावली के उत्साह में
दिल  अब ज्यादा साथ नहीं देता
पीड़ाओं के बीच खुशी कहीं
खो जाती है।
कहें दीपक बापू
कोई ऐसा दीपक जलाओ
जिससे अंदर का अंधेरा मिट जाये
ऐसे जश्न मनाने से कोई फायदा नहीं
जिससे अपनी तबियत बिगड़े
हम कोई मोर नहीं
नाचने के बाद  अपने पांव देखकर
जिसकी सूरत रोनी हो जाती है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Tuesday, October 22, 2013

आनंद लेने का सलीका-हिन्दी लघुकथा(anand lene ka tarika-hindi laghu kathaa,trick of enjoyment-short hindi story)



                        वह साधक हमेशा ही योग साधना और ज्ञान के अध्ययन में संलग्न होकर प्रसन्न रहता  था।  एक दिन उसके पास एक मित्र आया और बोला-‘मेरे साथ गुरु के आश्रम चलना चाहते हो तो चलो! मैं कल अपनी गाड़ी का टिकट आरक्षित कराने जा रहा हूं।’’
                        साधक ने कहा-‘नहीं, तुम जाओ। मेरा मन तो अब अपनी साधना में ही रम जाता है।’
                        मित्र ने कहा‘‘उंह, तुम एक ही शहर में रहते हुए बोर नहीं होते।  अरे, तुम हमारे गुरु के वार्षिक कार्यक्रम में एक बार चलोगे तो तुम्हें पता चल जायेगा कि वहां कितना आनंद मिलता है? एक जगह बैठकर तुम अपनी देह सड़ा क्यों रहे हो। इधर उधर घूमकर तुम अपनी जिंदगी के कुछ मजे लो!’’
                        साधक हंसा और बोला-‘तुम्हें क्या लगता है कि मैं अपनी जिंदगी बिना बजे के गुजार रहा हूं। परेशान तो तुम लगते हो जो बाहर जाकर मजे लेने की इच्छा तुम्हें वहां ले जा रही है।’’
                        मित्र चला गया।  कुछ दिन बाद फिर वह अपने साधक मित्र के पास आया और अपनी यात्रा का आनंद बखान करने लगा-‘‘यार, बड़ा मजा आया! वहां बहुत सारी भीड़ थी। क्या जोरदार संगीतमय भजन सुनने को मिले।  गुरु जी ने अपने श्रीमुख से भजन भी गाये और प्रवचन भी फरमाये। तुम्हें चलना चाहिये था! वहां बहुत आनंद मिला।’’
                        साधक ने पूछा-‘तुम्हारे गुरु ने प्रवचनों में क्या कहा? वह हमें भी सुनाओ। ज्ञान की बात सुनने में मेरी  बहुत रुचि है।’’
                        मित्र ने उत्तर दिया-‘‘प्रवचनों में क्या होता है? वही बातें जैसे कि मीठा बोलो, सभी के साथ सद्व्यवहार करो और किसी दूसरे के धन पर वक्रदृष्टि मत डालो। हां, वहां जिस तरह मेला लगा उसमें बहुत आनंद आया।’’
                        साधक ने पूछा-‘तुम्हारी यात्रा कैसी रही?
                        मित्र ने कहा-‘‘यही मत पूछो। जाते समय तो टिकट आरक्षित था पर आते समय उसकी पुष्टि नहीं हो पायी।  इसलिये तंगहाल में यात्रा की।  अभी तक सारा शरीर टूट रहा है।  मैं तो कल रात से दोपहर तक सोया। लगता नहीं है कि अभी आराम मिला है!
                        साधक ने कहा-‘‘तुम वहां मिला आनंद क्या यहां तक ला सके?
                        मित्र ने कहा-‘तुम तो व्यंग्य करते हो! भला आनंद भी साथ लाने की वस्तु है?’’
                        साधक ने कहा-‘‘आनंद वस्तु नहीं एक भाव है। अगर तुम वहां का आनंद यहां तक नहीं ला सके तो तुम्हारे गुरु का सारा श्रम व्यर्थ गया। तुम मुझसे वहां चलने को कह रहे थे पर जहां का आनंद घर तक नहीं लाया जा  सके, उसे हम वहां चलकर क्या लेते? हमें तो दिल तक जाने वाला आनंद चाहिये।  ऐसा आनंद जिसके मिलने के पश्चात् किसी असुविधा या अभाव पर कुंठा का भाव पैदा न हो।’’
                        मित्र ने कहा-‘‘यार, तुम तो अपनी बघारते हो! मुझे तुम्हारी बात समझ में नहीं आयी।’’
                        मित्र चला गया और साधक अपने ध्यान की प्रक्रिया में लीन हो गया।
                        साधक ने सही कहा था। क्षणिक आनंद कभी हृदय में स्थान नहीं बना पाते।  इसके विपरीत क्षणिक आनंद के बाद जब कोई कष्ट सामने आता है तो मस्तिष्क में इतना तनाव पैदा होता है कि जितना खून आनंद से नहीं बढ़ा होता उससे अधिक तो तनाव से घट जाता है। दूसरी बात यह कि हमारी इंद्रियां बाहर से प्राप्त आनंद का विसर्जन भी जल्दी कर देती हैं। यह उनकी प्रकृत्ति और निवृत्ति का सिद्धांत है। अंदर पैदा हुआ आनंद कभी सहजता से नष्ट नहीं होता। यह आनंद ध्यान, मंत्रजाप तथा योगासन से प्राप्त किया जा सकता है। दूसरा कोई इसका मार्ग कम से कम हमें अपने अनुभव के आधार पर तो नहीं लगता जो कि  किसी को स्थाई आनंद दिला सके।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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